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भगवान का आदेश मांगें, भगवान के आदेश मांगें..,अजीब मांगलिक पत्र, मजबूत अमीर सुप्रीम कोर्ट का सामान


उत्तर

ऐसे अजीब याच एस्कॉर्ट्स पर सुप्रीमो अपना भुगतान साखत रुख, जमना भी चुकाया गया
कोर्ट कह रहा है, किसी को हक नहीं है कि प्रवेश पत्र का दुरुपयोग करे
इसके बावजूद असल में नहीं आ रही कमी, शीर्ष अदालत का समय हो रहा है

देश की सर्वोच्‍च अदालत, सुप्रीम कोर्ट (सुप्रीम कोर्ट) में लोन के मामले (लंबित मामले) की लगातार बढ़ रही हैं। इस सर्वोच्च न्यायालय के सामने कई ऐसे आभूषण मामले भी आए हैं, जो समय-समय पर खराब करने के साथ-साथ जेलाहट भी सुनाते हैं। इस तरह की डिलीशन फाइलन (जनहित याचिका) को लेकर कई बार बेहद सख्त रुख अपनाते हुए SC ने नाव को बेचने के साथ-साथ जुर्माना भी ठोका है लेकिन यह अपूर्ण कम नहीं हो रही है। ऐसी ही एक मस्जिद की अर्जी गुरुवार को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष आई जिसमें कोर्ट से मिड-डे मील के मेनू से नॉनवेज को बाहर करने के लिए लक्षद्वीप प्रशासन के आदेश में हेस्टक्रैक की मांग की गई थी। कोर्ट ने इस पर हस्टस्केप करने से इनकार करते हुए कहा, ‘यह नीतिगत निर्णय है और हम इसमें हस्टस्केप नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट में चुनौती पेश करते हुए यह याचिका दायर की गई थी।

कोर्ट सुप्रीम के समन ऐसी फाइल भी आई थी जिसमें धर्म परिवर्तन पर रोक के लिए ठोस कदम उठाने के लिए सरकार को निर्देश देने की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इसी माह इस विलोप दाखिल पर भी विचार से इंकार कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि आखिरी कोर्ट को इस सबमें त्रयोदशी पढ़नी चाहिए। यह कैसी डिलिवरी फाइल है।जनहित याचिका एक जरिया बन गई है, हर कोई इस तरह की डिलिवरी लेकर आ रही है।

नज़र डालें SC के समसामयिक ऐसे प्रमुख विश्विद्यालय मामलों पर

जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, ‘हम भगवान नहीं हैं’
सर्वोच्च न्यायालय के समागम में ऐसी बसीरपार की अंतिम प्रार्थना पत्र आई थी जिसे न्यायालय में यहां तक ​​कहा गया था कि वह भगवान नहीं है और यह काम सिर्फ भगवान ही कर सकता है। आदेश की अपील की गई थी। जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता की बेंच ने अजीम को खारिज करते हुए कहा था, ‘हम किसी के घर में यह नहीं कह सकते कि वहां कोई मच्छर या मक्खी है और उसे हटा दिया जाए। ऐसा नहीं लगता कि किसी अदालत, अधिकारी को देश से मच्छर खत्म करने का ऐसा कोई निर्देश दिया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने गुलाब को हाथ लेते हुए कहा था कि फाइल जमा करना भी एक तरीका है।

जांच में नाकामी का दोष यूट्यूब पर मध्य प्रदेश तो SC ने लगाई फटकार
सुप्रीम कोर्ट के सम्मलेन में एक ऐसी याचिका दायर की गई थी जिसमें एक युवा ने यूट्यूब (यूट्यूब) को दोषी ठहराते हुए परीक्षा में फेल हो गया था। यही नहीं,उसने कंपनी से 75 लाख रुपये की मांग कर दी थी। सबसे अधिक अत्याचारी अभिलेखों में से एक है। ऐसी अभिलेखीय अभिलेख समय की बर्बादी हैं। युवक ने याचिका में आरोप लगाया था कि यूट्यूब पर अश्लील विज्ञापन देखकर उसका ध्यान भटक गया और इस वजह से वह पढ़ाई में ध्यान नहीं दे पाई। उन्होंने फेल्स के निरीक्षण में यूट्यूबू के विज्ञापन के होने का कारण बताया था।

जाति अस्सिटेव प्रोफेसर न्यू क्रिस्टोफर से तय करने की मांग पर सख्त रुख
एक वकील की ओर से दो दाखिले की अर्जी पर भी सर्वोच्च न्यायालय ने साखत रुख अख्तियार किया था। आरक्षण को धीरे-धीरे खत्म करने का निर्देश देने की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों ही याचिकाओं को खारिज करते हुए वकील पर 25-25 हजार रुपये की मामूली कटौती की थी।

भगवान देवताओं को कैसे कह सकते हैं: सर्वोच्च न्यायालय
सुप्रीम कोर्ट में ऐसी ही एक अर्जी दाखिल की गई थी, जिसमें स्वामी अनुकूलित चंद्र ठाकुर को ही परम भगवान माने जाने के निर्देश जारी करने की मांग की गई थी। .बेंच ने साख्तत लॉज में कहा था, ‘आप (याचिकाकर्ता) कायर जो जीत गए लेकिन आप देश के सभी नागरिकों को श्री श्री अनुकूल ठाकुर को भगवान की व्यवस्था कैसे कह सकते हैं? ‘किसी को यह हक नहीं है कि ‘डिलीशन फाइल’ को गलत ठहराया जाए।’ सर्वोचैम कोर्ट ने कहा था कि भारत एक धार्मिक देश है। यहां सभी को अपनी धार्मिक आस्था के हिसाब से पूजा करने और अपने अनुयायियों के उपदेश, शिक्षा और उपदेश के प्रचार का अधिकार है लेकिन किसी को भी मजबूर नहीं किया जा सकता है।

चुनाव चिह्न संबधि अपील को लेकर खरीदारी पर लगाया गया था
ऐसे ही एक नामांकन दाखिल में दावा किया गया था कि राजनीतिक दल, चुनाव के दौरान अपने सिंबल (चुनाव चिन्ह) का अपमान कर रहे हैं, लिहाजा चुनाव आयोग को राजनीतिक दल को चुनाव चिन्ह से प्रतिबंधित कर देना चाहिए।इस नामांकन पत्र में कहा गया है यह था कि चुनाव लड़ने वाले दावेदारों को रिटर्निंग ऑफिसर को ही चुनाव चिन्ह देना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका में समय की बर्बादी को खारिज कर दिया था, साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने 25000 रुपये की कटौती की थी।

ये है डिवेलपमेंट फाइल, इसकी शुरुआत कब हुई
नामांकन दाखिल करने के पीछे मुख्य उद्देश्य सभी के लिए न्याय सुनिश्चित करना और लोगों के कल्याण को बढ़ावा देना है। सामान घर में रखे जाने के लिए कोई भी व्यक्ति ऐसी याचिका दाखिल कर सकता है जो जन (लोगों) के सामूहिक हितों के लिए अदालत में शरण ले सके। बेशक 1980 के दशक में शुरू हुई इंवेस्टीकेशन फाइलिंग की व्यवस्था आम जनता के नए आक्षेपों के दावे से एक कदम थी, लेकिन इस परिसंपत्ति का महत्व होने से, पहले से ही बढ़ते केसन का अहम हिस्सा रही नित्यैयिक अस्टैव स्टॉस्टिआ पर और पोर्टफोलियो की स्थापना हुई है। कई बार मीडिया की नजरें बिना आए या बिना गुप्त विचार के ऐसे कीमती आभूषणों की अर्जी की सुनवाई में अदालत का समय बीत जाता है।

सर्वोच्च न्यायालय में 69 हजार से अधिक मुकदमे लंबित हैं
वकील मंत्री राम अर्जुन मेघवाल के साल संसद के बहस सत्र में बताया गया था कि देश की जिला और अधीनस्थ अदालतों में आवास मामलों की संख्या 4 करोड़ से काफी अधिक है। देश के 25 उच्च न्यायालयों (उच्च न्यायालयों) में 14 जुलाई से साढ़े 60 लाख से अधिक सुप्रीम कोर्ट में एक जुलाई तक 69 हजार से ज्यादा दिनों तक के मामले में दोषियों को सजा सुनाई गई थी। उन्होंने बताया कि देश की अलग-अलग अदालतों में करीब 5 करोड़ मामले लंबित हैं, इनमें से कुछ जेल अदालतों में करीब 4 करोड़ 32 लाख रुपये के मामले शामिल हैं।



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