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बलिया का दादरी मेला: परंपरा और संस्कृति की चाशनी में डूबी ‘जिलेबी’ के साथ मेल-मुलाकात, बतकही का महीना भर का अड्डा


बलिया दादरी मेला: दादरी मेला बलिया जिले की पहचान है। इस लाजवाब और अनू थे मेले की शुरुआत कार्तिक पूर्णिमा से होती है। ये दिन हिंदू शिष्यों के बहुत खास होते हैं। गंगा में स्नान, दान और पूजन के साथ बलिया के आस-पास के लोग महर्षि भृगु के मंदिर में जा कर उन्हें जल चढ़ाते हैं। ये भी रिवायत है कि पूर्णिमा के दिन इन कार्यक्रमों के बाद लोग स्विटर गुड़ की जिलेबी या रुचि से दूसरी मिठाई अपनी हिस्सेदारी रखते हैं। बहुत से लोगों के लिए ‘जिलेबी’ खाने का ये प्रोग्राम दादरी मेले में होता है। इस इलाक़े में प्रचलित भोजपुरी में इसे जिलेबी ही कहते हैं। भृगु ही वे ऋषि हैं विष्णु की छाती पर टकसाल मारी थी। इससे जुड़ी कई सी कथाएं लोक में प्रचलित हैं, लेकिन एक बात जो समझ में आती है वो ये है कि धार्मिक सिद्धांतों के अनुसार जगत्पालक विष्णु व्यवस्था के प्रतीक और उन पर चरण प्रभाव का ऋषि का निर्णय विद्रोह का है। ऐसा लगता है कि इसी तरह के मिथ्या विद्रोह ने बलिया के पानी को बागवत की धार दे दी। यही वजह है कि बलिया वालों को बागी बलिया कहना अच्छा लगता है।

महर्षि भृग और कष्टर मुनि की कहानी
ऐसा भी माना जाता है कि इन्हीं भृगु के शिष्य कष्टर मुनि ने दादरी झील की शुरुआत की थी। इस नदी में यह भी कहा गया है कि उन्होंने ही अयोध्या से सरयू को यहां स्थापित किया था, जहां उनका संगम गंगा से था। जानवरों पर परंपरागत रूप से इस मेले की शुरुआत होती है। हाल के कुछ वर्षों में कोरोना और लैंफ़ी रोग के कारण समुद्र का प्रकोप बढ़ गया और इस वर्ष भी इसका पता नहीं चला। ये पशु मेला किसानों के लिए बहुत ही शानदार था। उन्होंने इसमें अपने स्वामित्व वाली फर्म की खरीद फरोख्त की थी। जिस समय बैलों से खेती होती थी, उस समय लोग से अपने लिए बैल मसाले – स्टॉक थे। यहां लंबे समय से खेती में बैलों का इस्तेमाल किया गया खंड जाने के बाद से यहां ज्यादातर भास और गाय जैसे दुधारु सागर या अधिगृहीत में काम आने वाले खरचों-गढ़ों की खरीद फरोख्त होती रही। कुछेक चूहों का भी व्यापार हुआ था. लेकिन उनकी संख्या बहुत ज्यादा नहीं थी.

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कपास, जन सामान्य के लिए दादरी के मेले का आकर्षण यहां आने वाला सर्कस, जादू के खेल, नौटंकी और मीना बाजार को लेकर होता है। साथ ही अलग-अलग इलाकों में बनाए जाने वाले कपड़े की दुकान में भी बड़ी संख्या में यहां मौजूद हैं। वैसे तो किसी भी मॉल की तरह ही यहां भी हर छोटी बड़ी चीज की जरूरत होती है लोगों को एक जगह साधारण एलपीजी बांध पर मिल मिलती है। कभी-कभी बिहार के आरा, पिपरा, बस्तर से लेकर गाज़ीपुर, आज़मगढ़, बनारस जैसी जगहों से भी लोग दादरी मेले में आ कर खरीददारी और मेले का ठेका उठाते रहते हैं।

पारंपरिक मिठाइयों का जलवा घटक
अब तो दूसरी जगह के मेलों की ही तरह दादरी में भी तरह-तरह के फूड स्टॉल लगे हुए हैं। लेकिन यहां पारंपरिक रूप से गुड़ से बनी ‘जिलेबी’ का ही राज चल रहा है। जिन लोगों ने अपने छतेपन में इसे रसीला जायका चखा है, उनके लिए मॉल का जायका जिलेबी ही है। इसके अलावा बलिया में खासतौर से बनने वाली चीनी की माचिस में पगी, मैदे और खोए से गोल गोल टिकरी का स्वाद भी लोगों को पसंद आता है. आकार में ये मिठाई न तो बहुत बड़ी होती है और छोटी भी नहीं। किसी को भी ये चपटाखे गुलाब जामिन की तरह लग सकते हैं. बड़ी ही आसानी से इसके रसिया दो से तीन टिकरी खा कर ही कम या ज्यादा मिठाई के बारे में बता रहे हैं।

मीना बाज़ार
महिलाओं के आकर्षण के लिए मॉल का मीना बाजार होता है। नाम के अनुसार ही इसमें उनकी दुकान का सब कुछ बताया गया है। चुड़िया, बिंदी, तेल, कोलोन और सावंरे का सारा सामान इसमें है। तेरहवें सीज़न की शुरुआत के ठीक पहले लंबाई वाले इस मेले में बहुत से लोग पहले अपने बेटे-बेटी की शादी के लिए भी सामान खरीद कर रख चुके थे।

मेले का एक बड़ा हिस्सा मनोरंजन का होता है। इसमें मनोरंजन की पारंपरिक विधाएं पूरे दमखम के साथ दिखती हैं। आम तौर पर सरकस यहां ही आता है। इसके अलावा नौटंकी, जादू का खेल और मौत का कुआँ उपकरण बहुत शानदार ढंग से दिखाया गया है। गंगा की गोदी में चलने वाले इस मंदिर में अब भी अदब और अदीबों की परंपरा है। यहां कवि सम्मेलन और मुशायरे में देश के दिग्गज कवि और शायर शामिल होते हैं। ध्यान रखने वाली बात यह है कि भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिंदी में ऐतिहासिक उपदेश दिया था जिसे आज भी सिखाया जाता है। आज भी सांस्कृतिक कार्यक्रम भारतेंदु मंच के अंतर्गत शामिल किये गये हैं।

टैग: बलिया खबर, भारतेंदु हरिश्चंद्र



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