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साँवला का रंग साँवला था, लेकिन छंदों की तरह उनका चमकीला चमकीला था


(अनुराधा ओस/अनुराधा ओस)

आस्था का संबंध बिहार के आरा जिले के धूसपुर गांव से था। उनका जन्म 30 अगस्त 1921 को रावलपिंडी में हुआ, जो अब पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में है। शैले का असली नाम शंकरदास केसरीलाल था। उनके पिता केसरीलाल ब्रिटिश बिजनेस हॉस्पिटल में क्लिनिक थे। अपने गांव में ज्यादातर समय तक नहीं रहे। पढ़ाई के गणित में मथुरा चले आये। आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण पढ़ाई पूरी होने के बाद फ्लैट ने मुंबई का रुख किया और रेलवे में अपरेंटिस के तौर पर काम करने लगे।

मुंबई में एयरलाइन को जब भी समय मिला तो वे प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यालय में अपना समय बिताते रहे। उनका परिचय राजकपूर से प्रदर्शित हुआ था। राजकपूर ने उन्हें अपनी फिल्मों में प्रस्ताव का प्रस्ताव दिया। पहले तो शैले ने मन कर दिया, लेकिन आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने की वजह से वे फिल्मों में काम करने लगे।

उर्दू के शायर अल्लामा रज़ियल्लाहु अन्हु की पंक्तियाँ हैं ‘दिल से जो बात बेकार, असर करती है।’ इंजीनियर और कवि शैले पर ये पंक्तियां एकदम फ्लैट बैठती हैं। जब उन्होंने लिखा- ‘दिल का हाल सुने दिलवाला’ (जिसके पास दिल है वहीं दूसरे के दिल का हाल समझ में आ सकता है) धार्मिक जीवन में व्यक्ति कई भावनाओं के बीच उभरा रहता है, या एक साथ जीवन में कई दुखों का सामना करना पड़ता है।

हॉकी के दौरान किसी ने वैलनेस जाति सुचक टिप्पणी कर दी थी, जिससे नाराज खिलाड़ियों ने हॉकी स्टिक तोड़ दी। और हाँ कभी न चुनौती की कहानी। अपने दर्द को भूलने के लिए सोलो कविता की शरण में जाते हैं। स्वर हैं- ‘तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत पर यकीन रख, अगर कहीं स्वर्ग है तो बाहर ला जमीन पर।’ बेल्डिंग मशीन के कर्कश ध्वनि में भी उनका कवि मन जीवन की जीत पर खरा है।

उस समय देश में नई कीमतें स्थापित हो रही थीं. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सांस्कृतिक शाखा-प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन और इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन में शामिल होने के बाद उन्होंने खुद को सही जगह पर पाया। अध्यात्म की असाधारण खोज के बजाय वो मानव में ईश्वरीय लोकतंत्र का विकास चाहते थे। साहिल की कविताएँ और गीत इस बात की तस्दीक करते हैं।

यहां एक गीत का उल्लेख जरूरी है, फिल्म गाइड का एक गीत है- ‘आज फिर जीने की मुस्कान है, आज फिर छुट्टी का इरादा है’ यह एक ऐसी महिला के मन का चित्रण है जो अपनी शादी से नाखुश है। जीवन से निराश है. यह गीत उसकी भावनाओं को अभिव्यक्त करता है, जो सामाजिक रीति-रिवाज को चुनौती देता है।

एक बातचीत में कमलेश पैजेंड ने कहा था कि इस गीत को भारतीय महिलाओं को अपना राष्ट्रीय एंथम बनाना चाहिए।

हिन्दी, भोजपुरी, उर्दू बोलियों के क्षेत्र से जुड़ी थीं उनकी ये तस्वीरें भी हैं प्रचलित-
पैन कैसे बनाये हमारे!
चलत मुसाफिर मोह लिया रे वाली जायरीन मुनिया!
सजनवा बैरी हो गए हमार!
अब के बड़े भैया को भेजो!

ये गीत भोजपुरी के प्रमुख हमारे मन में सॉसेज देते हैं।

साइंटिस्ट को अपने आस्था से वैश्विव वैश्वीकरण भी मिलता है। उनका गीत सोवियत संघ और यूरोप में काफी लोकप्रिय रहा। ‘आवारा हूं’ फिल्म का गाना “आवारा हूं” आज के समय का भी बहुत लोकप्रिय गाना है।

नोबेल पुरस्कार विजेता और रूसी लेखक अलेक्जेंडर सोल्जेनित्सिन की पुस्तक ‘द कैंसर वार्ड’ में इस गीत का उल्लेख है। पुस्तक में एक अस्पताल के कैंसर वार्ड का दृश्य है। इसमें एक नर्स कैंसर मरीज के दर्द को कम करने के लिए ‘आवार हूं’ गाना गाती है।

राजकपूर की हिट फिल्म ‘श्री 420’ का गाना ‘मेरा जूता है जापानी’ ने मिसिसिपी मसाला (मिसिसिपी मसाला) में अपनी जगह बनाई। यह गीत नए स्वतंत्र भारत का प्रतिनिधित्व करता है, जो कई देशों की संस्कृति को जरूर अपनाता है, लेकिन दिल फिर भी हिंदुस्तानी है।

अंतिम संस्कार को प्रेरित करते रहे हैं। गुलज़ार ने हिंदी शास्त्रज्ञ पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय’ के जून, 2011 के अंक में छपे इस लेख में लिखा है
उन्होंने कहा, ”उनका रंग सांवला था और उनके चांद की तरह उनका मुस्कान भी चमकीला था।”

शैलेन्द्र के साथ अपने पोर्टफोलियो पर गुलज़ार कहते हैं- “शैलेंद्र ने फिल्म ‘बंदिनी’ में अपने साथ ‘मेरा गोरा रंग लेइले’ गाने की जगह दी थी।
उन्होंने मुझे वापस आकर बैठने तक बने रहने को कहा। वे वापस तो आये फिर चले गये। मैं कहाँ खड़ा रहा. हिल की सीट खाली थी. किसी की सीट पर बैठने की बात किसी में नहीं थी।”

साहिल की मृत्यु 43 वर्ष पूर्व में हो गई थी। एक निर्माता के रूप में शैलेश की मृत्यु उनकी पहली फिल्म ‘तीसरी कालम’ के रिलीज के समय हुई थी। उस समय यह फिल्म फ्लॉप प्रोविजन हुई थी। लेकिन मौत के लगभग 20 साल बाद यही फिल्म कल्ट क्लासिक बनी।

शैले ने हिंदी फिल्मों को एक से लेकर एक शानदार गीत तक प्रस्तुत किया। इनमें सुहाना सफर और ये मौसम (मधुमती), चलत मुसाफिर मोह लिया रे (तीसरी रात), ये मेरा दीवानापन है (यहूदी), दिल का हाल सुने दिलवाला (श्री 420), तू प्यार का सागर है (चोरी चोरी), ये रात भीगी-भीगी (सीमा), पान के साथ संया हमार (तीसरी कविता), आ जा ऐ बहार (हुंराजकुमार), चढ़ गया पापी बिछुआ (मधुमती), मावेरी (आवारा), मेरा जूता है जापानी (श्री 420), आज फिर जीना की दोस्त है (गाइड), पिया तोसे नैना लागे (गाइड), दिल की नजर से (अनाड़ी), खोया खोया चांद (काला बाजारी), प्यार हुआ इकरार हुआ (श्री 420), अजीब दास्तां है ये (दिल अपना प्रीत पराई) आदि सदाबहार लोकप्रिय और हिट गीत शामिल हैं।

एक समारोह में उनकी बेटी अमला मजूमदार ने कहा कि ”तीसरी संस्था के आर्थिक निवेश ने बाबा की जान नहीं ली बल्कि उनके दोस्तों, परिचितों के निवेश ने उनकी हत्या कर दी।”

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