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कानपूर के फूल बाग में कवि श्यामलाल गुप्ता ‘पार्षद’ के ‘झंडा-गीत’ पर रीझ उठे थे नेहरू नेहरू


स्वतंत्रता संग्राम में चिल्लाओ देशभक्त गीत ‘विजयी विश्व ध्वज प्रिय, झंडा ऊँचा रहे हमारा’ के रचनाकार कवि श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ का प्रिय ग्रंथ रामचरितमानस था. कवि होने के साथ वह महान रामायणी भी थे और भारत के पहले राष्ट्रपति थे डॉ. राजेंद्र प्रसाद उन्होंने राष्ट्रपति भवन में संपूर्ण रामकथा का अवलोकन किया था। बता दें, कि ‘पार्षद जी’ स्वाधीनता आंदोलन में करीब छ: वर्ष तक बंदी रहे थे और उसी दौरान वह शहीद नेहरू, महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरू और कवि रामनरेश त्रिपाठी से भी जुड़े थे।

बहुसंख्यक जनसंख्या है, जो ‘पार्षद’ जी का नाम और संघर्षशील जीवन से आज भी परिचित नहीं है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के विशेष रूप से याद किए जाने वाले ‘पार्षद’ जी सारि जीवन सामाजिक कार्य में वृद्धि-चढ़ाई कर भाग लेते रहे और पूर्ण सत्यनिष्ठा से एक मित्र देशभक्त की भूमिका निभाते रहे। समाज को बेहतर बनाने के प्रयास में उन्होंने दोसर वैश्य संस्थान प्रयोगशाला, अनाथालय, कैथेड्रल स्कूल, गणेश विद्यापीठ, दोसर वैश्य महासभा और वैश्य पत्र समिति की स्थापना और संचालन किया। ‘पार्षद’ जी ने एक और ‘ध्वज-गीत’ लिखा था, जो कुछ अनोखा नहीं हुआ। गीत की पंक्तियां कुछ इस तरह-

राष्ट्र गगन की दिव्य ज्योति,
राष्ट्रीय पताका नमो-नमो
भारत जननी के गौरव की,
अविचल शाखा नमो-नमो

‘पार्षद’ जी के एक गीत में कुछ ऐसी पंक्तियाँ थीं, जिन्हें लेकर कुछ लोगों ने विरोध किया और आकाशवाणी में उनके काव्य पाठ को रोक दिया। वह अंशकालिक पंक्तियां थीं-

“देखो यात्रा देश की मैं मौन में रो रहा हूँ
आज चिन्तित हो रहा हूँ

बोलना तुम्हें नहीं आता था, जो अब टूट गए हैं
रस नहीं, बस देश के अरमानों में जहर घुलते हैं
सर्वदा गीदड़ रहे, अब सिंह बन कर डोलते हैं
कालिमा अपनी छुपेए, होटल की दुकानें हैं

देखिए उनका व्यक्तित्व क्रम, मैं आज एडवेंचर खो रहा हूं
देखिये मनोरंजन देश की मैं मौन में रो रहा हूँ
आज चिन्तित हो रहा हूँ…”

आजादी के बाद ‘पार्षद’ जी देश का हाल देखकर काफी दुखी और चिंतित थे और उन्हें इस बात की खुशी थी, कि उन्होंने जो ‘झंडा-गीत’ लिखा था, देश का विकास उसके बिल्कुल विपरीत हो रहा है। उस समय की सरकार को उनका विरोध पसंद नहीं आया लेकिन उनके इस गीत को वहीं दबाया गया और गीत लोकप्रिय नहीं हो पाया।

उन्नीस साल की उम्र में स्वतंत्रता संग्राम में कूदने वाले ‘पार्षद’ जी फ़िज़ापुर जिला कांग्रेस समिति के अध्यक्ष भी बने। असहयोग आंदोलन के दौरान उन्हें क्रांतिकारी घोषित कर आगरा की जेल में भेज दिया गया था। वैज्ञानिक हैं, कि 1930 में ‘नमकीन’ के दौरान भी उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। अपने आत्मिक सुख के लिए उन्होंने जिला परिषद के स्कूल में बच्चों को पढ़ाने का काम भी किया, लेकिन उसी दौरान स्कूल में एक शपथ पत्र में कहा गया, जिसमें उन्हें दो साल तक स्कूल की नौकरी न छोड़ने की छूट दी गई थी। ‘पार्षद’ जी को यह पसंद नहीं आया और उन्होंने त्यागपत्र की बात (रिज़ाइन) दे दी। बक़ौल जी ने साल 1922 में एक कविता लिखी थी ‘स्वतंत्र भारत’संख्याएँ इस प्रकार हैं-

“महर्षि मोहन के मुख से निकला, स्वतंत्र भारत, स्वतंत्र भारत
सतर्क रहें सभी ने, स्वतंत्र भारत, स्वतंत्र भारत
रहा सदैव स्वतंत्र भारत, रहेगा फिर भी स्वतंत्र भारत
स्वतंत्र जेलें स्वतंत्र में भी, स्वतंत्र भारत, स्वतंत्र भारत
कुमारी, हिमगिरि, अटक्स, कटक में, पीएमगा डंका आजादी का
स्वतंत्र भारत, स्वतंत्र भारत।”

मन से ‘पार्षद’ जी कवि, लेखक और भक्त देशभक्त थे, इसलिए स्कूल की नौकरी छूटने के बाद उन्होंने मासिक पत्र ‘सचिव’ प्रकाशित किया और पत्रिका के हर अंक में मुख पृष्ठ पर उनकी रचना की पंक्तियाँ लिखी गईं, “रामराज्य की शक्ति” शांति, सुखमय स्वतंत्रता संग्राम को, ‘सचिव’ ने जन्म लिया, देश की स्वतंत्रता संग्राम को।” एक समारोह के दौरान कानपुर में ‘पार्षद’ जी ने हिंदी साहित्य के मर्मज्ञ ‘महावीर प्रसाद मंडल’ के स्वागत में एक कविता पढ़ी, पंडित जी इस कार्यक्रम के अध्यक्ष भी थे। कविता को क्रांतिकारी पत्रकार गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ ने प्रभावित किया।

विद्वान है, कि 1923 में उत्तर प्रदेश के फ़िज़ापुर में कांग्रेस के कट्टरपंथियों ने ‘विद्याार्थी जी’ के भाषण से अंग्रेजी हुकुमत ने गिरफ़्तारी कर जेल में डाल दिया था। जब शिष्य जी रिक्शा में गए तो ‘पार्षद’ जी ने सम्मानपूर्वक एक कविता पढ़ी, जिसके बाद शिष्य जी और शिष्य जी उनकी एक-दूसरे से मौलिकता से जुड़ गए। उन दिनों की बात है, जब कांग्रेस का झंडा तो तय हो गया था, लेकिन उसके लिए कोई सम्मान-गीत नहीं था। शिष्य जी ने ‘पार्षद’ जी से तिरंगे का ‘झंडा-गीत’ का आग्रह किया। तुरंत दिन शुरू करने के बाद और सहयोगी के रूप में जी ने समय पर गीत नहीं लिखा, लेकिन ‘पार्षद’ जी ने रात भर में ‘झंडा-गीत’ लिखकर शिष्यों को दे दिया।

जलियावाला कांड की अनमोल स्मृति में पहली बार ‘झंडा-गीत’ 13 अप्रैल 1924 को जवाहर लाल नेहरू के साथियों के साथ कानपुर के फूलबाग मैदान में हजारों लोग आपस में मिले। नेहरू जी ने गीत सुनने के बाद कहा था, ‘लोग भले ही श्यामलाल गुप्ता के बारे में नहीं जानते, लेकिन राष्ट्रीय ध्वज के लिए यह गीत अब पूरे देश से लिखा गया है।’ ‘झंडा बुलंद रहे हमारा’ स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के साथ कंठस्थ होने के साथ ही पूरे देश में लोकप्रिय हो गया और जब वर्ष 1938 में महात्मा गांधी और शेखर नेहरू ने इसे मंच पर बनाया, तो ‘पार्षद’ जी खुशी से झूम उठे। देश आजाद होने के कुछ साल बाद ‘पार्षद’ जी अपने गांव नरवल में ‘गणेश सेवा आश्रम’ निकले और कानपुर शहर से आश्रम हर दिन पैदल यात्रा पर निकल पड़े। 10 अगस्त 1977 को स्थिर जी ने दुनिया को छोड़ दिया, लेकिन उनका गीत अमर हो गया और सदियों पुराना हो जाएगा।

1973 में ‘पद्मश्री’ से सम्मानित ‘पार्षद जी’ ने अपनी अमर रचना लिखी ‘झंडा ऊंचा रहे हमारा’ 15 अगस्त 1952 को लाल किला से पढ़ा गया। ‘झंडा-गीत’ नाम से प्रसिद्ध है यह कविता इस प्रकार है, जिस गीत पुस्तिका में ‘झंडा उठा रहे हमारा’ भी शामिल किया गया है-

विजयी विश्व तीरंदाज़,
झंडा ऊँचा रहे हमारा

सदा शक्ति बढ़ाने वाला
प्रेम सुधा सरसाने वाला

वीरों को हर्षाने वाला
डायनासोर का तन-मन सारा
झंडा ऊँचा रहे हमारा…

स्वतंत्रता के भीषण रण में
लक्ष्कर भड़के जोश क्षण-क्षण में

कांपे शत्रु देखकर मन में
मिट जाये भय संकट सारा
झंडा ऊँचा रहे हमारा…

इस झंडे के नीचे निर्भय
लें स्वराज्य यह अविचल स्थिति

बोलें भारत माता की जय,
आज़ादी हो ध्येय हमारा
झंडा ऊँचा रहे हमारा…

आओ! प्यारे वीरो, आओ!
देश-धर्म पर बलि-बली जाओ

एक साथ सब मिलकर गाओ,
प्यारा भारत देश हमारा
झंडा ऊँचा रहे हमारा…

इसका शान न जाने
लेकिन जान भले ही जाए

विश्व-विजय करके दिखाएँ
तब होवे पूर्ण प्रश्न हमारा
झंडा ऊँचा रहे हमारा…

विजयी विश्व तीरंदाज़,
झंडा ऊँचा रहे हमारा…

टैग: हिंदी साहित्य, हिन्दी कविता, हिंदी लेखक



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