दिलीप/कैमूर. बिहार के कैमूर में भी खाने-पीने का सामान एक से एक खाने-पीने का सामान मिलने लगता है। कैमूर में सुबह के नाश्ते में लिट्टी-चोखा और कचौड़ी-सब्जी के बाद सबसे ज्यादा पसंद किया जाने वाला व्यंजन छोले-भटूरे हैं. अगर आप भी अपने अनाउंसमेंट में छोले-भटूरे खाना पसंद करते हैं तो शहर से कुछ दूरी पर किंग स्टॉल का विकल्प हैं। किंग का स्टॉल शहर और गांव के बीच में स्थित है। दोनों जगह से लोग यहां छोटे भटूरे का स्वाद लेने आते हैं। 25 रुपए में राजा स्वादिष्ट छोले-भटूरे खिलाते हैं। राजा ने बताया कि देखभाल से लोग भभुआ यहां छोले-भटूरे खाने आते हैं।
राजा ने बताया कि लोगों के बीच में अधिक रहने की वजह से सुबह सात बजे से पहले ही दुकान लगा दी जाती है। यहां लोग सुबह 7 बजे से रात 10 बजे तक छोले-भटूरे खाते हैं। विश्विद्यालय को कोई परेशानी नहीं है इसके लिए ज्यादातर सामरागी सुबह-सुबह जल्दी ही तैयार कर लेते हैं। ठेला मिश्रण ही लोगों की भीड़ के लिए दिखता है। छोले-भटूरे खाने वाले अखलासपुर की रहने वाली सोनम ने बताया कि 6 महीने से राजा की दुकान पर छोले-भटूरे खा रहे हैं। इस तरह का स्वाद कहीं नहीं मिला. राजा का व्यवहार भी अच्छा है और पूर्ण स्वच्छता से भी भरपूर हैं। वहीं, स्थानीय सुनील कुमार यादव ने बताया कि यहां के छोले-भटूरे का स्वाद बेहद लाजवाब है। इसलिए शहर के सस्ते दामों पर लोग यहां खाने के लिए आते हैं।
तीन घंटे में लागत से बैटरी आय
राजा ने बताया कि वह छोले-भटूरे बनाने में दक्ष हो गए हैं और इसका फायदा उन्हें अपने व्यवसाय में मिल रहा है। भटूरे बनाने में आटा, मैदा और छोले बनाने में काबुली चने का इस्तेमाल किया जाता है. साथ ही घर पर तैयार किए गए सामान का भी इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि छोले-भटूरे में सबसे बड़ी बात यह है कि भटूरे का टाइम क्वालिटी में सबसे ज्यादा रखा जाता है. राजा ने बताया कि 2018 से ही टेस्टी छोले-भटूरे बना रहे हैं। रोजाना 70 से 80 प्लेट छोले-भटूरे बेचते हैं। वहीं, सामग्री तैयार करने में प्रतिदिन 400 से 500 तक का खर्चा लगता है। मोहज़ तीन घंटे की क्लासिक में लागत से दोगुनी कमाई हो जाती है। विपक्ष को दो पीस भटूरे के साथ चटकदार छोले के टुकड़े और आचार्य लोगों को शामिल किया जाता है। वहीं साफ-सफाई का भी विशेष ध्यान रखा जाता है।
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पहले प्रकाशित : 14 अक्टूबर, 2023, 19:40 IST
