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विटामिन से भरपूर है ये फल, जमीन पर नहीं होती इसकी खेती, जान को खतरा होता है हासिल


मनीषपुरी/भरतपुर. आज हम आपको एक ऐसी ऐसी खेती के बारे में बताएंगे जो जमीन पर नहीं है। इस बागवानी के लिए एक अलग तरह के माध्यम की जरूरत है। लेकिन इस खेती से पैदा होने वाला फल आप सभी ने जरूर खाया होगा, शरद ऋतु के आगमन के साथ ही यह फल भी बिकने के लिए आता है।

अजीब सी भाग का यह फल जो बहुत से विटामिन और वस्तुओं का बड़ा खजाना है। हम बात कर रहे हैं सिंघाड़े की, सिंघाड़ा पानी में जाने वाली फ़सल है। जो पुराने समय से ही तालाबों और जिला भव्य भूमियों पर आधारित हैं, जिन्हें पानी में सजाया जाता है। आम तौर पर भारतीय कैलेंडर के आषाढ़ माह से ही सिंघाड़ा की रिकॉर्डिंग के समय की शुरुआत होती है। इसके लिए किसान पानी में उतरकर जमीन के ताल पर उसके बैलों के एक हिस्से को दबाते हैं। उसके बाद पानी में ही खादी स्थिर स्थिरांक अपने बेलों को बढ़ाने का अवसर प्रदान करते हैं। जलीय वनस्पतियों के होने का कारण कट जनित विक्रेताओं का सबसे अधिक खतरा रहता है। इसके लिए किसानों ने पुराने समय में पारंपरिक औषधियों का उपयोग स्थिर समय में अपना स्थान रासायनिक औषधियों द्वारा कर लिया है।

बाजार में बिक रही 50 रुपये किलो
इस पर लगने वाले फल को तैयार करने में 100 से 120 दिन का समय लगता है। सिंघाड़ा की पहली हरवेस्टिंग के समय किसान अपने देवता को स्थापित करने के लिए विशेष पूजा पाठ रखते हैं। सिंघाड़ा की हरवेस्टिंग के लिए बहुत जटिल प्रक्रिया अपनानी है। इसके लिए किसानों को पानी में उतरकर बैलों से जलाए गए एक-एक सिंघाड़े को अलग करना है। पुराने समय में इसके लिए किसानों के लिए चार मठों को एक नवनावा शिखर के शिखर पर रखा जाता था। उनके साकेत से पानी में उतरकर सिंघाड़े की चौड़ाई करते थे धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे नव का स्थान नाव में डूबे हुए नव का स्थान में प्लॉट में जाने वाले यूट्यूब में दे दिया गया है। फसल के शुरुआती दिनों में सिंघाड़ा के भाव स्थानीय मंडी में ₹50 किलो या उससे ऊपर भी मिलते हैं। लेकिन जब फसल की कटाई परिवहन पर होता है। उस समय भाव काम होते रहते हैं। कई बार तो ₹10 किलो से भी मिथिलेश स्तर पर आ जाते हैं।

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पहले प्रकाशित : 29 अक्टूबर, 2023, 14:28 IST



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