साहस जुटाना और खामोशी से उसका सामना करना शायद फिर भी आसान है, लेकिन साहस जुटा कर उसे लिख देना उतना ही मुश्किल. हमारे आसपास ऐसी कई लेखिकाएं हैं, जो इसी हिम्मत से लिख रही हैं, कई सालों से लिख रही हैं. कृष्णा सोबती, मनु भंडारी, मदुला गर्ग से लेकर अरुंधति रॉय, तसलीमा नसरीन या फिर इन नामों जैसे ऐसे कई सारे नाम हैं, जिन्होंने इस बात की परवाह किए बगैर कि ‘लोग उनके लिखे को किस तरह लेंगे’ या फिर ‘क्या होगा’, बस लिख दिया… जो भी कहा, डंके की चोट पर कहा, क्योंकि लिखा जाना, कहा जाना उनके लिए सबसे ज्यादा ज़रूरी था…, लेकिन दुर्भाग्यवश दुनिया भर की तमाम लेखक-लेखिकाओं को बार-बार अपने लेखन के लिए कठोर आलोचना का सामना करने के लिए मजबूर होना पड़ा है.
लेखन एक ऐसी कला है, जो सबकुछ कहने का साहस रखती है, फिर वो अच्छा हो या बुरा, इसकी शर्त सिर्फ इतनी है कि पढ़ने वाला इसे पचा ले जाए. जब से मनुष्य ने लिखना पढ़ना सीखा, सच कहने का दुस्साहस लेखकों में तब से ही रहा. बस जैसे-जैसे समय बदला, वैसे-वैसे चुनौतियां बदलीं और चुनौतियां बदलीं तो कहानियां हर बार बदल गईं. लेखन की दुनिया में एक ओर जहां ‘मंटो’, ‘खुशवंत सिंह’ और ‘सलमान रुश्दी’ जैसे लेखक हुए, वहीं दूसरी तरफ ऐसी महिला लेखिकाएं भी हुई हैं, जिन्होंने साहसिक तरीके से अपनी बात को कहानी या उपन्यास का रूप देकर साझा करने की हिम्मत जुटाई है.
हमें इस बात को तो मानना पड़ेगा, कि पुरुष लेखकों ने महिलाओं का पक्ष लेकर या उनके समर्थन में जितना भी लिखने की कोशिश की है वो साहसिक, आभार प्रकट करने वाला और नि:संदेह बेहतरीन है, लेकिन वो है तो सिर्फ ‘देखा’, ‘सोचा’ और ‘सुना’ हुआ, लेकिन लेखिकाओं ने जो लिखा है, वो ‘भोगा’ हुआ है ‘झेला’ हुआ है, सारी कहानियां उनके भीतर से निकली हैं. ऐसे में उनका ये कदम काबिल-ए-तारीफ है कि वे अपने उद्देश्य से हटी नहीं न ही डरी हैं, बल्कि लेखन के माध्यम से सबकुछ कहने का साहस जुटा पाई हैं और समाज में अपने संवेदनशील मजबूत रुख से हलचल पैदा करने में कामयाब रही हैं. इन्होंने साहित्य के उस दायरे में अपनी जगह बनाई, जिस पर पहले पुरुष-लेखकों का वर्चस्व था. इनकी विशिष्ट लेखन शैली, चुनौतीपूर्ण विषय और शब्दों का शानदार उपयोग सचमुच प्रशंसनीय है और आने वाले कई सालों तक प्रासंगिक भी.
ऐसा अक्सर सुनने को मिल जाता है, कि महिला लेखिकाएं बोल्ड लेखन चर्चाओं में बने रहने के लिए भी करती हैं, लेकिन क्या ऐसा कह कर गुज़र जाना उनके समर्पण, ईमानदारी और मेहनत के लिए सही होगा? ये वो लेखिकाएं हैं, जो समय-समय पर समाज का आईना बनकर सामने आईं, कलम और कागज की यात्रा में साहित्य का पक्ष चुना और साहस का रास्ता अपनाया.
कमला दास
अभिव्यक्ति की आजादी का प्रश्न तो कमला दास के जीवन में उन दिनों से कुलबुलाने लगा था, जब उन्हें पढ़ाई तक के लिए अपने पिता के घर से बाहर नहीं जाने दिया गया था.
दिवंगत मलयालम कवयित्री कमला दास को लेखकों और विद्वानों की कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा था, उनका कहना था कि उनका लेखन उत्तेजक था और उन्होंने महिला कामुकता के बारे में खुलकर बात की थी. 1965 में प्रकाशित उनकी कृति ‘समर इन कलकत्ता’ को ताज़ा माना जाता था और इसमें प्रेम और विश्वासघात के बारे में बात की गई थी. इसके साथ ही, कमला दास उस अजेय स्त्री लेखिका का नाम है, जिसका आजीवन कदम-कदम पर विवादों और संघर्षों से साबका पड़ता रहा. जन्मभूमि बदल दी लेकिन कठिन हालात से कभी हार नहीं मानी. और नहीं तो, ‘माय स्टोरी’ लिखकर स्त्री-शोषक रीति-रिवाजों, परंपराओं पर अमिट कालिख पोत दी.
कमला दास ने जब कलम उठाई, तो सबसे पहले लिखा, ‘तुम एमी हो या कमला या कि माधवी कुट्टी, अब वक्त आ गया है, एक नाम एक रोल चुनने का.’ वर्ष 1976 में जब ‘माई स्टोरी’ नाम से उनकी खुद की जीवनी प्रकाशित हुई तो साहित्य जगत में मानो भूचाल सा आ गया. अपने जीवन में असहनीय विपरीत हालात का सामना करते हुए कमला दास ने मैत्रेयी पुष्पा की ‘गुडि़या भीतर गुड़िया’ की तरह ‘मॉय स्टॉरी’ में विवाहेतर संबंधों, प्यार पाने की अपनी नाकामयाब कोशिशों, पुरुषों से मिले अनुभवों को दृढ़ता और बेबाकी से रेखांकित किया. उस पर तरह-तरह से विवाद उभर कर सामने आने लगे. पुस्तक इतनी चर्चित हुई कि लोग चाहे जैसे भी उपलब्ध कर उसे पढ़ने लगे. यह किताब 15 विदेशी भाषाओं में अनूदित हुई. बाद में उन्होंने इसे फिक्शन घोषित कर दिया, पर एक बच्चे की भोली बेबाकी से यह जोड़ना न भूलीं, कि “मुझे तो प्यार की तलाश थी. और अगर प्यार घर में न मिले, तो पैर तो भटकेंगे ही.”
पंद्रह साल की किशोर वय में ही कलकत्ता के रिजर्व बैंक के उच्चाधिकारी माधव दास से शादी हो जाने के बाद के दिनो में उन्हें लेखन की घरेलू दुश्वारियों का सामना करना पड़ा. यदि घर के लोग जाग रहे हों तो वह रसोईघर में ही कलम चलाती रहती थीं. जब तक परिवार के लोग रात में जगे रहते, वह लिख नहीं पाती थीं. उनके सो जाने के बाद वह कलम उठा लेतीं और रात-रात भर लिखती-पढ़ती रहती थीं. सोलह वर्ष में ही वह मां बन गईं. उन्होंने मां होने के कड़वे अनुभवों पर भी कलम चलाई. वह अंग्रेज़ी में कमला दास और मलयालम में ‘माधवी कुट्टी’ नाम से लिखने लगीं. वह पेंटिंग भी करती थीं. अपने जिंदगीनामा पर रोशनी डालती हुई वह बताती हैं कि किस तरह पति की मौत के बाद तीन बेटों के बावजूद वे लगातार एकाकी होती चली गईं. उपेक्षित मां और समृद्ध लेकिन नौकरों पर आश्रित पर्दानशीं विधवा के सूने जीवन ने उन्हें एक बार मृत्यु का वरण करने को बहुत उकसाया तो घर के नौकरों से छिपकर वह बुर्के में एक पेशेवर हत्यारे के पास पहुंच गई थीं. उन्होंने उस पेशेवर खूनी पूछा कि ‘क्या तुम पैसे लेकर लोगों की हत्या करते हो?’ हत्यारा पहले तो चौंका, फिर गुस्से में उसने पूछा, ‘तुम कौन हो? किसने मेरा पता दिया तुम्हें?’ उन्होंने सीधेपन में पता बताने वाले का नाम जुबान पर ला दिया. इसके बाद हत्यारे ने पूछा कि किसको मारना है तो कमलादास का जवाब था, ‘मुझको. मैं जीवन से उकता चुकी हूं. अपने हाथों से अपनी हत्या करने का साहस मुझमें नहीं है. मुझे मारने के बदले में तुम्हें जितना पैसा चाहिए, एडवांस में ले लो.’ लेकिन उस पेशेवर खूनी ने उन्हें समझा-बुझाकर वापिस भेज दिया.
अभिव्यक्ति की आजादी का प्रश्न तो कमला दास के जीवन में उन दिनों से कुलबुलाने लगा था, जब उन्हें पढ़ाई तक के लिए अपने पिता के घर से बाहर नहीं जाने दिया गया था. 1984 में वह अपनी पार्टी बना कर चुनाव मैदान में भी उतरीं. वर्ष 1999 में उन्होंने धर्मांतरण कर इस्लाम स्वीकार कर लिया. इसके बाद वह अपना नाम ‘कमला सुरैया’ लिखने लगीं. अभिव्यक्त की आज़ादी के लिए उन्होंने मुस्लिम महिलाओं की पर्दाप्रथा की मुखालफत शुरू कर दी. उनकी कट्टर मुसलमानों से ठन गई.
कमला जब तक जीवित रहीं, स्त्रियों के अधिकार के लिए संघर्षरत रहीं. स्त्री के प्रेम और दुख का उन्होंने अपनी रचनाओं में बारीक रेखांकन किया. उनका पुणे में 75 साल की उम्र में निधन हो गया. वर्ष 1984 में उनको नोबेल पुरस्कार के लिए भी नामित किया गया था. उन्हें अवॉर्ड ऑफ एशियन पेन एंथोलॉजी, केरल साहित्य अकादमी पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, एशियन पोएट्री पुरस्कार, केन्ट पुरस्कार, एशियन वर्ल्डस पुरस्कार, वयलॉर पुरस्कार, मुट्टाथु वरके अवॉर्ड, एज्हुथाचन पुरस्कार से सम्मानित हुईं. जीवन के सत्तर वसंत पार कर चुकी कमला दास को व्हील चेयर पर एशियाई साहित्य सम्मान से समादृत किया गया था.
मन्नू भंडारी

मन्नू भंडारी को अपने लेखन की वजह से कई तरह के विरोध, आलोचनाएं और विवादों का सामना करना पड़ा.
ख्यात लेखिका मन्नू भंडारी हिंदी साहित्य की शीर्ष लेखिकाओं में से एक हैं. उनका जीवन एक ऐसी पटकथा जैसा है, जो आज भी उनको जानने वालों को एक अजीब सी तड़प से भर देता है. कहानीकार मन्नू भंडारी के बचपन का नाम महेंद्र कुमारी था. लेखन के लिए उन्होंने अपना नाम मन्नू रख लिया. गौरतलब है कि मन्नू हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली संवाद लेखिका और कहानी लेखिका हैं. उनके लेखन से भारत के भेदभावपूर्ण समाज में औरत की यात्रा और उसके सांस्कृतिक व नैतिक मूल्यों का पता चलता है.
‘धर्मयुग’ में धारावाहिक रूप से प्रकाशित उपन्यास ‘आपका बंटी’ से उन्हें सर्वाधिक लोकप्रियता मिली लेकिन लेखक राजेंद्र यादव के साथ उनके दांपत्य जीवन को एक ऐसा अंधेरा ओर-छोर मिला, जिसको लेकर अब तक न जाने कितने पन्ने रंगे जा चुके हैं. इसमें कोई शक नहीं कि समकलीन हिंदी कहानी के विकास में राजेंद्र यादव एक अपरिहार्य और महत्त्पूर्ण नाम हैं. हिंदी कहानी की रूढ़ रूपात्मकता को तोड़ते हुए नई कहानी के क्षेत्र में जितने और जैसे कथा-प्रयोग उन्होंने किए हैं, उतने किसी और ने नहीं. वह हिन्दी के सुपरिचित लेखक, कहानीकार, उपन्यासकार, आलोचक होने के साथ-साथ हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय संपादक भी रहे लेकिन अपनी जीवन संगिनी मन्नू भंडारी को ‘जनविरोधी राजनीतिक मानसिकता’ का घोषित करते हुए अपने सरोकारों का एक बरख्स भी खड़ा करते रहे, और मन्नू भंडारी हर बार विषपायी नीलकंठ की तरह ख़ामोश रहीं. राजेंद्र यादव कहते हैं, “यदि उनकी ही तरह मन्नू जी ने भी संबंधों के मामले में स्वच्छंद जीवन जिया होता तो उन्होंने मन्नू को माफ़ नहीं किया होता.”
मन्नू भंडारी की रचना ‘एक कामजोर लड़की की कहानी’ में बहादुर विचारों वाली एक ऐसी युवा लड़की की कहानी है, जो माता-पिता और सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों द्वारा उस पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण उन्हें क्रियान्वित नहीं कर पाती है. ‘आपका बंटी’ में मन्नू उन संघर्षों के बारे में बात करती हैं जिनका सामना भारत में एक तलाकशुदा महिला को करना पड़ता है. इसके अलावा, ‘त्रिशंकु’ एक ऐसी युवा लड़की की कहानी है, जो भेदभावपूर्ण सामाजिक, सांस्कृतिक और उन नैतिक मूल्यों को समझने की कोशिश कर रही है जिसके बीच उसका पालन-पोषण हो रहा है.
व्यक्तिगत जीवन की तकलीफों को साथ झेलते हुए मन्नू भंडारी को अपने लेखन की वजह से कई तरह के विरोध, आलोचनाएं और विवादों का सामना करना पड़ा.
मृदुला गर्ग

मृदुला के उपन्यास ‘चितकोबरा’ को रिश्ते के खुलेपन के नाते विवादास्पद माना जाता है.
मृदुला गर्ग हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लिखती हैं. साहसिक विषयों पर उनकी लघु कथाएं और उपन्यास ख़ासा चर्चित रहे हैं. स्त्री-पुरुष संबंधों के खुलेपन पर दो टूक शब्द-बयानी के कारण लोकप्रिय लेखिका मृदुला गर्ग के दो प्रमुख उपन्यास ‘चितकोबरा’ और ‘कठगुलाब’ विवादास्पद माने जाते रहे हैं. उनका सृजन मुख्यतः भारत के बंद समाज में घिरी स्त्रियों की समस्याओं पर केंद्रित रहा है. बहुमुखी प्रतिभा संपन्न मृदुला ने कहानियों एवं उपन्यासों के अलावा नाटक, निबंध, संस्मरण आदि विधाओं में भी लिखा है. साल 1975 में उनका पहला उपन्यास ‘उसके हिस्से की धूप’ प्रकाशित हुआ.
देश की लोकप्रिय हिंदी लेखिका मृदुला गर्ग बेहद संकोची और अंतर्मुखी व्यक्तित्व की उपन्यासकार मानी जाती हैं. कहा जाता है कि उनके सृजन से हिंदी साहित्य में एक नया मोड़ आया. ‘चितकोबरा’, ‘कठगुलाब’, ‘मिलजुल’, ‘अनित्य’, ‘एक और अजनबी’, ‘चूकते नहीं सवाल’, ‘जादू का कालीन’, आदि उनकी प्रमुख कृतियां हैं. जाहिर है कि हमारे समाज में स्त्रियों की सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियां भिन्न हैं. उनका जीवन तरह-तरह की पीड़ा एवं संघर्षों से जूझ रहा है. मृदुला की कृतियां इन स्त्रियों के सामाजिक और आर्थिक परिवेश की नई-नई कहानियां सुनाती हैं.
‘पुरुष’ मृदुला के उपन्यासों का पांचवां पात्र होता है. उनका उपन्यास ‘कठगुलाब’ पुरुष-प्रधान समाज में जी रही स्त्री के शोषण तथा मुक्ति की व्यथा-कथा है. स्मिता, मारियान, नर्मदा, असीमा, नीरजा आदि इस उपन्यास की मुख्य स्त्री-पात्र हैं. इन सभी को पुरुषों से नहीं ,बल्कि निर्लज्ज व्यवस्था से मुक्ति की तलाश रहती है. ‘कठगुलाब’ एक तरह से भारतीय स्त्रियों की पीड़ा एवं संघर्ष का एक जीवंत दस्तावेज़ है. इस सशक्त औपन्यासिक कृति में नारी पर घटित अन्याय, अत्याचार एवं उसकी वेदना के साथ नर-नारी सम्बन्धों की जटिल बुनावट और उसके रेशे-रेशे को व्याख्यायित करने की छटपटाहट का प्रत्यक्ष प्रमाण मिलता है. ‘कठगुलाब’ का प्रतीकात्मक अर्थ है ‘नारी की जिजीविषा.’ इस कृति में मृदुला गर्ग ने रेखांकित किया है कि स्त्रियां गुलाब नहीं हैं, जो उग जाने पर अपने आप खिल भी जाता है. वे कठगुलाब हैं, जिन्हें थोड़ी-सी देखभाल के साथ खिलाना भी पड़ता है.
मृदुला के उपन्यास ‘चितकोबरा’ को रिश्ते के खुलेपन के नाते विवादास्पद माना जाता है. एक तरह से यही उनकी सबसे लोकप्रिय कृति है. इसमें महेश और मनु पति-पत्नी हैं, जो अपने दाम्पत्य संबंधों से असंतुष्ठ हैं. महेश को मनु वह सब कुछ देती है, जो एक आदर्श पत्नी संभव होता है लेकिन दोनों के रिश्ते सहज नहीं रह पाते हैं. इसका तीसरा महत्वपूर्ण पात्र है ‘रिचर्ड’. ‘रिचर्ड’ और मनु की मुलाकात एक नाटक के रिहर्सल के दौरान होती है. फिर दोनों में आकर्षण होता है और फिर प्यार. रिचर्ड एक पादरी है, जो अक्सर भारत आया करता है. वह दुनिया भर में घूमा करता है. मुलाकात के दौरान जब रिचर्ड से मनु की मुलाकात होती है, वह महेश के साथ ब्याही जा चुकी है. ‘चितकोबरा’ नारी-पुरुष के संबंधों में शरीर को मन के समांतर खड़ा करने और इस पर एक नारीवाद या पुरुष-प्रधानता विरोधी दृष्टिकोण रखने के लिए काफी चर्चित और विवादास्पद रहा है और ‘कठगुलाब’ को भी इसी वैचारिक पृष्ठभूमि में देखा जा सकता है.
इस्मत चुगताई
इस्मत उर्दू साहित्य की सर्वाधिक विवादास्पद और सर्वप्रमुख लेखिका हैं, जिन्होंने महिलाओं के सवालों को नए सिरे से उठाया.
‘जब मैं जाड़ों में लिहाफ ओढ़ती हूं तो पास की दीवार पर उसकी परछाई हाथी की तरह झूमती हुई मालूम होती है. और एकदम से मेरा दिमाग बीती हुई दुनिया के पर्दों में दौड़ने-भागने लगता है. न जाने क्या कुछ याद आने लगता है. बेगम जान का लिहाफ़ अब तक मेरे ज़हन में गर्म लोहे के दाग की तरह महफूज है. न जाने उनकी ज़िन्दगी कहां से शुरू होती है? वह बावजूद नई रूई के लिहाफ के, पड़ी सर्दी में अकड़ा करतीं. हर करवट पर लिहाफ़ नईं-नईं सूरतें बनाकर दीवार पर साया डालता. मगर कोई भी साया ऐसा न था जो उन्हें ज़िन्दा रखने लिए काफी हो. उस वक्त मैं काफ़ी छोटी थी और बेगम जान पर फिदा. वह मुझे बहुत प्यार करती थीं. इत्तेफाक से अम्मां आगरे गईं. उन्हें मालूम था कि अकेले घर में भाइयों से मार-कुटाई होगी, मारी-मारी फिरूंगी, इसलिए वह हफ्ता-भर के लिए बेगम जान के पास छोड़ गईं. मैं भी खुश और बेगम जान भी खुश. सवाल यह उठा कि मैं सोऊं कहां? ”बेगम जान!” मैंने डरी हुई आवाज़ निकाली. हाथी हिलना बन्द हो गया. लिहाफ नीचे दब गया… लिहाफ़ फिर उमंडना शुरू हुआ. मैंने बहुतेरा चाहा कि चुपकी पड़ी रहूं, मगर उस लिहाफ़ ने तो ऐसी अजीब-अजीब शक्लें बनानी शुरू कीं कि मैं लरज गई. ‘आ न अम्मां!’ मैं हिम्मत करके गुनगुनायी, मगर वहां कुछ सुनवाई न हुई और लिहाफ मेरे दिमाग में घुसकर फूलना शुरू हुआ. मैंने डरते-डरते पलंग के दूसरी तरफ पैर उतारे और टटोलकर बिजली का बटन दबाया. हाथी ने लिहाफ के नीचे एक कलाबाज़ी लगायी और पिचक गया. कलाबाज़ी लगाने मे लिहाफ़ का कोना फुट-भर उठा, अल्लाह! मैं गड़ाप से अपने बिछौने में!’
ये शब्द हैं इस्मत चुगताई की चर्चित विवादित कहानी ‘लिहाफ’ के. ‘लिहाफ’ को जिसने भी पढ़ा, उसका मुरीद हो गया. इस कहानी में इस्मत ने महिलाओं के बीच समलैंगिकता के मुद्दे को बहुत बेबाकी से उठाया. इस्मत ने जिस जमाने में लिहाफ लिखी थी, उस जमाने में किसी महिला के लिए ऐसी साहसी कहानी लिखना एक तरह से दुस्साहस था. ‘लिहाफ’ कहानी को लेकर लाहौर हाईकोर्ट ने इस्मत पर मुक़दमा भी चलाया. जो बाद में ख़ारिज हो गया. इस्मत उर्दू साहित्य की सर्वाधिक विवादास्पद और सर्वप्रमुख लेखिका हैं, जिन्होंने महिलाओं के सवालों को नए सिरे से उठाया. उन्होंने निम्न मध्यवर्गीय मुस्लिम तबक़े की दबी-कुचली, सकुचाई और कुम्हलाई लेकिन जवान होती लड़कियों की मनोदशा को उर्दू कहानियों व उपन्यासों में पूरी सच्चाई से बयान किया.
इस्मत चुगताई का जन्म पंद्रह अगस्त 1915 को उत्तर प्रदेश के बदायूं में हुआ था. उनकी पहली कहानी ‘गेंदा’ का प्रकाशन 1949 में उस दौर की उर्दू साहित्य की सर्वोत्कृष्ट साहित्यिक पत्रिका ‘साक़ी’ में हुआ और पहला उपन्यास ‘ज़िद्दी’ 1941 में प्रकाशित हुआ. उन्होंने अनेक चलचित्रों की पटकथा लिखी और जुगनू में अभिनय भी किया. इस्मत की पहली फिल्म ‘छेड़-छाड़’ 1943 में आई थी. वे कुल 13 फिल्मों से जुड़ी रहीं. उनकी आख़िरी फ़िल्म ‘गर्म हवा’ को कई पुरस्कार मिले. उन्हें ‘इस्मत आपा’ के नाम से भी जाना जाता है. उनकी वसीयत के अनुसार मुंबई के चंदनबाड़ी में उन्हें अग्नि को समर्पित किया गया.
तस्लीमा नसरीन
धर्म, पितृतंत्र और औरत की आजादी की बात करने वाली तसलीमा ने अपने लेखन के द्वारा साफ-साफ लफ्ज़ों में कई तरह की सच्चाईयों को उजागर किया
25 अगस्त, 1962 को बांग्लादेश के मैमनसिंह कस्बे में जन्मीं तसलीमा नसरीन ने मैमनसिंह मेडिकल डिग्री कॉलेज से एम.बी.बी.एस. की पढ़ाई की और 1986 से लेकर 1993 तक सरकारी अस्पतालों में नौकरी की. ‘नौकरी करनी है तो लिखना छोड़ना होगा’ इस सरकारी निर्देश पर उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया. आपको बता दें कि तसलीमा ने स्कूल जीवन से ही लेखन शुरू कर दिया था, कई सालों तक कविता-पत्रिकाओं का संपादन किया और साल 1986 में उनका पहला काव्य-संग्रह प्रकाशित हुआ. उसके बाद उन्होंने गद्य लेखन में कदम रखा.
धर्म, पितृतंत्र और औरत की आजादी की बात करने वाली तसलीमा ने अपने लेखन के द्वारा साफ-साफ लफ्ज़ों में कई तरह की सच्चाईयों को उजागर किया. जिसके चलते मुस्लिम समाज के पुरातनपंथी धार्मिक लोगों ने उन पर हमले ही नहीं किए बल्कि उनकी देश-व्यवस्था और पुरुष-प्रधान समाज ने भी उनके खिलाफ जंग का एलान कर दिया. कट्टर धार्मिक मौलवी मुल्लाओं ने तो तसलीमा के लिए फांसी की मांग करते हुए देश-भर में आंदोलन तक छेड़ दिया और उनके सिर का मूल्य भी घोषित कर दिया. जिसका नतीजा यह हुआ कि तसलीमा को अपने ही देश (बांग्लादेश) से निर्वासित होना पड़ा और यूरोप व संयुक्त राज्य अमेरिका में एक दशक से अधिक समय तक रहने के बाद तसलीमा 2004 में भारत आ गईं.
तसलीमा नसरीन द्वारा लिखी गई किताबें- ‘लज्जा’, ‘मेरे बचपन के दिन’, ‘उत्ताल हवा’, ‘द्विखंडित’ और ‘वे अंधेरे दिन’ को बांग्लादेश सरकार द्वारा जब्त कर लिया गया. उन्होंने बहुत कुछ लिखा और और अपने लेखन में वो सबकुछ कहने की हिम्मत दिखाई, जिसे लिखना बिल्कुल आसान नहीं रहा उनके लिए. तस्लीमा को मुस्लिमों के साथ-साथ बड़े समाज में महिलाओं की स्थिति को चित्रित करने वाले उनके लेखन के लिए नियमित रूप से आलोचना का सामना करना पड़ा है.
एक मानवाधिकार कार्यकर्ता और नारीवादी तस्लीमा ने ‘लज्जा’ और अमर मेयेबेला (माई गर्लहुड) के माध्यम से महिलाओं की समानता के बारे में बात की है. तसलीमा बांग्लादेश की मशहूर लेखिका हैं. हालांकि, पहले वह एक डॉक्टर भी थीं, लेकिन निर्वासन के चलते डॉक्टरी पेशे को तिलांजलि देनी पड़ी. ‘लज्जा’ उपन्यास के चलते उन्हें निर्वासित जीवन जीना पड़ा और साल 1994 से अब तक वह निर्वासन में रह रही हैं.
अरुंधति रॉय
अरुंधति रॉय भारतीय लेखकों की समकालीन पीढ़ी के सबसे प्रसिद्ध लेखिकाओं में से एक हैं.
अरुंधति रॉय एक भारतीय लेखिका हैं जिन्हें उनके उपन्यास ‘द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ के लिए जाना जाता है. रॉय के इस उपन्यास ने साल 1997 में ‘बुकर’ पुरस्कार जीता और यह किताब एक गैर-प्रवासी भारतीय लेखक की सबसे ज्यादा बिकने वाली किताब बन गई.
अरुंधति रॉय का जन्म 1959 में मेघालय के शिलांग में हुआ था. वह अंग्रेजी में लिखने वाले भारतीय लेखकों की समकालीन पीढ़ी के सबसे प्रसिद्ध प्रतिनिधियों में से एक हैं. रॉय के पहले उपन्यास ‘द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ ने 1997 में आलोचकों, पंडितों और देश-विदेश के मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींचा. हालांकि ‘द गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स’ एक काल्पनिक कृति है, लेकिन कहानी गढ़ते समय रॉय ने अपने जीवन से प्रेरणा ली और बहुत खुलकर उस हर पक्ष को रखने और गढ़ने की साहसिक कोशिश की, जिस पर बात करना या लिखना इतना आसान नहीं.
द गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स उपन्यास में, अधिकांश कार्रवाई भारत के उन शहरों, गांव या इलाकों में घटित होती है, रॉय जहां पली-बढ़ीं और पुरातन जाति व्यवस्था को प्रत्यक्ष रूप से बेहद करीब से देखा. आपको बता दें कि लेखक होने के साथ-साथ रॉय मानवाधिकारों और पर्यावरणीय मुद्दों से जुड़ी एक राजनीतिक कार्यकर्ता भी हैं और अक्सर खबरों का हिस्सा रहती हैं. ऐसा नहीं है कि किसी भी विषय पर वह अपनी राय या विचार खबरों में बने रहने के लिए देती हैं, लेकिन उनके लेखन ने एक समय में इतनी तरह की आलोचनाओं और बवालों का सामना किया है, कि अब वो कुछ भी कहती हैं, वो नोटिस हो जाता है.
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FIRST PUBLISHED : October 16, 2023, 13:41 IST
