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राजस्थान विधानसभा चुनाव 2023
राजनीतिक परिवार में गृहस्थी विक्टोरा की जंग
अन्य नातों पर हावी हो रही वैष्णवी
जयपुर. राजस्थान में विधानसभा चुनाव में मुकाबला इस बार केवल बौद्ध मठों के बीच नहीं बल्कि कई दिग्गज खानदानों के बीच भी होगा। चुनौती को लेकर कई राजनीतिक परिवार में विक्रांत की जंग कूड़ा-कचरा हुआ है। इन बयानों में ‘अपने’ ही ‘अपनों’ को हाशिये पर दिखाने के लिए हील चोटी का जोर भी तेल में दिखाई दिया। रियलिटी की चमक दमक और एक दूसरे के प्रति मन उठ रही टीस अब इलिनोइस के मैदान में हिलकोरें लेने लगी है।
राजस्थान विधानसभा चुनाव में अब आपका असली रंग बाकी नजर आएगा। डेल्ही को ‘अपनों’ से लड़कियाँ। न भाई देखेगी और न पति. ना जाने कितने ही सेज एसोसिएटेड एक दूसरे की हार और जीत का कारण। राजस्थान के प्रतीक दंगल में कुछ ऐसे नज़ारे आ रहे हैं। कांग्रेस नेता खानदान की बहू रीता सिंह ‘हाथ’ का साथ छोड़ अब जेजेपी के रथ पर सवार हैं। रीता सिंह सीकर की जिले की प्रमुख महिलाएं हैं। उनके पति अजित सिंह वर्तमान में दांतारामगढ़ से कांग्रेस नेता हैं। रीता के अनुयायी वीरेन्द्र के पिता नारायण सिंह दांतरामगढ़ के कई बार नेता रह चुके हैं। इनकी पहचान खांटी नेता की है. वे पीसीसी प्रमुख भी रह चुके हैं।

पत्नी पति और पत्नी निकाल रहे हैं रथ यात्रा
रीता अब कहीं भी पद कर रही हैं। वे जेजेपी के चुनाव चिह्न ‘चाबी’ की बढ़त में शामिल हुए हैं। पूरे दांतारामगढ़ में जेजेपी का श्रद्धालु घूम रहा है। वहीं, इजिहार सिंह रथयात्रा निकालकर पत्नी के प्रचार अभियान की हवा निकाल रहे हैं। लेकिन जब लड़ाई वैधानिक से हो जाये तो वैधता बढ़ ही जाती है। इस बार दांतारामगढ़ में मुकाबला चतुष्कोणीय हो रहा है।
सी जिज्ञासा यहां भी आयेंगे चुनाव मैदान में
सी दस्तावेज़ से पूर्व विधायक कामरेड अमराराम का चुनाव साथी तय है। पिछला चुनाव बहुत कम अंतर से हरी भाजपा इस बार मैदान में पूरे दमखम से मैदान में उतरेगी। वहीं रीता सिंह ने जेजेपी की चाबी से जीत की उम्मीद के साथ स्टेक स्टाप कर अपनी ही पत्नी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। उनका इरादा हर हाल में पति के सामने मैदान में उतरने का है।
बहू ने पति और पत्नी को संकट में डाल दिया
रीता ने जिस जेजेपी का दमन किया था वह अपने संस्थापक अध्यक्ष अजय देवगन हैं जिन्होंने नारायण सिंह को 1990 में दांतारामगढ़ से चुनाव हराया था। इसलिए बहू की जेजेपी में प्रवेश द्वार नारायण सिंह और एयरपोर्ट सिंह को नजरअंदाज नहीं किया जा रहा है। घर की लड़ाई के नॉटिल्य पर एक जाने से कांग्रेस पार्टी चिंतित है। नारायण सिंह के परिवार ने यहां लगातार नौ चुनाव लड़े हैं। नारायण सिंह ने दांतारामगढ़ से आठवां चुनाव लड़ा। वे यहां से दो बार हारे और छह बार जीते। एक चुनाव में उनके बेटों ने जीत हासिल की। अब बहू के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की पार्टी में जाने से शेखावाटी के कद्दावर जाट परिवार की चिंता बढ़ गई है।
पति-पत्नी की शादी सामने आने की तैयारी में हैं
दांतारामगढ़ में जहां पति पत्नी की झलक सामने आने की तैयारी है तो वहीं सवाई माधोपुर की खंडार सीट पर भी दिलचस्प होने के आसार हैं। यहां चार बार के विधायक और पूर्व में कैबिनेट मंत्री रह चुके अशोक बैरवा के सामने उनके ही भाई सुनील टिक्कर की राह में रोड़ा बने हुए हैं। सुनील शुक्ला फ्रैंक अपने भाई के खिलाफ मोर्चा खोल रहे हैं। उन्हें नाकारा और कार्यकारी नेता कांग्रेस के टिकट हासिल करने की जद्दोजहद कर रहे हैं।
छोटे भाई ने बड़े भाई के खिलाफ़ की जंग
बड़ा भाई अशोक कॉन्स्टेंट प्रमुख बना गया तो छोटा भाई नहीं रह गया। उन्होंने सवाई माधोपुर से कांग्रेस के अनलॉक की टिकटें छीन लीं। लेकिन जब अशोक बैरवा ने टिकट नहीं दिया तो छोटे भाई सुनील ने अपने बड़े भाई के खिलाफ विद्रोह कर दिया। छोटे बेटे को पिता का भी साथ मिल गया है. बाप बेटे की जोड़ी अब नेता अशोक बैरवा के टिकट पर संकटग्रस्त हो सकती है।
राजनीति में कार्यकर्ताओं की भाषा को ही स्वीकार किया जाता है
कच्चे माल पर बाजार का कब्जा है। इसलिए संबंध सभी गौण हैं। राजनीति में कार्यकर्ताओं की भाषा को ही स्वीकार किया जाता है। कटुता और ग्लाकाट स्को के बीच हिलकोरें एलपी महत्वकांक्षा ने राष्ट्रपिता को खोखला कर दिया है। अब कंज्यूम लेबल और डिस्पोजल हो गए हैं। इसलिए सात फेरे लेकर जिंदगी भर साथ बने रहने की कसमें खाने वाले पति पत्नी को सीता की चमक दमक एक दूसरे के साथ खड़ी रह रही है। वहीं घर बाल्यकाल में बचपन से लेकर जवानी तक साथ-साथ चलते भाई-बहन अपने भाई को टक्कर के सपने देख रहे हैं। इस चुनाव में बैलून का यही चेहरा दिखाई देता है।
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पहले प्रकाशित : 7 अक्टूबर, 2023, 20:08 IST
