हिनहिनाते घोड़ों की खर्जियों में स्वप्न भर कर एक बच्चे की कलम की राह चलती है और अचंभे के साथ पूरी तरह से देखी जाती है। धीरे-धीरे धीरे-धीरे उसके संगी-साथी बन जाते हैं और वह उसका साथ निभाने लगता है। अब वह शब्द लिख सकते हैं और नई पंक्तियाँ बना सकते हैं। घोड़े दौड़ाते हैं उसके स्वप्न खुरजी से लेकर रैंक तक, वह उदास होती है। उन्हें सीखना-सिखाने की एक पारंपरिक और स्वीकृत दुनिया में एकीकृत और चलन में शामिल किया गया है। इस दुनिया में पहली बार इंसान के अलावा उसकी कुछ और होने की खबरें हैं। उसे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि मनुष्य के अलावा एक मनुष्य के अलावा कुछ और होता है। क्या मनुष्य का मनुष्य ही एकमात्र परिचय नहीं हो सकता? वह लिंग, जाति, धर्म, अर्थ, राष्ट्र सभी वर्णों को लंघकर मनुष्य बने रहने की कोशिशों में शामिल हैं, पंक्तियाँ पाई जाती हैं। सच जुड़े हुए हैं, विचार रखे गए हैं। स्मृतियां सम्मिलित होती हैं, दृश्य निर्मित होती हैं। और टैब का जन्म उनकी कविता है। वह कवि नहीं कहलाना चाहता है, वह पत्रकार है मगर वह इंसान समझे जाने की अनोखी ज़िद के साथ हट-हट धूप में खड़ा है। कविता उसे छायांकन है. वह धूप में सच की खोज में भागता रहता है। डस्ट फ़ांकता है, ए आटा घिसता है और पसंदीदा कविताएँ नहीं लिखता है। कविताएँ उसके पास आती हैं वह उसे लौटाता है जो नहीं लौटती वे त्रिभुवन की कविताएँ कहलाती हैं।
आप जब त्रिभुवन को पढ़ रहे हों तो उनकी कविता ‘अबलाक़ ख़्वाब, कुम्मैत घोड़ा’ न पढ़ें।
किसी कवि की कविताएँ उसे मनुष्य के विशेष रूप से परास्त करती हैं। साथ ही साथ उसका जीवन, उसकी चाहत, उसकी दुनिया और उसके ब्रह्मांड के उपकरण भी मिलते हैं। उसके विशिष्ट होने के कारण उसके मन की दुनिया भी बड़ी अनोखी होती है। इसमें बहुत सी वस्तुएं शामिल नहीं हैं, बल्कि बहुत ही कम और महंगी वस्तुएं इत्मीनान से बची और रखी गई हैं। इसका चयन वास्तविक दृष्टि और विभिन्न प्रकार की कल्पनाओं से बनी एक ऐसी दुनिया है जिसमें उसके विचार, उसकी इच्छाएं, ज्ञान और उसकी इच्छाएं, सभी विचार मौजूद हैं। अनमोल वचन अनाम से उसके मानस का गहरा परिचय होता है। जब आप किसी कवि के सभी डिमांडल्स को प्रकाशित करते हैं तो उस कवि के अंतस का एक टुकड़ा छूकर महसूस कर लेते हैं।
कविताएँ कवि के सबसे ईमानदार और शिष्य स्वरूप से हमारा साक्षात्कार करवाती हैं। आपको लगता है कि किसी कवि की पत्रिका को ‘थोड़ा जान पाया’ है, यह बात आपके पाठकों को स्पष्ट रूप से बताती है और आपके भीतर निश्चित रूप से कुछ पत्रिकाएँ हैं। मैंने त्रिभुवन की अब तक सभी मॉडलों को बार-बार की ओर से प्रकाशित किया है।
त्रिभुवन एक ईमानदार और सफल पत्रकार हैं। वे एक भावुक कवि नहीं हैं, बल्कि तर्क करने वाले रूमानी कवि हैं। वे कभी-कभी प्रेम में भावुक गाली-गलौज भी नहीं करते, मगर वे किसी तरह की नाजायज और गलत बातें पर उस विचारधारा के प्रभाव में आ जाते हैं, जो ‘अति’ करने का साहस है। वे प्रेम करते हैं, प्रेम की यादों का जश्न भी मनाते हैं। वे नहर के पास बारिश में तेज साइकिलें चलते हुए हर प्रेम के स्पर्श को घुटने की गहराई से महसूस करते हैं लेकिन वे प्रेम के नाम पर व्यभिचार के व्यवसाय का भी प्रचार करते हैं। वे काम-वासना और प्रेम के सहजीवन के बीच की पारगमन को भली-भांति जानते और समझते हैं।
त्रिभुवन की कविता के पास हर प्रकार की हिंसा के लिए प्रतिरोध प्रतिरोध की भाषा है। हर प्रकार की तानाशाही लोकतांत्रिक जिरह के खिलाफ है। वह सरहदों के साथ नहीं दिखते, वह मांस और खरगोशों के साथ नहीं दिखते। उसके पास वह देखता है कि वह ईश्वर में राक्षसों को देख सकता है और सीता की आँखों में दुःख की दुनिया में बहुत-से राक्षसों को देख सकता है। उनकी मंडली में पन्हाए थान, नवप्रसूता के शृंगार, गगन टीले पर रेंगती बीरबहूटी बादल, मैली बुद्धि, हारे में राखी कढ़ावनी, बिलौवे की छाछ, लीलतांस, चांद-जलैरी, जिया-जून, कलायां, काल-विंधूस, आत्मदर्प की अठनियों के लिए जगह है.
त्रिभुवन अपने डेमोक्रेट में कहते हैं कि बच्चे तक डायनासोर हैं और सम्मोहन तक प्रकट हैं प्रेम। उन्होंने अपने प्रेमी के साथ उजास में नाहलये को अपने दिल को छूते हुए देखा, शायद चांद के टुकड़े से दूसरे नंबर पर चले गए। यह मूक वक्ता भी उन्होंने अपने द्वारा रचित उजास के प्रति कृतज्ञ रहते हैं, वह अमित प्रेम में डूबे धैर्यवान कवि हैं। वह कहते हैं:
स्वाद देह में देह का नहीं
प्रेम का है।
उनके प्रेम में एसएमएस वाला प्रेम है, चाँद वाला प्रेम है, कामनाओं में तैरता हुआ प्रेम है। नक़्क़ाशी औरत है और अनदेखा से पहचाना आदमी भी है। वह खेती-बाड़ी और बातचीत करना चाहते हैं। वह आलिंगन और अपने मौन का सम्मान चाहते हैं। अनदेखी को ऐसा करुणा प्रत्युत्तर शायद ही किसी कवि ने दिया हो:
रेतीला मत करो
कि समा जाऊं गहरे भँवर में।
नजर में तीन जलमहलों का निर्माण न करो मेरी
कि सम के धोरे पर रख दी गई मछली हो जाऊं!
वह चाहती हैं कि वे संसद तक सार्वजानिक-प्यासे लोगों की तलाश में रहें। वह चाहती हैं कि हर घर में वसंत ऋतु हो, केवल सत्ता की गलियों में नहीं खिले फूल। कवि की एक अत्यंत विलक्षण कविता है ‘शूद्र’ जिसे पढ़ने के बाद आप कुछ देर तक सन्न हो जाते हैं। आपके आस-पास ऐसे दृश्य समुद्र तट आते हैं जो करुणा से जुड़े होते हैं और आपके समाज को आईना दिखाते हैं। यह कविता मानव के लोकतांत्रिक अधिकार के ज़बरदस्त हनान और उनके प्रति गंभीर मंत्रालय को सिखाती है। कवि कहते हैं: हिंदू-अंत:करण में शूद्र को गरिमा का स्थान नहीं मिला है।
‘शूद्र’ एक बड़ी कविता है जो आपके आकार, स्वामी और संवेदना के कारण है। वरिष्ठ कवि और आलोचक असद ज़ैदी कहते हैं, “त्रिभुवन की कविता ‘शूद्र’ कविता के ज़ीनत आकर्षण में एक सभ्यता परक आख्यान है; साथ में हमारे वर्तमान की सर्वांगीण आलोचना भी। ‘शूद्र’ काव्य में कवि की समाजशास्त्रीय दृष्टि, इतिहास और मिथक के ज्ञान और सिद्धांत के दर्शन का समावेश तो होता ही है, एक निरालंकृत शैली में दबे हुए काव्य-गुणों की झलक भी होती है। जिस समाज में सारि रचना बेसमेंट में हुई है, जिसमें ऊपर की मंजिलों में स्थापित श्रेष्ठजन के विचार में वह बेसमेंट डेस्टिलेशन रहता है। उनका योगदान, उनके विद्रोह और क्रांतियों तक, स्मृतियों से लुप्त हो चुका है। त्रिभुवन की यह कविता इस विशाल फिलाडेल्फिया का काम बड़ी प्रश्नकुलता, विवेकशीलता और नैतिक दृढ़ता से करती है। हमारे समय में दलित विमर्श एक विद्वत धारा के रूप में खोजा गया है। इस दावे से भी कवि त्रिभुवन की यह रचना अपनी सामाजिक और काव्यात्मक रचनाशीलता शानदार ढंग से सहजता से करती है।
कवि अपनी मंडली में सामाजिक सोच पर कटाक्ष करते हुए कहते हैं: “घृणा संस्कार है और प्रेम एक अवैध गतिविधि है।”
एक पुरानी संस्कृति के दृढ़, सुन्दर,साहिष्णु हरेपन का क्षय अगर आपको पसंद है तो आप त्रिभुवन की कविता ‘अरावली के आखिरी दिन’ को पढ़ें। मिश्रित छोटी-छोटी कोशिशों के थकने और दौड़ सकने की उजली कोशिशों को हांफते देखकर आप समझ जाएंगे कि मनुष्य अधोगति की ओर बढ़ रहा है इस दृढ़ सोच के साथ कि ऊर्ध्वगामी वह पा एक दिन सारा आकाश। अपने और साहसिक प्रयासों के साथ दम तोड़ने लगेंगी। अपेक्षित बैलगाड़ी से मोटरसाइकिल घर लौट आएगी, वह लंबी यात्रा पर यात्रा से रहेगी। आंख और कान, सच का सामना करने से कतराएंगे, किताब यथार्थों के अर्थ बांचेंगे। तकनीकी और कृत्रिम ज्ञान में जालसाज मर्ज करेगा एक प्राचीन सभ्यता, एक हरी भूमि, कई पहाड़ और सभी नदियां, बच्चे किसी कृत्रिम कृत्रिम सच से मस्तिष्क भर अवशेष और ऐसे ही किसी जीवाश्म और जंक भोजन से पेट के टुकड़े भूल जाएंगे अंदर-बाहर ढ़ह रही अरावली को और मरते अरावली के आखिरी दिन को भी।
मनुष्य को लड़ाकूती-झूठा, लड़ाकू-थकाती और उदासी सभी प्राणियों की कृत्रिमता और दैहिक उपस्थिति को नष्ट करने के लिए करती है, जो कि लोकतांत्रिक कदमों की पदचाप है, त्रिभुवन की कविता ‘सन 3031’ में हो सकती है। यह कविता भविष्य में मनुष्य की मानवीयता में गहरी आस्था और रंग, नस्ल, धर्म, जाति, अर्थ-बाजार, जातिवादी दुराग्रहों में गहरी अनास्था को प्रतिरोध की भाषा में व्यक्त करती है।
त्रिभुवन की माँ की तीन खास विशेषताएँ हैं। पहला उद्देश्य यह है कि उनकी काव्यभाषा अलौकिक स्थानीयता और पदार्थमयता के जीवंत प्रतीकों को बढ़ावा दिया जाए। दूसरी ओर उनके अधिकांश बाज़ारों की अंतिम कतारें ज़र्रे के ज़ेहन में बेहद मजबूत मार्क उपस्थिति दर्ज करती हैं। ये पंक्तियां उनके सुपरमार्केट को नई ऊंचाई पर खड़े कर स्टैंड पर मिलती हैं। त्रिभुवन की मंडली की तीसरी विशेषता यह है कि सामाजिक और राजनीतिक मंडल में उन्होंने गहन अध्ययन और शोध के बाद ही कलम की शुरुआत की, वह केवल भावुकता या अपने जीवन के ठोस सिद्धांतों पर ही भरोसा नहीं करते बल्कि एक बड़े फलक पर उन शिक्षाओं को सीखते हैं तारक और मानक तरीकों से उसका वर्णन करते हैं। वे तथ्यों से रूबरू होने वाले कवि नहीं हैं वे तथ्यों को उजागर करने वाले कवि हैं।
मैंने भुवन की कविता ‘बाँसुरी’ पढ़ी और बाँस की वेदना पासकर के स्कूल में उपेक्षित बच्चों तक का मूल्यांकन किया, जो नीचे दिए गए थे और बाँस की वेदना दी गई थी। उन्हें बड़ी निर्ममता से विच्छेदित चैन की बंसी के बदले एक्सचेंज का दस्ता बनाया गया और हरियाली को नष्ट कर दिया गया। यह कविता बांस के दुखों के बारे में बताती है, जो कई आदिवासियों की उपेक्षित आबादी की पीड़ा को दर्शाती है। कम शब्दों में यह कविता बहुत बड़ी बात कही गई है।
किसी को प्रेम में ख़ुदा दिखता है, किसी को धर्म में, किसी को व्यापार में, किसी को धन में ख़ुदा दिखता है। कवि हर जगह दिखता है वसंत ऋतु, कवि हर जगह दिखता है जंगल। कूल, केली, मन, नयन, स्तन, खार, कुज़, बाग, राग हर तरफ बसंत को देखने वाले सभी से पूछते हैं:
वसंत कहां नहीं है?
वह प्रेम वक्ता अपने पर कोई लंच नहीं करता है वह सारा दोष मित्र के अचूक सम्मोहन को देता है। वह प्रेम में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं:
मैं इस तरह आना चाहता हूं
गाय के पनाह इतने में जैसे दूध
(पृष्ठ 95, कुछ इस तरह आना)
मनुष्य ने भगवान को बनाया है और वह उसे बना सकता है। मनुष्य ने धर्म बनाया है और वह उसे लागू कर सकता है। मनुष्य ने ही जाति बनाई है वह ही इसे बना सकता है। नन्हा बेबी पेपर बार-बार निर्माता ईश्वर और रबड़ से प्राप्त करता है। बच्चा सर्वोत्तम ईश्वर बनाना चाहता है इसलिए बार-बार कोशिश करता है। एक छोटा बच्चा भी जानता है नौकर और बेटे जाने का सच। फिर हम और आप कहाँ और क्यों भटक रहे हैं?
कवि अपनी दुनिया में अपने हाथ के साथ तनकर खड़ा है। वह सुखते खेत, प्यासे अमीर, उदास और उदास बादलों की खुशामद करना, देवताओं के द्वार पर अपनी प्रार्थना रखना। वे अनाथालय को राष्ट्रपति भवन के मुगल गार्डन में छोड़ दिया गया। सुखते पेड़ और रेत के उदास धोरों के प्रसिद्ध कलाकार और लाल किले में। संसद भवन के भोजन कक्ष में बांधा आएंगे बलब्लाटे घुंघराले और हिनहिनाते घोड़े को। उनका विश्वास पूरा है एक दिन खुद ही मन जायेंगे रूठे बादल…
भुवन का पूरा काव्य संसार मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट-पतंगे, वन, नहर, जल, रेत, त्रिचक्र और वाद्ययंत्रों से प्राप्त होता है। उनकी कविताएँ आम आदमी के रगों में उतरती धूप और छाँव से बनी हैं। त्रिभुवन की पांच इंद्रियों के पास ऐसी दुर्लभ स्मृतिकोश हैं जो पाठक को कविता में रामने-बसने की जगह देते हैं।
इस कवि के पास दुनिया भर के दुःख मलाल की तरह बने हुए हैं। वह उदास नजरों से देखती है कि देह व्यापार में फंसी लड़कियों को और उसके सभी उदास शब्द कागज पर बिछड़े हुए हैं। तूफान में जलती लालटेन-सी मां से पूछता है: मां तुम इंदिरा गांधी क्यों नहीं हो?
मुझे त्रिभुवन की कुछ कविताएँ बहुत प्रिय हैं। उनमें से एक कविता है “जसमिंदर, तारा याद है?” उन्होंने जिस साख्य भाव से जसमिंदर को याद किया, वही साख भाव का सुख जसमिंदर को उसकी बेटी की झोली में देने का आग्रह है। यह वह कवि हैं जो बालमन को आकर्षक सुंदर लेखनी कहते हैं।
कविता जीवन का लेखन ही तो है और त्रिभुवन की कविताएँ इस बात का प्रामाणिक प्रमाण हैं। सच्चाई की विशालता और रेखांकन और कविता को विनय का पाठ पढ़ा जाता है। अपने सच पर सतत प्रश्न चिह्न मन और कम ही सच जान, समझ और कह पाने का बोध इस कविता को कहीं भी कभी भी उत्सवधर्मी, वाचल या अँहकारी नहीं मिलता है। त्रिभुवन में तीन से अधिक मनुष्य हैं कि अपने-अपने बाजारों में वे कभी भी जरा-सा देवता नहीं बन पाते हैं। डेमोकेल के रग में यथार्थ और ज़मीनी सवाल दौड़ते हैं। वे मृग मरीचिका और मंगल गान के नहीं, यथार्थ और निजी के ज्ञाता हैं।
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पहले प्रकाशित : 27 नवंबर, 2023, 14:44 IST
