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73 प्राचीन से इस दुकान की मिठाई के बादशाह के दोस्त, कुछ घंटे में लोग कर जाते हैं चैट, जानें सुई


अभिलाष/मिश्रा/आदिवासी। शहर के सराफा बाजार में 1950 से अब तक मिलने वाली मिठाई ‘वड़ी नुक्ती’ को इस शहर के कई नाम भी दिए गए हैं। किसी के लिए यह दाल का रसगुल्ला है तो किसी के लिए रसभरी, कोई इसे ‘वड़ी नुक्ती’ कहता है तो कोई मूंग के दाने. एक ही व्यंजन के तीन नाम से पता लगाया जा सकता है कि शहर में इसकी प्रति व्यक्ति पहचान है। दुकान के संचालक शिवनारायण शिष्य हैं कि वर्ष 1949-50 में उनके पिता जिचगन लाल आत्माराम जी ने बड़ा सराफा से इस दुकान की शुरुआत की थी।

उनका कहना है कि मुझे बचपन से ही पिता जी के साथ यहां काम सिखाने का मौका मिला। या कहिए हमारे पिता जी ही हमारे उस्ताद थे। जब भी स्वाद में जरा भी बदलाव आता है तो पिता जी तत्काल हमें समझाते हैं की इच्छा के लिए स्वाद ही हमारी पूजा है। जिसे हम हमेशा बनाए रखते हैं। जो आज भी हम बने रहेंगे. करीब 73 साल पुरानी इस ‘जलेबी भंडार’ दुकान का संचालन अब शिवनारायण जी की तीसरी पीढ़ी के साथ उनके बेटे संदीप गुप्ता कर रहे हैं।

ऐसे चढ़ता है स्वाद
शिव नारायण के शिष्य हैं कि यह नुक्ती रेशम वाली मूंग दाल से तैयार होती है। दाल को कुछ घंटे पहले से शुरू करना है. इसके बाद सॉसेज को सॉसेज दाल को अच्छे तरीके से निकाला जाता है। पिस्सू में दाल को पिसने के बाद हाथ से काफी देर तक फेंटा जाता है ताकि इसे मुगौड़ी की तरह तलने पर यह कुकुरी और स्वादिष्ट बन जाए। देसी घी से तले हुए आटे में सिझने के बाद, आपका रंग और स्वाद अच्छा लगता है। खास बात यह है कि जिस व्यक्ति द्वारा दाल को पीसा और पीसा जाता है वह व्यक्ति इस दाल को अपने हाथों से फेटता है, ताकि दाल में किसी तरह से तेल, बाकी या कुछ भी न आ जाए। इसका स्वाद इसलिए लिया जा सकता है क्योंकि इसमें केवल एक व्यक्ति ही शामिल होता है। हमारे द्वारा कभी किसी रंग का उपयोग नहीं किया गया। अंत में हॉटाग्राम चासनी में डूबा कर धांधली की जाती है।

हर शहर में अलग नाम से मिली पहचान
संदीप छात्रों की इस मिठाई को हर शहर में एक अलग पहचान मिल गई है। जैसे कि देश के हर शहर का अपना लाइसेंस है। हर जगह पर अपना लाइसेंस बनाएं, फिर चाहे आगरे के पेठे की बात हो या कर्नाटक के मैसूर में बनने वाला मयापाक, बंगाल का रसगुल्ला हो या ओडिशा का छेना पोड़ा, हो या इंदौर का रबरी-मालपुआ अपने जायके से सभी को अपना दीवाना बना यही लेता है. इसी तरह इस मिठाई को अडोरा में वडी नुक्ती ‌तोमहाराष्ट्र में सिद्धी जलेबी, पंजाबी में इसे मुंगेड़ी या पेडाना कहा जाता है तो वहीं बंगाल में रसभरी या मूंग के रसगुल्ले के नाम से जाना जाता है।

इंदौर के वीर अलीजा सरकार मंदिर में विशेष प्रसादी का भोग लगाया जाता है
शहर के प्रसिद्ध वीर अलीजा सरकार मंदिर में भी इस मिठाई की काफी मांग है। शिवनारायण जी की मान्यता है कि हर मंगलवार और शनिवार को विशेष रूप से इस देवता से भगवान का भोग लगता है, जिसे कई ग्राहक दुकानों में अलीजा सरकार के नाम पर मांगते हैं। मंदिर के पुजारियों और महाराज के लिए विशेष रूप से इस मिठाई को तैयार करने के लिए भेजा जाता है।

डॉलर जलेबी से लेकर दो बच्चों तक की जलेबी
शिवनारायण बताते हैं कि मेरा ध्यान जब पिता जी के समय से शुरू हुआ तो दुकान में मिलने वाली वड़ी नुक्ती के स्थान पर इमरतीऔर जलेबी को प्रधान शेर से ईसाइयन शुरू हो गई आज वड़ी नुक्ती का भाव 520 रुपया है ऐसी ही इमरती और जलेबी भी 500 रुपये के आस-पास के भाव में है। बड़ा सर्राफा में स्थित यह दुकान सुबह सात बजे से रात के बजे तक लोग वड़ी नुक्ती को साथ-साथ इमरती और जलेबी का स्वाद देते हैं।

टैग: खाना, भोजन 18, इंदौर समाचार



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