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बथुआ: आयुर्वेदिक औषधीय औषधि है बथुआ, पेट में कीड़ों के अलावा रामबाण में आयुर्वेदिक औषधि, डॉ. शिवानी से जानें


बथुआ के फायदे: यदि आप बथुआ को सिर्फ इसलिए खरीदते हैं कि यह सस्ता है या एक बार आलू के साथ इसकी खुराक खा रहे हैं तो आपको बता दें कि यह सिर्फ हरा शाक नहीं बल्कि आयुर्वेदिक औषधि है। आज हम आपको बथुआ के औषधीय गुणों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसके बाद आप बथुआ को सिर्फ अपनी खुराक में शामिल नहीं करेंगे, बल्कि अपने रोजमर्रा के आहार में शामिल कर सकते हैं और बिना दवा के कुछ गोलियों से निकाल सकते हैं। ‍

ऑल इंडिया आयुर्वेद में आयुर्वेद के नए फार्मास्यूटिकल्स के द्रव्य गुण विभाग के अनुसार बथुआ के कई ऐसे पदार्थों को प्राकृतिक रूप से ठीक कर दिया जाता है, जिसके लिए अभ्यार्थियों को औषधि खानी ही छोड़ी जाती है। बथुआ का काफी असर होता है. इसमें शारीरिक और मानसिक शक्ति बढ़ाने की शक्तियाँ होती हैं। बथुआ हरा शाक है इसलिए हरे वाले सभी गुण होते हैं। इसमें ऐसे कई माइक्रोन्यूट्रिएंट्स पाए गए हैं जो मन और टैन दोनों को फायदा पहुंचाते हैं। यह आयरन की सर्वोत्तम गुणवत्ता है। शायद इसमें भी ऐसा होता है और इसलिए यह पाचन में बेहद अच्छा होता है इसलिए पाचन शक्ति भी बरकरार रहती है आप बथुआ को कई तरह से अपने भोजन में शामिल कर सकते हैं।

. बथुआ का हरा सागा बना सकते हैं.
. बथुआ की बेसन वाली कढ़ी बना सकते हैं.
. बथुआ को कचड़ा विखंडित, दांतों में गूंथकर रोटियां बना सकते हैं। . बथुआ का रायता बना सकते हैं.
. बथुआ को आलू के साथ मिलाकर या खाली आटे में स्टाम्पिंग करके परांठा या रोटी के टुकड़ों को खाया जा सकता है.

मदरसा के वैविध्य गुण विभाग में एएसआई नाम के प्रोफेसर डॉ. शिवानी घिल्डियाल बताती हैं कि आयुर्वेद का बथुआ अर्श यानी बवासीर (बवासीर) की परेशानी में राहत देता है। जिन्होनें भूख कम लगती है, तो उन्हें एक बार में जरूर खाना चाहिए। यह पाचन शक्ति को पुनःप्राप्त करता है। रक्त पित्त यानी अगर किसी के शरीर के किसी हिस्से से खून गिरता है तो नाक से अचानक खून निकलना आदि, उसकी फ्री फ्रेंची भी कम करने में सहायक है। विवंड यानी शौच या मल ठीक से न पास होने की स्थिति में बथुआ जरूर खाना चाहिए। गहराई के मौसम में बथुआ आसानी से उपलब्ध होने वाला है, इसलिए इसे गहराई में जरूर शामिल करें ताकि बहुत सी चीजों से बचा जा सके।

यह प्राकृतिक कृमिनाशक होता है। मतलब कि अगर किसी प्रतिष्ठान के पेट में कीड़े रहते हैं तो यह बे आयुर्वेदिक औषधि है। डॉ. शिवानी का कहना है कि बथुए का अल्पसंख्यकवाद कैसा होता है, ऐसे में जब यह खाने में जाता है तो यह पेट के अंदर के बच्चों के लिए जटिल माहौल पैदा कर देता है, एक ऐसा माहौल जिसमें बच्चों को जीवित रखना मुश्किल होता है।

बता दें कि जब भी सामान को पेट में कीड़े होने की जरूरत होती है, तो उनका शारीरिक विकास रुक सकता है और भूख नहीं लगती है। इसलिए जब तक एक से एक महीने तक बथुआ देखने को मिलता है, तब तक जोड़ों को ही नहीं बड़ों को भी जरूर खाना चाहिए।

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