सौरभ तिवारी/कवर्धा. भारत के स्वामित्व और स्वामित्व का देश जाना जाता है। यहां तीज त्योहार से जुड़ी हुई कई मान्यताएं हैं, जो सैकड़ों हजारों साल पुरानी हैं। लोग इन मिज़ाज को बा-क़ायदे सिखाते भी हैं। वहीं, छत्तीसगढ़ भी यह मामला काफी मशहूर है। राज्य के कवर्धा क्षेत्र में भी एक ऐसी ही परंपरा है जो सैकड़ों साल पुरानी है।
असल में, छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले में नवरात्रि पर माता स्वयं शहर के लोगों के दर्शन होते हैं। कवर्धा जिले में राष्ट्रीय अष्टमी पर खप्पर की परंपरा 100 वर्ष से भी अधिक पुरानी है। शहर के दंतेश्वरी मंदिर, चंडी देवी मंदिर और भगवान मंदिर से मध्य रात्रि को सुरक्षा के चक-चौबंद टेबल के बीच खप्पर निकाला गया। शहर के तीन प्रमुख सिद्धपीठों से खप्पर फूटते हैं, जो पंडा और पंडितों के साथ रात्रि में भ्रमण करते हैं। वहीं, शहर के साथ-साथ पूरे राज्य और अन्य बेरोजगारों से आए लोग देवी के दर्शन के लिए अंधेरे में ही इंतजार करते हैं। इस मौक़े पर कवर्धा में बड़ी संख्या में भक्तों का जनसैलाब मौजूद है।
खप्पर से नहीं आती कोई आपदा
खप्पर ड्रेन के मकबरे पर शहर के प्रमुख 18 मंदिरों के देवी-देवताओं की स्वीकृति दी जाती है। इस दौरान हाथों में धंधकती आग और चमचमाती तलवारें लेकर निकले माता के खप्पर दर्शन के लिए 30 से 40 हजार लोगों की भीड़ उमड़ती है। इसमें अन्य जिलों के लोग भी शामिल होते हैं. मंदिर के रेस्तरां सुरक्षा कर्मियों का बल भी मस्जिद पर मौजूद रहता है। ऐसी मान्यता है कि माता का खप्पर शहर में किसी भी प्रकार की आपदा या बीमारी से ग्रस्त नहीं है और सभी लोग स्वस्थ हैं।
तलवारों से लेकर कैट कोट तक देवी माँ हैं
वहीं, ये भी माना जाता है कि यात्रा के बाद अपने मंदिर में देवी मां शांत हो जाती हैं। इन दर्शनों के लिए भारी संख्या में अंतिम दर्शन होते हैं। जिस वक्त खप्पर नामांकित है, उस दौरान रास्ते में कोई नहीं होता है। कहा जाता है कि खप्पर के सामने अगर कोई आ जाए तो माँ उसे तलवारें से काट देती हैं।
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पहले प्रकाशित : 23 अक्टूबर, 2023, 15:28 IST
