लक्षेश्वर यादव/जांजगीर चांपा. छत्तीसगढ़ का पारंपरिक त्योहार “पोरा” 14 सितंबर को बड़े पैमाने पर हर्षोलास से मनाया जाता है। पूरे प्रदेश में स्थापित बड़े पैमाने पर ही शानदार चित्रांकन किया जा रहा है। सीएम हाउस से लेकर इसकी धूम देखने तक मिल रही है। सौते से चली आ रही इस परंपरा का महत्व आधुनिक काल के युवाओं को आज भी समझ में नहीं आ रहा है। इसके लिए बाजार में पूजा के लिए मिट्टी से बने नंदी, बैल सहित जांता चाल व चूल्हा का सेट भी बिक रहा है।
जांजगीर चांपा जिले के ग्रामीण क्षेत्र में पोरा किसान भाइयों द्वारा मनाया जाता है। इस दिन क्रांतिकारी गाय, बैलों की पूजा करते हैं. इस फेस्टिवल में बड़ी फैक्ट्रियां से बनी हैं। इस दिन शहर की सड़कों और मोहल्लों में दौड़ के लिए नंदी बिला (मिट्टी के बॉल) तैयार हो गए हैं। व्यवसाय में बिक्री के लिए भी गए हैं. इन बैलों की कीमत 40 से 80 रुपये प्रति जोड़ी मिल रही है. वहीं जांता-पोरा और मिट्टी के दूसरे खिलौने भी 120-160 दर्जनों तक उपलब्ध हैं.
पोरा उत्सव पर बैलों की होती है पूजा
पोरा उत्सव भादो माह की अंतिम तिथि मनाई जाती है। इस दिन बैलों का श्रृंगार कर उनकी पूजा की जाती है। बच्चे मिट्टी के बैल बजाते हैं। इस दिन बॉल रेसिंग का भी आयोजन किया जाता है। और इस दिन बैलों से कोई काम भी नहीं चलता। घर में अच्छे-अच्छे व्यंजन बनाए जाते हैं। बैल, धरती और अन्न को सम्मान देने के लिए यह पर्व मनाया जाता है।
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पहले प्रकाशित : 13 सितंबर, 2023, 20:12 IST
