“इन दिनों महाराज कृष्णचंद्र को-बेबात पर गुस्सा क्यों आता है?” राजदरबार में लाख टके का प्रश्न था. पेज भी डर गया था कि कहीं उन्हें महाराज का कोप-भजन न मिले। महाराज के औद्योगिक उद्यम बोलती बंद हो गए थे।
उन दिनों किसी कारण से सुबह-सुबह दरबार लग रहा था। महाराज और दरबारी प्रातः काल के मन्दिर में ही कर रहे थे। एक सुबह महाराज ने राज-हलवाई को कहलवा भेजा कि उन्हें गरमा-गरम फुलको-लूची (मैदे की आधी पूड़ी) और आलू-दम चाहिए। हलवाई ने बड़ी ही यतन से पूड़ी और आलू-दाम की मंज़िल को दरबार में भेजा, लेकिन महाराज ने इसे वापस ले लिया और कहा कि पूड़ी की क़ीमती क़ीमती है। अब तो हलवाई इतना डरावना कि काटो तो नहीं! मित्र, तिबारा, भेजा गया लेकिन वही याचिका!
अब हलवाई ने महाराज को आकर्षक करने की योजना दिखाई। उसका स्मरण हो आया कि महाराज तो स्थानन पसंद करते हैं, उन्हें मिष्ठान्न क्यों नहीं भेजा जाए, क्योंकि मिष्ठान तो गर्म खाने के नियम ही नहीं हैं। उसने दरबार में अनुमति प्राप्त करने के लिए संदेश भेजा। लेकिन महाराज को पसंद पर भी वे मिष्ठान्न नहीं खा सके। उन दिनों वे मधुमेह की बीमारी से पीड़ित थे। राज मेडिकल ने मीठा खाना से मन कर दिया था.
“क्या मजाक बनाया है हलवाई ने! वह राजा का उल्लंघन कर रहा है। वह अपना नियम हम पर लादना चाहता है।”
महाराज ने तुरंत उसे सुली पर चढ़ाने का आदेश दिया। अब तो राज-हलवाई के जान के ही लाले पड़ गए। उसने राजा से विनती की कि उसे क्षमा कर दिया जाये। बहुत गिड़गिड़ाने पर राजा ने अपनी मौत की सज़ा को ख़त्म देश-निकाला की सज़ा दे दी। उसे तीन रात का समय दिया गया। तीन रात के भीतर परिवार में ही उसे राज्य से मुक्ति मिल जाएगी। फिर हुआ यूं कि हलवाई की पत्नी ने राजा के पास प्रार्थना की कि देश त्यागने से पहले उसे महाराज से मिलने का एक अवसर दिया जाए। दो रातें चलीं. तीसरे दिन हलवाई की पत्नी ने महाराज महाराज के चरण छुए।
“किस कारण से मुझसे मिलना हुआ?” राजा ने गुस्से में पूछा.
“महाराज! आज्ञा हो तो एक बात कहूँ?” हलवाईन (हलवाई की पत्नी) ने गिड़गिड़ाते हुए विनती की। उन्होंने आज्ञा दे दी.
“महाराज! मैं इस प्रकार पूड़ी और आलू-दम बना सकता हूं कि आधे घंटे बाद भी वह गर्म ही रहेगा। साथ ही ये सावधानी बरतनी है कि उसे जरा संभल कर बात करना चाहिए, क्योंकि ज्यादा गर्म मुंह में जीभ जलाने का डर है।” हलवैन ने सामान से भर कर कहा.
महाराज कृष्णचन्द्र को कुछ आश्चर्य हुआ, उन्होंने दरबार के विशेष सदस्य गोपाल की ओर मुड़कर देखा। गोपाल ने कुछ न कुछ केवल सिर हिलाया। इसका अर्थ यह था कि हलवेन को एक अवसर पर देखने के लिए कहा जाना चाहिए कि वह कौन-सा गुल खिलाती है? महाराज ने आज्ञा दे दी। शर्त यह दी गई कि जैसे ही दरबार से सूचना ली जाए वैसे ही तुरंत उनके लिए नाश्ता नाश्ता भेजा जाए।
“जो आज्ञा महाराज, आशा है कि मैं आपसे जरूर पूछूंगी।”
यह फिर एकबार महाराज के चरण प्रचारक की ओर से सीधी रसोई की ओर चला गया। गोपाल ने केवल आकर्षक मंत्री की ओर देखा।
“सबसे पहले मैं देखूंगा कि वह खाद्य सामग्री महाराज के लिए उपयुक्त है या नहीं।” मंत्री जी ने गोपाल की शैलों को आड़े हाथ लेते हुए कहा।
इस बार भी गोपाल चुप हो रहे। गोपाल की शैलियाँ को मंत्री ने अपनी हेठी समझाई। वह काली मिर्च-सामुद्रिक-सा जलकर दांत किटकिताता रहा और गोपाल तितली रहा।
हलवैन ने राजा के रसोइयों को बुलाया और मैदा सैन ने अपनी उंगली और छोटी उंगली बेलने को कहा। हलवाई तो इतना डरावना था कि उसके हाथ-पैर की धूप की स्थिति पैदा हो गई थी। अब हलवाइन ने आलू-दम कुछ सूखा हुआ-सा बनाया, फिर उसने आलू दम के पूरे भर-भरकर बड़े-बैटरी पैन के बीड़े जैसी बड़ियाँ बनाने में नंगी बेली गई कोल पुड़िया बना ली। वे बडिया समबाहु टेलिफोन-सी तिकोनी मोटी-मोटी दिख रही हैं। रसोइया भी कम डरा हुआ नहीं था. उसे भी कम्पने लगा था कि यह हैशटैग कि न जाने आगे क्या हो। हलवाई को तो हलवाई का रोमांच देखकर चक्कर आने लगे थे। अब रसोइया और हलवाई धीरे हलवाइन स्मारक ही उनका मजाक बनाते हैं। उसे पूरा विश्वास था कि वह सफल होगी।
राजा जी की आज्ञा आते ही हलवाइन ने पहले समबाहु मंदिर की चोटी वाले पान के बीड़े नुमा आलू-दम के टुकड़े-टुकड़े पुड्डियों को खौलाते घी में डाल दिया।
“छन्न-छन्न ! छन्न-छन्न!” पूड़ी की बड़ी-बड़ी तिकोनी बड़ियां अपना नाच गोदाम। वे जितनी बड़ी थीं वे भी बड़ी मोटी-मोटी बन गईं। यह देख हलवाई और रसोइया दोनों के चित्र पर शान की रेखाएं खिंच गईं। हलवैन ने रचना ही दस बीड़े-नुमा पु षिक्षाएं बनाईं। अब महाराज के सामने उनकी रचना थी। हलवाई और रसोई ने पहले ही मना कर दिया था कि वे इस कार्य में सहयोग नहीं कर सकते। एक बड़ी-सी थाली में उन्हें सजाकर हलवैन स्वयं ही दरबार में ले जाया गया।
महाराज ने जब उन्हें देखा तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। “इनका नाम क्या है?” खाने से पहले इनका नाम भी तो जान लूं।” महाराज ने मुस्कुराकर पूछा.
“इनके नाम ‘समभुजा’ हैं, इसे धीरे-धीरे मजा से लेकर चबा-चबाकर पूरा स्वाद लेते रहे। कदापि एक ही बार मुंह में न डालें, नहीं तो जीभ जलाएगी।” हलवैन ने पूरे ऑर्केस्ट्रा से पुरालेख कहा। सबसे पहले मंत्रीजी को देखना था. उन्होंने हलवाइन की बातों को नहीं माना और पूरा-पूरा समभुजा एक बारगी मुंह में ठूंस लिया। अरे ये क्या! मंत्री जी का मुँह तो खुल कर रह गया! गरम इतना कि मुंह के सामने हाथ ले अंतिम पंखा लगाने लगे। महाराज तो मंत्री जी का हाल देखकर ठाकर हँसना पड़ा। फिर उन्होंने बड़ी सावधानी से एक समभुजा को अपने छोटे-सा टुकड़े के मुंह में डाल दिया। अब तो यह था कि महाराज इधर-उधर बिना देखे एक के बाद एक का स्वाद लेने लगे। मंत्री ने किसी तरह पूरा बीड़ा खा लिया, ठंडा पानी बेच लिया। ऐसे समय में हलवैन ने उन्हें कुछ सलाह दी कि गोपाल ने स्टार्टअप से मना कर दिया। उन्होंने अब कुछ प्रोटोटाइप का साहसिक कार्य नहीं किया। दरबारियों की यात्रा एकबार महाराज की ओर जाती है तो दूसरी बार डेयरडेविल हलवाइन की ओर जाती है।
महाराज ने खा-खाकर कुछ भी नहीं कहा। उन्होंने केवल इतना कहा कि अपने गले से मोतियों की तीन-तीन लड़कियाँ निकलीं और हलवाइन के गले में डाल दिया। तब तक राज रसोई तक सूचना पहुंच गई कि महाराज बहुत प्रसन्न हैं। हलवाइन और राजमिस्त्री समभुजा गुडकर ले आई। समभुजा खाने का जो दौर चला तो गोपाल जीभ लपेटकर मुंह बना-बनाकर समभुजा खाने लगा। उधर मंत्रीजी का लाल-पीला चेहरा देखना था। वे केवल सुपरमार्केट-फाड़कर देखने लगें।
इस पर यहां मंत्री जी की जग हंसाई खूब होने लगी तो उधर हलवाइन की बड़ी के पुल बांधे जाने लगे। महाराज ने उन्हें राज-रसोई में मुख्य रसोई की नौकरी दे दी, साथ ही दंड भी वापस ले लिया।
महाराज कोई छह महीने तक इस समभुजा का आनंद लेते रहे। इन दिनों शाम होते ही महाराज के साहस पर लाजवाब खेल का आनंद लिया जाता था। दरबार में शांति विराजने लगी। जनता ने चैन की सांस ली।
यह बात लगभग सौ साल पुरानी है। इन दिनों कलिंग प्रदेश, वर्तमान उड़ीसा राज्य में गिरिधारी बेहरा नामक एक हलवाई अपनी धर्म-पत्नी धरित्री देवी के साथ बंगाल के कृष्णानगर राज्य के राज दरबार में आये थे। उन्हें महाराज ने राज-हलवाई के रूप में अपनी सेवा में रख लिया था।
गोपाल ने भी धारीत्री देवी का लोहा मान लिया। उन्होंने धृति देवी के सम्मान में बड़ाई के पुल बांध का भी उल्लेख किया है।
हलवाईन का सम-भुजा ही बाद में रूम समोसा या सिंघाड़ा नाम से प्रसिद्ध हुआ। लेकिन दुख की बात यह है कि धार्मिक देवी का नाम काल के गाल में समा गया जब हमारे गांव में अगर सिंघाड़ा या समोसा हो तो क्या देखना!
अब आपसे यह पूछा जाएगा कि समोसे की मां या आविष्कारक कौन है तो आपका उत्तर क्या होगा?
(गोपाल भांड बंगाल के कृष्णनगर राज्य के राजा कृष्णचंद्र राय के दरबारी विदूषक थे। विदूषक को भांड भी कहते हैं, इसलिए वे गोपाल भांड के नाम से प्रसिद्ध हुए। भा गोपाल बहुत ही चतुर और कुशल वाक्पटु थे। बंगाल के गोपाल भांड के किस्से-कहानियाँ आज भी बड़ी चाव से कही जाती हैं।)
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पहले प्रकाशित : 28 नवंबर, 2023, 14:19 IST
