Homeदुनियामुनव्वर राना - बदलाव के शायर हमेशा याद रहेंगे मुनव्वर

मुनव्वर राना – बदलाव के शायर हमेशा याद रहेंगे मुनव्वर


उत्तर

इतनी आशा नहीं है मुनव्वर होना
इंसानी रिश्ते के लाजवाब शायर

नई दिल्ली शास्त्रीय रूप से पर गजलखास मयने में लिखी और खायी जाती है। हालाँकि वक्ता के साथ इस विधा में कुछ प्रयोग भी किये गये। प्रगतिशील आंदोलन के दौर में अविश्वासियों के हक की बातें। मजलूमों का ज़िक्र हुआ और बहुत ही शानदार सुर में आवाज़ गूंजी। लेकिन एक मूल बदलाव वह वक्ता दिखा जब गजल माशूका की जुल्फों के पेचो-खम से निकल मां के आंचल में खेल बनी। इस बदलाव के अगुवा के अनुसार मुनव्वर राणा का नाम हमेशा याद रहेगा. कहा जा सकता है कि आबा के नख-शिख वर्णन में लगी शायरी को एकता के बंधन के ताने- बने में वाले शायर के तौर पर मुनव्वर का योगदान बेमिसाल है।

मां की ममता और बहू-बेटी से लाड-दुलारा करती हैं अपनी शायरी लोगों की जंप पर चढ़ गईं. रुढ़िवादियों ने इसकी आलोचना भी की. कहा कि गजल का एक मतलब होता है. इसका उत्तर भी मुनव्वर ने निर्धारित तरीके से दिया। कहा, जब भक्त भक्तों के प्रभु उनके इष्टदेव- राम और कृष्ण हो सकते हैं तो जन्म से लेकर संस्कार देने वाली मां को सिद्धांत क्यों नहीं दिया जा सकता। आखिरी बार देखने को मिला कि प्यार- दुलार के बदले एकेडेमिक आलोचना पर भारी पड़े।

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अत्यंत सरल भाषा का प्रयोग करते हुए मुनव्वर ने हिंदी और अरबी में कई पुस्तकें लिखीं। इनमें मां, ओसाका का मकान, ग़ज़ल छांव, बदां सराय, मुहाजिरनामा, नीम के, फिर फूल कबीर, कहो जिले इलाही से, घर अकेला हो गया, पीपल छांव, नए मौसम के फूल, सफेद जंगली कबूतर प्रमुख हैं। इनमें से अधिकांश देवनागरी में भी छपी हैं। मुनव्वर हिंदी और अरब को सागी अपलोड किए गए थे। समुद्र तट की इस मानवी पर भी बा काया शेर भी लिखा –

सागी भाई-बहन का रिश्ता उर्दू और हिंदी में है
कहीं दुनिया की दो ज़िंदा ज़बानों में नहीं

लीडर हूं मां से और मौसी बनी हैं,
मैं ग़ज़ल कहता हूँ उर्दू में तो हिंदी लिखावट है।

मिलनसार और खुशमिज़ाज
असली, मुनव्वर इसी तरह के पौधे के इंसान भी रहे। उनका फकीराना अंदाज हर मिलने वाले को खुश कर देता था। मुनव्वर साहब से पहली बार मेरे अज़ीज़ दोस्त, चैलेंजर और मशहूर शायर हसन काज़मी के ज़रिए हुआ। 2005 या 06 के दौरान का वाकया है। हसन काज़मी और मैं सहरा टीवी में काम कर रहे थे। वहाँ बहुत से रोबोट के चैनल शुरू हो रहे थे। यूपी और नेशनल चैनल की शुरुआत हो चुकी थी। बाकी बहुत से सारे चैनलों के लिए सेटलाइट में जगह (बैंडविड्थ) खाली थी। उसी दौर में बात-चीत के दौरान चर्चा हुई कि ईद के मौके पर एक सेटेलाइट मुशायरा ले जाया जाए। यानि जो शायर शहर में है कहीं से उसे मुशायरे में शामिल किया गया है। बात सभी को बहुत अच्छी लगी.

मुशायरे में उस दौर के सबसे मशहूर नामचीन शायरों ने हिंदी स्ट्रिप के बड़े शहरों में डॉक्टर्स ले लिए। एंकर और निज़ामत हसन काज़मी ही कर रहे थे। रिवायत के कहने पर मुनव्वर साहब का नंबर फाइनली सुबह होने के करीब आया। आस्तिक पर शायरों से ऑफ लाइन लगातार मेरी ही बात-चीत होती रहती है।

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बेहतरीन याददाश्त
2007 में कुंभ मेले के तीर्थयात्रियों के लिए अल्लाहाबाद जाना हुआ तो वहां के मेले के एक अतिथि के दर्शन के दौरान मुनव्वर का ज़िक्र आया। निराधार अंदाज में मैंने ये सोच कर भिक्षुक-दारते वैज्ञानिक रुचि वाले विद्यार्थी पर कुछ अपना रसूख गालिब करने के लिए बताया था कि मेरी भी मुनव्वर साहब से बात होती है। हालाँकि उनकी पूरी तरह से बेपर्दा होने से बचने के लिए ये भी जोड़ा गया था कि हो सकता है मुनव्वर साहब को मेरे बारे में याद न हो।

उस छात्र ने अपनी आदत के मुताबिक मुनव्वर को फोन कर कहा कि मुनव्वर साहब आपके और हसन काजमी के एक दोस्त मेरे साथ हैं। उधर से तपाक से मुनव्वर ने कहा – “राजकुमार हैं क्या”। सेटलाइट मुशायरे के बाद एक बार और मुनव्वर साहब से मुलाकात हुई थी। स्कॉलर के साथ मुझे खुशी हुई कि मशहूर – मकबूल शायर को मेरा नाम याद था और उन्होंने उनसे मिलकर जरा सा हिंट भी याद किया। इसके बाद तो दिल्ली या फिर आस-पास के इलाके में मुनव्वर साहब का मुशायरा होने पर वहां जाने का सिलसिला ही चल निकला।

हर बार एक नई फ़िक्र
जब भी मुनव्वर राना से मुलाकात हुई तो उनके पास एक नई चिंता पैदा हो गई थी। असली मुनव्वर लुके दिमाग वाले शायर थे. एक ऐसा शायर जो पूरे परिवेश के बारे में कुछ अलहदा तरीके से सोच रहा था। बाद में राजनीतिक घटनाओं को छोड़ दिया जाए तो मुनव्वर जैसी ही सोच रहे थे जैसे उनके शेरों में दिखते थे। वे गंगा जमुनी तहजीब के हमी और वकील डॉक्टर थे। हो सकता है कि बचपन में मस्जिद और नोएडा में रेस्टॉरेंट का प्रभाव हो कि वे हिंदी मुस्लिम एकता पर स्थिर और स्थिर थे।

रिश्ते का कौन सा कारागार कहा जाता है ये तो एक-दो मुलाकातों में ही मुझे याद रहता है साफ हो जाता है। जबकि शायर में बहुत सारे लोग और प्रशंसक से मिले-जुले लोग रहते हैं। उनके लिए राजकुमारियों के नाटक का एक सबुट ये भी था कि वे अपने संगीतकारों में अक्सर अपनी बिटिया का ज़िक्र करते थे। मां से जुड़ा शेर तो श्रोता मांग कर पढ़ता ही रह रहा।

माटी और मुजाहिदीन से उनकी कॉलोनी ही थी कि मुहाजिरनामा बन सका। इसके शेर और उससे जुड़ी बातें लेकर वे अक्सर बहुत सारी बातें करते थे। उन्हें और उनके पिता को भी जन्मस्थान लॉज का दर्द सालता था। इस दर्द के जरिए उन्होंने मुजाहिदीन की तकसीम की और यहां के लोगों के हिजरत करके वहां गए, फिर सरहद के इस तरफ की मुलाकात सुनहरी यादों को उन्होंने आवाज दी। हिजरत पर शोक व्यक्त करते हुए उन्होंने उस परदेसी की पीड़ा को भी आवाज दी। वे परदेशी जो नौकरी के लिए अपना घर-बार छोड़ कर शहरी जीवन जी रहे हैं। जो यंत्रवत चल तो रहे हैं लेकिन अपने पूर्वजों की याददाश्त आखों को नाम कर देते हैं।

एक खास बात और समीक्षा थी कि रिश्ते के शेर ने खुद मुनव्वर की आंखें लगातार पजती की थीं। साथ में सभी लोगों की आंखों के कोने में नम हो गए। और ये फिल्म उन लोगों के साथ भी हुई थी जो कई बार मुनव्वर को सुनने को मिले थे. ये उनके पुरअसर मंजरकसी का परिणाम था।

मित्र लाल नंदा का कार्यक्रम
एसोसिएट प्रोफेसर लाल नंदन दिल्ली में या कई बार दूसरे शहरों में होली का आयोजन करते रहते हैं। इनमें बहुत सारे नामचीन लोग जमा होते थे। एक दफा मुनव्वर ने कहा कि आज चलो नंदा जी के कार्यक्रम में किराया ले जाते हैं। वहां वे लोग ऑर्केस्ट्रा में बैठे दिखेंगे जो किसी भी कार्यक्रम में मंच पर होते हैं। दिल्ली में आयोजित इस कार्यक्रम में बिल्कुल यही बात हुई। अगल बगल में वही लोग थे जिन्हें मंच पर देखा जा रहा था। वहां भी मुनव्वर ने मुहाजिरनामा पढ़ा। बाकी सभी की आंखों में किताब उतर आई थी। असली रिश्ते की शायरी का असर कुछ ऐसा ही हो रहा था.

मुनव्वर ने अपनी शायरी में राजवंश की मुहब्बत को जो अल्फ़ाज़ दिया, उनके असर के पीछे एक अहम बात यह भी रही कि उस दौर में बहुत बड़े बदलाव आए थे। लोगों ने बहुत कुछ हासिल किया लेकिन राष्ट्रहित की किताब में सभी के हाथों में गरीबी ही आ रही थी। पूरे परिवार के साथ रहने वाले लोग शहरों में एक कर अकेलेपन ही हासिल कर सके थे। इस दौर में वो पीढ़ी अभी जिंदा थी, जिसके स्कूल में स्लेट-पटरियों की पढ़ाई हुई थी।

कूड़े की मिट्टी का खेल बड़े पैमाने पर किया गया और शहरी फ्लैटों में जमीनें बनाई गईं। अपनी मेहनत से काम किया और उसी में खप जाने वालों के लिए इश्क, माशुका जैसी कहानियों ने उनके लिए पैसों की कीमत नहीं रखी थी, लेकिन याद रखा कि राखी पर आने वाली बहन का प्यार था। या गाँव में रह रही माँ। मुनव्वर के शेर सुनने वालों पर असर करते हैं-

बहन का प्यार, माँ की ममता दो चीखती आँखें
यही तोहफ़े थे वो जिन्हें मैं बार-बार याद करता था

एक जिम्मेदार आदमी को अपनी बहन की शादी की चिंता बनी रहती है और उसे ही मुनव्वर ने संजीदगी से आवाज दी –

किस दिन कोई रिश्ता मेरी मातृभूमि को मिलेगा
कब नींद का मौसम मेरी आँख को मिलेगा

घर में यूँ सयानी लड़कियाँ रहती हैं
जैसे साहिलों पर कश्तियां एसोसिएट्स रहती हैं

ये भी मेरी बेटी से डेटिंग जुलती है
कहीं भी शाखे—गुल देखो तो झूला डाल देता है

ऐसा नहीं है कि इस बड़े शायर ने जिंदगी के दूसरे हिस्से या ग़ज़लों का समग्र स्वरूप ही छोड़ दिया हो। उनकी शायरी उन मसलों पर भी वैसी ही भारी रही। पिछले दौर में उनके कुछ स्क्रीनशॉट्स और कुछ मामलों को लेकर काफी विवाद भी हुआ था, लेकिन बाद में भी ये एक हकीकत है कि मुनव्वर के स्पेशलिस्ट उनके लिखे हर्फों से याद रहेंगे। आख़िरकार उनकी कुछ यादें जीने वाले शेर व्यू में –

अगर वर्गीकरण से ही सभी बच्चों का मुकाबला किया जाता है
तो फिर ऐ मुफ़लिसी हम दाँव पर कसाई हैं।

नींद को सर बुलन्दी भी आता है दुनिया में
जो आपके सर के नीचे हाथ का तकिया तकिया हैं।

शहर में मय्यत को सब कंधा नहीं देते
हमारे गांव में छपर भी सब मिल कर शेयर हैं।

मिट्टी का बंधन कर दिया मिट्टी के बर्तन
मिट्टी को कहीं ताज-महल में नहीं रखा।

फ़की न ‘मुनव्वर’ ने बुज़ुर्गों की पहचान की
दस्तार पुराना है मगर छोड़े हुए हैं।

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