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#HumanStory: गटर में सिर्फ गंदगी ही नहीं डेटिंग, कभी कनखजूरा रेंगता है टूटे पर, कभी बिच्छू….


वर्ष 1993 में मैला उठाव की ‘प्रथा’ पर मैनुअल स्कैवेंजर्स के रोजगार और शुष्क शौचालयों के निर्माण (निषेध) अधिनियम के तहत रोक लगा दी गई। 26 साल का सफर. प्राथमिक है. हाल ही में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय (एमएसजेई) ने 18 राज्यों में सर्वेक्षण भवन बनाए। इसके आंकड़े कहते हैं कि अब भी 20,500 से भी ज्यादा लोग ये काम कर रहे हैं.

आंकड़े, हकीकत और कॉन्वेंटी अंग्रेजी के बीच एक चेहरा सचिन का है। दिल्ली नगर निगम में यही काम कर रहे सचिन को अब गंदगी की आदत हो गई है। वे कहते हैं- घिन होती है लेकिन काम नहीं छोड़ा जा सकता. मेरे बच्चे इसी से पल रहे हैं.

उत्तर प्रदेश के जिलों में जन्मा. गाँव में ज्यादातर लोगों के पास खेती-बबड़ी थी। हम उन ज्यादातर लोगों में नहीं थे. पिता माते. माँ घर के काम. घर में गरीबी थी लेकिन मेरा बचपन काफी खुशहाल रहा। पुनर्भरण-खेल-कूद करता है. गाँव में हरियाली देखते हुए बड़ा हुआ। दिल्ली की कहानियाँ सुनता हूँ. बड़ा शहर है. बड़े लोग रहते हैं. दिल्ली की ख्वाब दृष्टि.

अब रोज सुबह जब अनमोल सोया रहता है, मैं ट्रेन में पुतले हूं। वो ट्रेन जो दिल्ली की ओर आती है। सारा दिन ऐसे ही शहर में है। मेरा काम है नालों और गटर की सफाई। जरूरत पड़े तो अंदर भी उतरना होता है.

जिस खुले गेटर के पास से गद्दा हुए लोग नाक पर रुमाल रख लेते हैं, सचिन उसके अंदर कई-कई घंटे रहते हैं। काम के शुरुआती दिन उन्हें आज भी आज हैं। पहले दिन गटर में ऑटोमोबाइल का काम मिला तो मैं ‘हकबका’ हो गया। बिल्कुल सही कहा- वो पेट जिसमें बच्चे गिर जाते हैं! साथ वाले हंसने लगे. बताया- नहीं, वो गटर जिसके पास से लोग निकल नहीं पाते। साइट पर पहुंच तक सीनियरों ने गेटर में जिंदा रहने के कई टिप्स डाले थे। लॉन्च तो सबसे पहले गैटर का समुद्र तट खुला था। इतना भारी न लगे वाला आमेर इतना वजनदार था कि चार लोग उसे उठाने में लगे।

खुलते ही प्लास्टिक का भभका नाक के रास्ते सीधे दिमाग में घुस गया। जैसे-तैसे खुद को पकड़ा. लगभग एक घंटे बाद अंदर ऑटोमोबाइल का परिचय मिला। ऊपर एक साथी कंप्यूटर का प्रदर्शन चल रहा था। मैंने नीचे पैर डाला. कहते ही लगा, गंध मेरा दम घोंट देवी। कौन सी कहावत है कि गंध नाक से ही आती है? सचिन क्रिटिक्स की आवाज़ में कहा गया है- मेरी तो आँखें, हाथ, पैर और शरीर पूरा गंध और गंदगी महसूस होती है।

कुछ सेकंड की बात हो तो सांस रोक ली जाए लेकिन यहां तो कई-कई घंटे एक ही गंध में सांस लेना होता है। उस दिन गेटर से बाहर आया तो लगा-एमएम कभी ये काम नहीं करेगा। लेकिन अगली सुबह मैं फिर ट्रेन से गया। गटर से सिर्फ गंध नहीं आती. शौचालय को साफ करने के लिए लोग विज्ञापन करते हैं, जिसमें शामिल हैं, उस शौचालय की गंदगी, सिलिकॉन के कपड़े, सुपरमार्केट- गटर के अंदर वो सब कुछ होता है जो लोग गंदे हुए दांत बिन में भी नहीं रख सकते।

हम हाथों से सब साफ करते हैं। कई बार कहा गया लेकिन मास्क, कुछ नहीं मिले। आदिवासियों में अक्सर कांच के टुकड़े या लोहे का सरिया लग जाता है। अंतिम यात्रा में हमें छुट्टी नहीं मिली, इसके लिए गमबूट दिया गया। ऐसा गैंबूट कांच जो निकला ही आरपार हो जाए। हंसते हुए इंजीनियर हैं- एक और चीज जो मिली है, वो है रेनकोट. लोग अपने घर-दफ़्तर की ज्योतिष से बारिश देखते हैं, हम उसी बारिश में पानी में डूबकर काम करते हैं।

एक गटर की सफाई करने में कई-कई घंटे और कई-कई बार पूरा दिन भी निकल जाता है। एक आदमी के बूटे का काम नहीं है. इसमें एक गैस गोदाम रहता है जो दम घोंटती है। हमें पारी बदल-बदलकर अंदर जाना होता है। ज्यादातर देर में रह तो सांस रुक जाएगी। काम शुरू हो गया तो सैटेलाइट हर वक्त चेस करता है। कितनी ही बार राँघ-रगड़कर ना लो, गंध जाती ही नहीं थी। गटर के अंदर उतरने में अनकानी करने लगा। डॉक्टर से मिला तो उसने कहा कि थोड़ी-सी शराब पी लो, गैस कम असर करेगी। तब तो मैंने हां कहा दिया लेकिन कभी स्टॉक नहीं डाला।

गेटर की दुनिया में कई दूसरे खतरे भी हैं। सचिन याद करते हैं- एक बार काम करते हुए यात्रा में सुरसुरी हुई। मैंने बॉस में धंसे हुए ही काम चालू रखा। सुरसूराहाट ऊपर की तरफ बढ़ती जा रही थी। देखा तो वहन सा कनखजूरा मुझ पर रेंग रहा था।

चीख़-पुकार-निकलते। ऐसा अक्सर होता है. कभी कनखजूरा, कभी बिच्छू। गटर में भी कुछ हो सकता है. कॉकरोचों की तो विशेष रूप से फौजदारी रहती है, जो अपार्टमेंट खुलते ही बिलबिलाते हुए आप पर टूट पड़ते हैं। पहले-पहले घिन होता है। अब बस शरीर को झटका दे देता हूं और काम चालू रखता हूं।

दिल्ली एमसीडी सचिन

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घर से नाख़ून हूँ तो साथ में खाने के अनमोल के अलावा डेटॉल साबुन की टिकिया और डेटॉल की शीशी भी साथ आती है। सफाई के बाद तीन बार साबुन का छिलका उतारता हूं, तब साफ कपड़े पहनता हूं। गटर की गंध का तो पता नहीं लेकिन डेटॉल की गंध का हर समय पता चलता है। शिक्षक बने सचिन की आवाज में वो ठंडापन है जो आदत से ही आता है।

सचिन या उनके साथियों को उन आंकड़ों से प्वाइंट नहीं मिला, जो लच्छेदार दोस्तों में शामिल हैं, जो कि गटर में बने कलाकार हैं। वे कहते हैं- गटर से जिंदा लौटना सबसे बड़ी बात है.

कितने बार सरिया लग चुका है. कांच तो आये-दिन कठिन है। आंखों में जलन होती है. इतनी अंतिम जलन कि रातभर सो नहीं पाता। दम घुटता है. पेट ख़राब रहता है. उलटियाँ होती हैं. बुखार आ जाता है. कम उम्र में ही मेरे साथियों को इमोशनल लुक मिला है। जोड़ों में दर्द रहता है. कईयों को कई बीमारियां लग गई हैं. ऐसा लगता है. मेरा बच्चा तो अभी सिर्फ साढ़े तीन साल का है।

बेहद पसंद स्वच्छता सचिन से आप कभी दिल्ली की सड़कों पर मिलें। नए फैशन के फैशन में साजे निहायत तहजीबदार सचिन को देखकर यकीन नहीं होगा कि ये स्पेशल गटर साफ होता है। ख़ुद सचिन कहते हैं- कई बार ग़रीब छूटने लगते हैं. काम छोड़ने का मन बना हुआ हूँ। फिर है बीवी-बच्चे का ख़ाल। रुक जाता हूँ. कभी न कभी तो हमारा भी दिन ‘बहुरेंगे’।



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