लक्षेश्वर यादव/जांजगीर चांपा. हिन्दू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। एकादशी व्रत हर महीने दो बार रखा जाता है। एक शुक्ल पक्ष में तो दूसरा कृष्ण पक्ष में। इस व्रत में अन्न और जल कुछ भी नहीं ग्रहण किया जाता है, और इस दिन व्रत में प्रातः स्नान करके सात्विक मन से श्री हरि विष्णु की आराधना की जाती है। परंपरावादी पंडित बसंत शर्मा महाराज ने बताया कि एकादशी की शाम को फलहारक ग्रहण करना चाहिए। उन्होंने बताया कि शास्त्रों के अनुसार, एकादशी व्रत के दिन व्रत रखने वाली महिलाओं या पुरुषों को चावल का सेवन नहीं करना चाहिए।
एकादशी व्रत के दिन चावल नहीं खाने वाले को लेकर पंडित बसंत शर्मा महाराज ने बताया कि इस दिन चावल को जीव के समान माना जाता है। क्योंकि धार्मिक सिद्धांतों के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि एक बार जब महर्षि मेधा के यज्ञ में आये तो एक साधु का अपमान किया गया था। जिस कारण मां दुर्गा नाराज हो गईं और मां दुर्गा को आशीर्वाद दिया, क्योंकि उनके अंग भविष्य में अन्न के रूप में उगेंगे। इस कारण से उस दिन के दिन के चावल का सेवन नहीं करना चाहिए।
जल से अंतिम कलश का दान करने से पुण्य प्राप्त होता है
पंडित बसंत शर्मा महाराज ने दान के संबंध में बताया कि एकादशी के दिन दान करना अच्छा माना जाता है, व्रती व्यक्ति को इस दिन के अनुसार, वस्त्र, जल, आभूषण, आसन, पंखा, और फल आदि का दान करना चाहिए। सिद्धांत यह है कि इस दिन जल से अंतिम कलश का दान करने से बहुत अधिक पुण्य प्राप्त होता है। लेकिन इस दिन चावल और आटा खाना मना है. ये दोनों चावल और आटा और अगले दिन द्वादशी के दिन दान करना चाहिए।
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पहले प्रकाशित : 13 दिसंबर, 2023, 13:55 IST
