Homeछत्तीसगढ़माँ-अन्नाधारी-दाई-जंगल-लोगों की करती हैं रक्षा-लकड़ी-को-छूने भी नहीं-अकेले-लकड़ी-काटने-जानें-पूरी वजह- News18 हिंदी

माँ-अन्नाधारी-दाई-जंगल-लोगों की करती हैं रक्षा-लकड़ी-को-छूने भी नहीं-अकेले-लकड़ी-काटने-जानें-पूरी वजह- News18 हिंदी


लक्षेश्वर यादव/जांजगीर चांपा: छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के सुदूर वनांचल ग्राम पहरिया में आज भी लोग पेड़ों को काटते हैं तो दूर हाथ भी नहीं लगता। यहां स्थापित अन्न्धारी देवी मंदिर के चारों ओर हरियाली ही हरियाली है। आस्था के कारण लोग यहां जंगल की एक तानी तक नहीं टूटते। जंगल में अगर कोई पेड़ गिर जाता है, तो वह सुखकर डिमकों का घर बन जाता है। लेकिन, इसे कोई अपने घर नहीं ले जाता। पहरिया में मां अन्नधरी देवी आदिकाल की स्थापना की गई है

जांजगीर चांपा जिले के पहिरिया पथ जंगल में समृद्ध हरियाली के साथ ही आपको पेड़ों के जंगल भी मिल जाएंगे। लेकिन, कृश वृक्ष और लकड़ी के पेड़ होने के बाद भी ग्रामीण जलाऊ लकड़ी के रूप में प्रयोग नहीं किया जाता है। इसकी वजह यहीं है मां अन्नधरी दाई की स्थापना का मंदिर. माता का प्रताप है कि लोग जंगल को पवित्र मानते हैं, यहां पेड़ नहीं काटते। प्राचीन काल से यह देवी यहीं स्थापित है। हजारों साल पहले कल्चुरी शासन काल में पहरिया रतनपुर राज्य के अंतर्गत आने वाला पहाड़ी गांव था। ग्राम पॅरिया चारों ओर के पहाड़ों से घिरा हुआ है। पुरस्कृत मां आनंदरी दाई स्थापित हैं। मंदिर के बागा बेदाराम ने बताया कि यहां सैकड़ो साल पुरानी मूर्ति स्थापित है। माता की कृपा से धन धान्य में वृद्धि होती है, जिस कारण माता का नाम अन्न धरी देवी बताया गया है। नवरात्रि में नौ दिन तक विशेष पूजाप्रेरणा की जाती है. यहां नवरात्रि पर व्रत रखने वाले कई आकर्षक लोट और पाव के साथ देवी दर्शन के लिए आते हैं।

अनहोनी के डर से यहां की लकड़ी कोई नहीं देता
मंदिर के बागा बेदाराम ने बताया कि इस पहरिया पहाड़ में बड़े वृक्ष लगे हुए हैं, कई पेड़ पौधे गिरे हुए हैं, लेकिन, इस लकड़ी का उपयोग अपने घर के लिए नहीं करना चाहिए। जंगल की लकड़ी तो दूर, टूटी लकड़ियों को कोई नहीं ले जाता। ये है कि ऐसा होगा तो कहीं कोई अनहोनी घटना न हो जाए. गांव के लोग खाना बनाने के लिए जंगल से लकड़ी ले गए और अपने घर में कुछ न कुछ जरूर महसूस करते हैं। कई बार लकड़ी काटने वाले एक व्यक्ति को बिच्छू अपना डंक मार देता है और उस व्यक्ति को देवी दाई से मूरत के बाद ही बिच्छू का विष कम हुआ है। यहां की लकड़ी सिर्फ होली की दाल, नवधा रामायण, भागवत, घर में उपयोग कर सकते हैं. यह क्षेत्र पूरे पहाड़ और जंगल से घिरा हुआ था, केवल पहाडिया पर्वत का ही जंगल पूरी तरह से सुरक्षित है क्योंकि मां की प्रति आस्था से यहां की जड़ी-बूटियां जुड़ी हुई हैं।

माँ की पूजा के बाद ही जलता है घर
होने काल से स्थापित अन्नधरी देवी की प्रतिमा घने जंगल के बीच की वजह से जहां आदि नहीं पहुंचे थे। 23 साल पहले 2001 यहां से ही इस जगह पर ज्योति कलश जलाने की परंपरा शुरू हो गई है। स्थानीय लोग बताते हैं कि अन्नधरी देवी गांव की कुल देवी हैं। यहां नवरात्रि के अवसर पर घरों में अग्नि प्रज्जवलित करने के लिए जंगल की सूखी लकड़ी का प्रयोग देवी मां की पूजा-अर्चना के बाद किया जाता है। नवरात्रि में यहां जवारा बोया जाता है और मन ज्योति कलश की पूजा की जाती है। जिसके लिए इस मंदिर में लोग दूर-दूर से दर्शन करने आते हैं।

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