उत्तर
टाइप 2 मोटोपे से बचने के लिए
व्यवसाय से गुर्दों और रेलवे पर भी असर पड़ता है
बच्चों में संवाद के लक्षण वक्त रहते पहचानें
बच्चों में मधुमेह डॉक्टर का दृष्टिकोण: सहकर्मी शब्द हैरान दिमाग में प्रकट होता है कि यह सिर्फ विस्कॉन्सिन और वयस्कों में शामिल होने वाली बीमारी है, यह एक भ्रम है। बच्चों के अलावा विश्रामालय और बच्चों में भी यह बीमारी पाई जाती है। इन दिनों की खराब जीवन शैली और स्थिति में उद्योगों के कर्मचारियों के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। वर्कआउट एक ऐसी बीमारी है, जिसमें शरीर में कार्बोहाइड्रेट्स का मेटाबॉलिज्म (चयापचय) करके ऊर्जा बनाने की क्षमता में कमी आ जाती है। बीता रही हैं इंदौर के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल के डॉ. रुचिरा पहाड़े, (कंसल्टेंट पीडियाट्रिशियन) बच्चों में होने वाली एलर्जी की समस्या के बारे में:
वर्क्स में पेन्क्रियाज नामक एक ग्रंथि हारमोन (इंसुलिन) द्वारा बंद या कम हो जाती है। इंसुलिन की कमी में शुगर का मेटाबॉलिज्म ठीक तरह से नहीं होता है, जिससे वह खून में ही रहता है, जिसे हाइपरग्लेसेमिया कहा जाता है। सहकर्मी किसी भी उम्र के हो सकते हैं। श्रमिक दो प्रकार की होती हैं टाइप 1 और टाइप 2 श्रमिक. बच्चों में ज्यादातर टाइप 1 ही होता है।
टाइप-1 कर्मचारी: इसमें शरीर में कुंडली बंद हो जाती है। कुछ समय पहले तक सामान्यतया बच्चों में टाइप-1 सिगरेट ही होती थी, इसलिए इसे जुवेनाइल (किशोर) शराबी भी कहा जाता है। बच्चों को नियमित रूप से इंजेक्शन स्कॉलर की फिल्में दी जाती हैं।
टाइप-2 कर्मचारी: यह थोड़े बड़े बच्चों जैसे कि मिनेसोटा और किशोर में होता है। इसमें इंसुलिन का उत्पादन या तो कम होता है या फिर इंसुलिन प्रतिरोध (इंसुलिन प्रतिरोध) की स्थिति होती है। यह बच्चे ज्यादातर के शिकार रहते हैं या आयुर्वेदिक चिकित्सक काफी कम होते हैं इसलिए यह बीमारी हो जाती है।
1 भूख लगना
2. वजन कम होना
3 बार-बार पेशाब आना, विशेषकर रात में बार-बार पेशाब आना या मोटापा आना
4 बहुत ज्यादा प्यास लगना और मुंह सूखना
5 चिड़चिड़ापन व थकान महसूस होना
6 बार-बार संक्रमण होना
7 घाव या चोट का जल्दी ठीक न होना।
1 गुर्दे की क्षति (डायबिटिक न्यूरोपैथी)
2 गुरदो पर असर होना (डायबिटिक नेफ्रोपैथी)
3 आंखों (रेटिना) पर प्रभाव और कभी-कभार अंधापन भी हो सकता है
4 हृदय रोग व स्ट्रोक जैसा प्रभाव एचएल
5 डायबिटिक कीटोएसिडिकोसिस – यह एक खतरनाक स्थिति है जिसमें समय पर इलाज नहीं किया जा सकता तो रोगी कोमा में जा सकता है या मृत्यु भी हो सकती है।
7 बच्चों के विकास, वजन और माप पर प्रभाव पड़ सकता है।
मेडिकल आहार लें और अधिक चीनी व भारी कार्बोहाइड्रेट पदार्थों का सेवन। बच्चों को शारीरिक रूप से सक्रिय रहने के लिए अनुमति दी जाती है, जैसे कि प्रतिदिन 1 घंटे का खेल कूदना, साइकल चलाना आदि कार्बोहाइड्रेट का सेवन करना, जिससे उन्हें मोटापा न हो। यदि बच्चे का वजन जल्दी बढ़ रहा है तो डॉक्टर की सलाह लें और डायटिशियन को भी बताएं। इस प्रकार ग्राफ़ से वाली टाइप-2 से बचा जा सकता है।
1. बच्चों और सुपरमार्केट में ब्लड ग्लूकोज की जांच के लिए ब्लड ग्लूकोज का पता लगाया जा सकता है।
2. हीमोग्लोबिन एआईसी टेस्ट (HbAIC) से भी पता लगाया जा सकता है और पिछले कुछ महीनों में शरीर में शुगर का नियंत्रण भी किया जा सकता है।
3. इसके अतिरिक्त पेशाब में शुगर की जांच की जा सकती है, जिससे पेशाब का पता चल सकता है।
बच्चों में डॉक्टर के निर्देश पर डॉक्टर के निर्देशानुसार नियमित दवा का इंजेक्शन (इंसुलिन) या गोली लेते रहें और डॉक्टर के संपर्क में रहें। नियमित रूप से खून में शुगर की निगरानी के लिए ग्लूकोमीटर नामक एक मशीन से ‘खून में शुगर की घर पर जांच की जा सकती है। नियमित रूप से HbA1c लेवल की जांच से पिछले तीन महीनों का शुगर कंट्रोल पता किया जा सकता है। बच्चों को ज्यादातर देर तक भूखा ना रहने के नुस्खे और उनकी शारीरिक स्थिति पर ध्यान देना चाहिए।
इसके अलावा यह भी ध्यान देने की चेतावनी है कि यदि बच्चा अधिक खेल कूद करता है और अधिक देर तक भूखा रहता है तो उसका शर्करा स्तर कम हो सकता है (हाइपोग्लाइसीमिया) जिससे वह बच्चे को तुरंत कमजोरी महसूस हो सकती है, ग्लूकोज का पानी या बिस्किट आदि खाया जा सकता है ताकि उसका जीरो लेवल हो जाए। सबसे बड़ी समस्या तुरंत ऐसे अस्पताल में जहां चौबीस घंटे डॉक्टरों की सुविधा हो, ताकि तत्काल इलाज मिल सके।
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टैग: मधुमेह, स्वास्थ्य सुझाव, जीवन शैली
पहले प्रकाशित : 15 नवंबर, 2023, 11:27 IST
