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व्याख्याकार: एडल्ट्री क्या है, इसका कानून क्या है, इसे गलत क्यों माना जाता है


उत्तर

पहले हमारे यहां शादी से बाहरी सेक्स संबंध बनाना को अपराध माना जाता है अब नहीं बल्कि लेकर फिर रिव्यू हो रही है
सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2018 में इस कानून को रद्द कर दिया था लेकिन इस संबंध को तलाक का आधार जरूर बनाया गया
भारत में करीब 150 साल पहले तक एडल्ट्री कानून चलाया गया था लेकिन इसे पुर्तगालियों के खिलाफ मनमाना बताया गया था

एडल्ट्री के स्थिर भवनों पर विचार करने और समीक्षा करने के लिए संबंधित भवनों को तैयार करने के लिए एक संसदीय समिति बनाई गई है। एडल्ट्री एक अंग्रेजी शब्द है, जिसका हिंदी अर्थ व्यभिचार है। व्यभिचार विवाहित लोगों के बीच विवाह से लेकर शारीरिक माप या अन्य किसी के साथ गलत धारणा को कहा जाता है। अधिकांश समाजों में इसे गलत अलगाव से ही देखा जा रहा है, कुछ देशों में इसे लेकर असत्यापित कानून भी हैं। हालाँकि भारत में इसे लेकर कानून के अभिलेख दिए गए थे। इसे फिर से क्रैक करने की मांग हो रही है।

एडल्ट्री शब्द पुराना फ्रांसीसी शब्द “एवोट्रे” से आया है। “एवाउट” लैटिन शब्द “एडल्टेरियम” से आया है। यह लैटिन क्रिया “एडल्ट्रेरे” से आया है, जिसका अर्थ है “भ्रष्ट करना”।

करीब दो साल पहले जब इंडोनेशिया की संसद ने एडल्ट्री को आपराध के कानून को मंजूरी दी थी तो इसकी सबसे ज्यादा चर्चा भारत में हुई थी।

हमारे देश में एडल्ट्री कानून 150 प्राचीन काल से भी अधिक पुराना है। बस पहले पति को ही ऐसे सजा देने वाला अपराधी माना जाता था लेकिन अब कानून में बदलाव करते हुए इसमें महिलाओं को भी शामिल किया गया है यानी कि अगर वो भी ऐसा करता है तो अपराधी को दोषी मानता है और पुरुषों की तरह की सजा की मांग करता है। बाद में इस कानून को कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया था.

एडल्ट्री या धारा 497 क्या है?
धारा 497 केवल उस व्यक्ति के संबंध को अपराध मानता है, जिससे किसी और की पत्नी के साथ संबंध हैं। पत्नी को न तो व्यभिचारी और न ही कानून में अपराध माना जाता है, जबकि आदमी को पांच साल तक जेल का सामना करना पड़ा था।

जबकि महिला के खिलाफ कोई भी मामला दर्ज नहीं किया गया था और उसे किसी भी प्रकार की सजा नहीं दी गई थी। इस कानून के तहत पति, पत्नी से संबंध बनाने वाले पुरुष के खिलाफ मामला दर्ज किया जा सकता था, लेकिन पत्नी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो पाई थी।

इस कानून को क्यों रद्द किया गया
2018 में सुप्रीम कोर्ट में एडल्ट्री (व्याभिचार) कानून को रद्द कर दिया गया था। हालाँकि 2018 से पहले यह भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के अंतर्गत दंडनीय अपराध था। इस जुर्म में पाँच साल की सज़ा और साख़ की सजा भी थी।

27 सितंबर 2018 को चीफ चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने इस कानून को दिए गए अवैज्ञानिक अधिकार देते हुए कहा था, “एडल्ट्री को क्राइम की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है और इसे जुर्म भी नहीं किया जाना चाहिए।” इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संविधान पीठ ने जोसेफ शाइनीसन की अंतिम याचिका पर फैसला सुनाया था, जिसमें विवाहेत्तर संबंध बनाने को अपराध वाली धारा 497 को अवैधानिक दोषी ठहराया गया था।

भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 497 को मनमाना और अप्रासंगिक घोषित करते हुए जस्टिस मिश्रा ने कहा, “अब यह देखने का मतलब है कि शादी में पति, पत्नी का मालिक नहीं होता है।” स्त्री या पुरुष में से किसी एक का भी वैधानिक सम्प्रभुता के आधार पर दोष सिद्ध होता है।”

साथ ही संविधान पीठ ने यह भी जोड़ा कि व्यवहार आज भी तलाक का एक मानक आधार है, पर आपराधिक जुर्म नहीं।

भारत में करीब 150 साल पहले एडल्ट्री एक ऐसी कानून थी जिसमें पुरुष तो दोषी माना जा सकता था लेकिन महिला नहीं, इसी तरह अन्याय सामान्य कानून भी कहा जाता था। (प्रतीकात्मक फोटो)

150 पुराना कानून क्या था
1860 में बना यह क़ानून लगभग 150 वर्ष पुराना है। धारा 497 में यह स्पष्ट किया गया है कि यदि कोई महिला अपनी सहमति से शारीरिक संबंध बनाती है, तो पति की याचिका पर इस मामले में पुरुष पर व्यभिचार कानून के तहत आरोप लगाया जा सकता है। था.

ऐसा करने पर पुरुष को पांच साल का बच्चा और तंगहाली या फिर दोनों ही सजा का बंधन भी था। हालाँकि इस क़ानून में एक धारा यह भी थी कि यदि कोई किसी अविवाहित या विधवा महिला से शारीरिक संबंध बनाता है तो उसे व्यभिचारी के तहत यौन संबंध नहीं माना जाता है।

जब कानून बना तो क्या थी महिलाओं को लेकर हंगामा
यह वास्तव में दिलचस्प है कि ‘एडल्ट्री’ के अपराध को 1837 में थॉमस बैबिंगटन मैकॉले यानी लॉर्ड मैकॉले की तैयारी में भारतीय दंड संहिता के पहले ड्राफ्ट में स्थान नहीं मिला था।

यद्यपि विधि आयोग ने 1847 में दंड संहिता की अपनी दूसरी रिपोर्ट में इस पर फिर से विचार किया और लिखा: “जबकि हम दिखाते हैं कि व्यवहार की अपराध संहिता को समाप्त नहीं किया जा सकता है, हम महिला के साथ व्यवहार के लिए अपने कानून को सीमित कर सकते हैं।” इस बात पर विचार करते हुए कहा गया कि इस देश में महिला की हालत, इसके प्रति सम्मान में, हम अकेले पुरुष अपराधी को सजा के लिए जिम्मेदार ठहराएंगे। फिर इसे एडल्ट्री कानून के तौर पर रखा गया और महिलाओं को दोषी नहीं माना गया, जिसे बाद में धारा 497 के तौर पर पेश किया गया।

हालाँकि यह कानून बनने के बाद भी इस पर विवाद बना हुआ है। अंततः जब न्यायालय में इसे चुनौती दी गई तो सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर विचार किया। फिर इसे रद्द कर दिया गया. अब ये एडल्ट्री लॉ का इतिहास चुकाया जा चुका है.

पहले सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की थी ये बात
इससे पहले 1954, 2004 और 2008 में सुप्रीम कोर्ट में आए ड्यूक की धारा 497 में बदलाव की मांग को खारिज कर दिया गया था। फिर इसके बाद केरल के रहने वाले जोसेफ शाइन से सुप्रीम कोर्ट में पी वॉयल सप्लायर्स की कोर्ट को धारा 497 की अपील पर फिर से विचार करना चाहिए क्योंकि यह लिंग के आधार पर भेदभाव करने वाला है।

सेना में लागू होता है ये कानून
भारतीय सेना में एडल्ट्री कानून (भारत में व्यभिचार कानून) लागू है। यानि सेना में कोई भी गैर-बराबरी मर्द किसी भी अन्य महिला के साथ उसके पति की सहमति के बिना शारीरिक संबंध नहीं बना सकता है।

दुनिया में क्या है स्थिति
– अधिकांश इस्लामिक देशों में व्यवहार एक अपराध है और इसकी कड़ी सजा है।
– संयुक्त अरब अमीरात के अधिकांश देशों में व्याभिचार को लेकर बनाया गया कानून महिलाओं के खिलाफ ही हैं।
– अमेरिका के 20 राज्यों में व्यभिचार एक अपराध है।
– सऊदी अरब में मृत्युदंड की सजा का प्रावधान है
– इंडोनेशिया में हालांकि ये अपराध है लेकिन इस मुस्लिम बहुल देश में इस पर कम ही मामले दर्ज होते हैं।

भारतीय समाज में व्यवहार
भारत में व्यवहार को बहुत बुरा माना जाता है। प्राचीन काल से एडल्टी का अच्छा अंतर्विरोध नहीं देखा जा रहा है।

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