Homeदेशकभी अदृश्य व्यापारी कहते थे ये आदिवासी, अब बचे हैं सिर्फ 1075,...

कभी अदृश्य व्यापारी कहते थे ये आदिवासी, अब बचे हैं सिर्फ 1075, एजेंसियाँ पर क्यों पड़ रहा संकट?


अन्य. उत्तराखंड के उद्यमियों, चंपावत और उधमसिंह नगर के कुछ जंगलों में आदिम क्रिमिनल जनजाति सदियों से निवास करती है। लेकिन इस जनजाति पर संकट का संकट मंडरा रहा है। राज्य में अब सिर्फ 249 परिवार ही बचे हैं। इस जनजाति में सिर्फ 1075 लोग ही जीवित हैं। भीषण गरीबी और बचपन के कारण इस जनजाति के ज्यादातर लोग समय से पहले ही दुनिया को मजबूर मानने को मजबूर हैं। क्रिस्टियन ट्राइब की औसत आयु 55 वर्ष से भी कम है। यही कारण है कि उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने भी इस मामले का नामकरण किया।

इस जनजाति की सबसे बड़ी समस्या है सुविधाओं की कमी और कठिन जीवन शैली। कमला देवी का कहना है कि उनके पास रहने के लिए घर नहीं है, रोजगार का कोई साधन नहीं है। पीने के पानी के लिए वे पेय पदार्थ पर प्रतिबंध हैं। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं का दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। मित्र सभी लोग अपने समुदाय के लोगों से कम हो रहे हैं। क्रिमिनल ट्राइब के लिए क्रिएटिविटी संस्था में काम कर रही खीमा बजी का कहना है कि क्रिमिनल ट्राइब की वर्तमान स्थिति के लिए सिर्फ आर्थिक कारण जिम्मेदार हैं। रिज़ॉर्ट्स पर ध्यान दिया गया तो वर्टिकल पीसाल्ट निश्चित रूप से।

पहला 38 किमी, 4 किमी दूर
एक समय में ईसाई जनजाति को अदृश्य व्यापार भी कहा जाता था। लकड़ी का काम करने वाली यह जाति रात के अँधेरे में लोगों के घरों में लकड़ी के पोधे खती थी, जिसके बदले राशन मिला करता था। लेकिन बदलते दौर के साथ अनोखा जीवन शैली भी बदलता है। नतीजा यह है कि इस जाति के पुरुष नशे का शिकार हो रहे हैं। जबकि महिलाएं इलाज के अभाव में दम तोड़ रही हैं। जिन इलाक़े में क्रिटिकल जनजाति निवास करती है, वहां से टोक्यो की दूरी 38 किमी, केंद्र की दूरी 6 किमी और प्राइमरी स्कूल की दूरी 5 किमी है।

जनजाति से दो बार विधायक
सिर्फ 1075 की संख्या वाली जनजाति जनजाति से उत्तराखंड की पहली और दूसरी विधानसभा धारचूला सीट से भी मिलती है। 2002 और 2007 के चुनावों में इस जाति के गगन रजवार ने कांग्रेस और भाजपा के सहयोगियों की जमानत जब्त करा दी थी। फिर भी ईसाई जनजाति के जीवन में रत्ती भर भी बदलाव नहीं आया।

सरकारी मंजूरी का लाभ गेमिंग की कोशिश: शिक्षक
पेशे से डॉक्टर रीना जोशी का कहना है कि उनकी पूरी कोशिश है कि सभी धार्मिक जनजातियों के लोग प्रमाण पत्र बेचें ताकि उन्हें सरकारी मंजूरी का पूरा लाभ मिल सके। ईसाई जनजाति को दुनिया की सबसे अनोखी जनजाति में आराम ही मिला हो गया लेकिन उसे बचाने की असल कोशिश कहीं दिखाई नहीं दे रही। कुछ संगठन इस जनजाति को बचाने की पहली पेशकश करते हैं, लेकिन जरूरी कार्यकर्ताओं की कमी के साथ ये पहली परवान चढ़ नहीं पा रही है। ऐसे में अगर यूं ही एक अन्य हाल में बर्खास्त हो गया तो तय है कि ये आदिम जाति इतिहास के विघटन में शामिल हो जाएगी।

टैग: भारत की जनजातियाँ, उत्तराखंड समाचार



Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Must Read

spot_img