दीपक पांडे/खरगोन।पुराने ज़माने में तालाब, तालाब, पानी का मुख्य स्रोत बाज़ार थे। लोग यहां के पानी को पीने और घरेलू काम में इस्तेमाल करते थे। इनमें से कई उल्लू के पेड़ आज भी जीवित हैं और हजारों लोगों की आस्था से जुड़े हुए हैं। वो इसलिए क्योंकि इन पशुपालकों के संस्थान और यहां का पानी पीने से लोगों की गंभीर बीमारी भी दूर हो जाती है।
आज हम आपको मध्य प्रदेश के खरगोन जिले के पवित्र नगरी मंडलेश्वर में मौजूद एक ऐसी ही प्राचीन मूर्ति के बारे में बता रहे हैं। किवदंती है कि यहां चर्म रोग और लकवा की बीमारी और बाहरी बच्चों से संक्रमित मरीज़ते नहीं है तो वें ठीक हो जाता है। इसकी वजह यह है कि हर मंगलवार को दूर-दूर से यहां कई ऐसे पर्यटन स्थलों का भ्रमण होता है।
हज़ारों साल पुरानी है बावड़ी –
इतिहास के जानकार दुर्गेश राजदीप ने बताया कि मंडलेश्वर में कसरावद रोड पर प्राचीन श्री मंडनेश्वर शिवालय (श्री छप्पन देव मंदिर) परिसर में दक्षिण दिशा में यह बावड़ी बनी हुई है। बावड़ी का इतिहास करीब हज़ार साल पुराना है। आदि गुरु शिष्य एवं पंडित मंडन मिश्र के बीच शास्त्रार्थ की समकालीन कृतियों का निर्माण हुआ था। पत्थर से बनी यह बावड़ी आज भी जीवित सुरक्षित राज्य में मौजूद है।
इन देशों के लिए है जीवन दायिनी
वेन्ट का सुझाव है कि इस बावड़ी का पानी कभी ख़त्म नहीं होता। बारिश हो रही है सूखी गर्मी बारिश में हमेशा पानी भरा रहता है। खास बात यह है कि यहां का पानी एकदम साफ रहता है। यहां का सिद्धांत है कि जो व्यक्ति चार्म रोग और लकवा (पारा बस) से प्रभावित होता है वहां से ठीक हो जाता है। इसके अलावा जिन लोगों को बाहरी बाधाओं की समस्या होती है तो वे भी यहां एनईएसईए में आते हैं। इसकी वजह यह है कि लोग इसे चमत्कारी बावड़ी कहते हैं।
आज भी आस्था है
दुर्गेश राजदीप ने कहा कि पहले यहां हर मंगलवार को भारी संख्या में लोग संस्थान में आते थे, लेकिन पास में बह रहे नदी का पानी मिल में जाने से लेकर बावड़ी का पानी बहुत कम हो गया है। फिर भी इसकी लोक आस्था निश्चित है। आज भी मंगलवार की सुबह यहां चर्म रोग, लकवा ग्रहित और बाहर के बच्चों से धीरे-धीरे आराम से नहाते हुए देखा जा सकता है।
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पहले प्रकाशित : 22 नवंबर, 2023, 23:13 IST
