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अनोखी परंपरा: दिन में नहीं होती दुल्हन की विदाई, पूर्वजों से होती है पूजा, भगवान से जुड़ी होती है अनोखी प्रथा


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रिवायत की मान्यता है कि क़तर में नज़र आने वाले ये पत्थर कभी इंसान थे, जो बारातियों की शकल में ठाकुर देव की बारात में शामिल हुए थे। गांव के लोगों का कहना है कि करीब 100 साल पहले किसी ठाकुर की पूरी बारात दुल्हा दुल्हन के साथ लेकर लौटी थी। लंबी दूरी तय करने से थके हुए बारातियों को क़तार में बंधक बनाकर उन्हें रात का खाना खिला दिया गया, लेकिन उनके बीच की बातें इतनी लंबी चलीं कि सुबह हो गईं। सुबह की पहली किरण फूटते ही बातें मशगुल में सभी बाराती पत्थर के बन गईं। इनमें दूल्हे और दुल्हन भी शामिल थे। यही कारण है कि इस जगह पर आपको लाल मां भी नजर आएंगी, जो ग्रामीण अपनी श्रद्धा और मंत्र को लेकर चढ़ते हैं।



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