लक्षेश्वर यादव/जांजगीर चांपा. छत्तीसगढ़ में संतान की आयु और संतान की कामना के लिए महिलाएं हलषष्ठी (हल षष्ठी) का व्रत रखती हैं। सिद्धांत यह है कि इस दिन व्रत रखने से संत को सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है। इस वर्ष हलषष्ठी का व्रत मंगलवार 5 सितंबर को रखा जाएगा। बलराम जी का मुख्य शस्त्र हल और मूसल है इसलिए उन्हें हलधर भी कहा जाता है। उनके नाम पर इस पावन पर्व का नाम हलषष्ठी अंकित है।
भादो के कृष्ण पक्ष की छठी तिथि को हलषष्ठी पर्व मनाया जाता है। इस पर्व को गांव-गांव में कमरछठ के नाम से जाना जाता है। हलषष्ठी के दिन संतान की प्राप्ति और सुख-समृद्धि के लिए महिलाएं व्रत कथा कहती हैं। नवविवाहित स्त्रियां भी संतान प्राप्ति के लिए यह व्रत लिखती हैं। पूजा- साकेत में बिना हल जोते उगने वाले पसहर चावल और छह प्रकार की भाजियों का भोग लगाना महत्वपूर्ण है।
हलषष्ठी के दिन पूजा करने की विधि
हलषष्ठी के दिन महिलाएं सुबह स्नान कर के व्रत का संकल्प लेती हैं। इसके बाद घर या बाहर भी गोबर लीप कर छोटा सा खोद कर तालाब बना कर पलाश और कांसी के पेड़ लगाते हैं, और वहां बैठ कर पूजा-सब्जी करते हैं। वो हलषष्ठी की कथा सुनते हैं। पूजा में चना, जौ, गेहूं, धान, अरहर, मक्का और मूंग चढ़ाने के बाद, भुने हुए चने और जौ की बाली बताई जाती है।
सिद्धांत के अनुसार इस व्रत में इस दिन भैंस का दूध, दही, घी, पसहर चावल आदि का सेवन किया जाता है। इस दिन गाय के दूध और दही, घी का सेवन नहीं किया जाता है। साथ ही, पूजा करने के बाद बच्चों को तिलक लगाकर, कंधे के पास चंदन की पोटनी लगाकर आशीर्वाद दिया जाता है।
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पहले प्रकाशित : 04 सितंबर, 2023, 14:53 IST
