लंबे समय के इंतजार के बाद आई एपिक साइंस फिक्शन क्लासिक ‘अवतार 2’ यानी ‘अवतार: द वे ऑफ वॉटर’ ने भारत में 15 दिन में कुल जमा 300 करोड़ के एल्बम की शुरुआत की। उन्होंने कहा कि यह प्रतियोगी प्रतिभागियों के कहे अनुसार या यूं कहें कि प्रतिभागियों से भी जल्दी जल्दी कर लिया गया। 18वें डेनिज़ की भारत में कुल क्लेम्ब्रेशन 342 करोड़ रुपये थी और दूसरे वर्ज़न की डिज़ाइन लगभग 12000 करोड़ रुपये थी। लेकिन हम ऐसी बात नहीं करने वाले कि ज़ीरल ने कितने कमाए या कितने रिकार्ड तोड़े; हम तो यहां टेक्नोलॉजी पर बात करने वाले हैं.
कौन है ऑबियसली जेम एलेक्जेंड कैमरून का यह वास्तविक हीरो। हो भी ट्रैक्ट्यो न, वो इस ट्रोइकल के निर्देशित हैं और फ़्रांसीसी फ़िल्मों के बारे में कहा जाता है कि यह निर्देशित मीडिया है। ऊपर से वो इस फोटोग्राफर के सह-निर्माता हैं, मूर्ति मोरी, डॉयरक्रिन प्लेले में सह लेखक हैं। फ़्रांसीसी के कैरेबियन साओलायर्स साचेल रचे हैं। कुल मिलाकर यह जेम जंक्शन का क्रिएशन है। लेकिन, लेकिन फिर भी अगर हम कहें कि असली का असली हीरो कोई और है तो क्या आप सहजता से सोचते हैं?
फ़्रांसीसी के असली हीरो हैं वीएफए रिपॉजिटरी, सीजीआई और एसएफए रिपॉजिटरी टेक्निक। इसमें कोई शक नहीं है कि ये सिर्फ टूल्स हैं जो बहुत ही खूबसूरती से जेम्स ने लगाए हैं। न सिर्फ प्रयोग किया है बल्कि इस के लिए तकनीक के आने का इंतजार भी किया, लंबा इंतजार – ‘जो एकमात्र इंतजार में है वो वसले यार में’ वाला इंतजार। फ्रेंचाइज़ की पहली फिल्म ‘अवतार’ 18 दिसंबर 2009 को रिलीज हुई थी, जबकि दूसरी फिल्म थ्रो ब्रॉल के बाद 16 दिसंबर 2022 को स्केल परदे की शॉल देख पाई। पहली फिल्म भी आसानी से आकार नहीं ले पाई थी। 1994 से इस पर शुरूआती काम शुरू हुआ जो 2009 में डायमंड का आकार ले पाया। कुछ लोग कहते हैं ‘सपने कभी अपने नहीं होते’, गलत कहते हैं ‘अवतार’ सीरीज के प्रॉडक्शन में एक सपना सच हो रहा है।
हुआ यूँ कि जेम बंधन की माँ ने एक सपने में एक विचित्र तरह की महिला को एक सपने में देखा। जेम ने अपने सपने के बारे में बताया और जेम ने अपनी मां के सपने को अपने पुराने दिमाग में बिठा लिया और इसी तरह के एक काल्पनिक लोके के रूप में ‘अवतार’ अवतार सामने आई। इसकी पहली कैमरून 1997 में लीजेंड मूवी ‘टाइटेनिक’ बनाई गई थी, जिसमें बे स्टार्स रेज़िएन्ट्स, बे स्टार्स डायर रिलेटेड सहित चार ऑस्कर भी मिले थे। इसके अलावा ‘द टर्मिनेटर’ सीरीज का निर्माण-निर्देशन भी कैमरून के लिए है।
‘अवतार’ पर, थोड़ी प्रैक्टिकल बातें करते हैं। थान अलग बात लेता है उसका परिणाम तक अलग बात पहुंचाता है। ठीक है, इसके लिए जो ज़ुनून को कैमरून के पास वो जेम इंस्टॉलेशन करना चाहिए था। इसी तरह जेम लीक ने 1994 में ही 80 पन्नों का पहला ड्राफ्ट तैयार किया था। लेकिन सिर्फ जुनून से जुड़ा होता है, जेम हिलाड ने जब अपने सपने को सेल्युलाईड के परदे पर फैसला सुनाया तो ग्राउंड सचाई ने अपने सपने को औंधे मुंह पटक दिया। लेकिन फेलो शौक़ीन की नमाज़ से ही सब कुछ होता है। जब कैमरून को पता चला कि सपने को साकार करने के लिए आवश्यक तकनीक अभी भी मौजूद नहीं है, तो सुझाव देने का निर्णय लिया गया। इस मुलाज़ के साथ लिया गया कि उसके लिए यूज़फुल जरूरी तकनीक आना तय है, आई भी। यानि सब्र का फल मीठा एक बार फिर साबित हुआ है। वो तकनीक थी वीएफए निजीकरण, सीजीआई और वीएफए निजीकरण।
वीएफएक्स और सीजीआई क्या बला है?
जानिए ये किन बलाओं के नाम. इन बलाओं के सामानयोग्यता के रूप में हम रोज दो चार होते हैं। हम टीवी न्यून्यूज रोज देखते हैं। देख रहे हैं कि एंकर सीजन का हॉल टेल चल रहा है और पीछे डॉक्युमेंट्रीन पर रेन स्टॉर्म तूफ़ान के ड्रशमनी चल रहे हैं, देखने में ऐसा लग रहा है कि एंकर खुद इवेंट इवेंट पर मौजूद हैं हमारे लिए वहां के हॉल टेल चल रहे हैं। इसे ही मोटा मोटा वीएफए सप्लायर या सीजीआई तकनीक कहा जा सकता है। वीएफए एसोसिएट्स विजुअल इफ क्लिप्स और सीजिए आइडियाज कम्मेन्ट स्टूडियो जनर एडेड इमेजिनरी।
थोड़ी सी डीप में जा रहे हैं. एक छोटा-मोटा सुपरमार्केट डाक्यूमेन्ट्री बन रही है। यह पोस्ट डॉक्यूमेंट्री शहीद के एक स्मारक पर बनाई गई है। अवकाशमारक हजार किलोमीटर दूरी पर स्थित है। डाक क्यूमेंट्री के लिए मेमोरियल मार्क शूट करना जरूरी है और वहां लेबेल एंकर का नेशन भी शूट करना है। बजट इतना नहीं है कि एंकर और पूरी क्रूज़ को मेमोरियल तक ले जाया जा सके। लेकिन एंकर को घूमने के लिए अपने आस-पास के लोगों पर टिप्पणी करना भी बहुत जरूरी है। एंटी में पैसे नहीं हैं. क्या होगा? कैसे करें? एक पद्धति है सिद्धांतमारक की हुबहु प्रतिकृति बिल्डिंग उसकी स्थापना की जाए और एंकर से न स्टेशनरी बिल्डिंग जाए। लेकिन यहां भी एक उदाहरण है कि प्रतिकृति बनाना खर्चीला है, होबहू बनाना तो बहुत प्रिय है। उसके बाद भी जरूरी नहीं कि रियल लुक आ ही जाए।
ऐसे में वीएफए एप्रोडक्टर्स और सीजीआई रॉबिन हूड सामने आते हैं। बिना एंकर और उनकी टीम को ले जाए ही ऐसा दृशयोग्य चाच देते हैं मनो एंकर एंकर और उनकी टीम को ले जाए ही देते हैं मनो एंकर डॉ. मार्क के सामने उनकी जानकारी दे रही हैं। जबकि केवल इतना ही कहा गया है कि कैमरा अलोनमेन को अलग-अलग मेट्रिक्स मार्क के स्कोर के लिए सेट किया गया है और शेष बजट कम होने पर पहले से उपल प्रतिभागियों के लिए स्कोर तैयार किया जा सकता है। इधर, डेमोस्टूडियो में ग्रीन परेड के सामने ही स्मारक के बारे में बताया गया है। बाद में पो कार्टून प्रोडक्शंस में एडिटिंग सॉफ्टवेयर की मदद से ग्रीन परेड को हटा दिया गया और वहां स्मारक मार्क के एडिटिंग दिए गए। बाद में इसकी मिक्सिंग को फाइनल रूप दिया गया। अंतिम रूप से देखने वाले दर्शकों को ऐसा महसूस हुआ कि मैनो सीन डिकलेमार्क पर बायलर को गोली मार दी गई है। ये कमाल करते हैं विज़ुल इफ़ अनाउंसमेंट और कमैंट्स न्यूटर जनर रेटेड इमेजिनरी।
‘अवतार’ और इस तरह की सारी हॉलीवुड फिल्में इसी तकनीक का प्रयोग करती हैं। वनस्पति साधन निश्चित रूप से ऐसा ही है लेकिन तकनीक में भारी अंतर है। हर विज़ुअल एक से नहीं होता, न उनके परिणाम एक जैसे। मामला कुछ यूँ है कि आकार-प्रकार के उत्पाद ही मीठे होंगे।
नई तकनीक, पैसे की बचत और बेहतरीन काम
वीएफए चिप्स, सीजीआई और एसएफए प्रोफेसर टेक्निक के बारे में मोटा-मोटा अन्वेषण की कोशिशें की जाती हैं। इसे टेक्निकल गहराई में खरीदें और समझें इस लेख का उद्देशनीयता इसलिए मोटी-मोटी जानकारी नहीं है। इस तकनीक के प्रयोग से समय और पैसे की बचत तो होती ही है। खतरनाक और अदृश्य दृश्य देखने वाले को भी आसानी से क्रिएट किया जा सकता है। जंग फ़्रेंच एलियन्स में बुरुशों ने पहले खातियां कीं। कल नियतनातीत और उड़ने वाली ऐसी ही धरोहरें देखकर उंगली बरबस ही दांतों की स्थापना पहुंच जाए। ‘टाइटैनिक’ के स्नान के रोमांचक दृश्य या फिर ‘एवेंजर’ और ‘अवतार’ तथा ‘अवतार’ 2 के दृश्य। ये सब विज़ुअल इफ़ चप्पल्स और उनके संगी साथी सीजी और एसएफए के सहयोगी हैं।
बबीली, रोबोट में भी हुई यही तकनीक का इस्तेमाल
बेहद ओर मन को मोह लेने वाली सीनरी खूबसूरत हो या एक शन के खतरनाक सीन। या फिर कल नामकरण से उपजी जीव जंतु ये सब इन्हीं में से किसी एक या दो तकनीक को मिला कर रचे जाते हैं। आपको ‘मोगली’ की याद आ गई है ये कम शेयर वाला कंप्यूटर ग्राफिक का कमाल है। ‘लाइफ ऑफ पाई’ का लड़का और शेर याद है, जो समंदर में एक ही नाव पर सफर कर रहे हैं। इसमें एक छोटा सा टेडी बियर था जिसे हमने शेर के रूप में देखा था।
इन टेक्निकल पर आधारित भारतीय दिग्गजों की बात करें तो ‘बाहुबली’ का नाम सबसे पहले याद आता है, ये टेक्निकल इन हीन टेक्नॉलजी की नापसंदगी इतनी ही दूर तक जाती है और लार्जर डेन लाई इमेज वाली बन पाई थी। लेकिन ये पहली बार नहीं था ‘कृष’ हो ‘रा वन’ या फिर ‘रोबोट’ ये भारत में ही बनी थी। ‘मक्खी’ भी याद आती है. साउथ के कई वेश-भूषा में इस तकनीक का विक्रय व्यवसाय हुआ है। एक डेंटिस्ट का सीन हो, या बम स्टाम्पलॉ स्मार्तो, या फिर सुनामी, बाढ़, तूफ़ान तूफ़ान, छत से जंपना, फ़्लोडाना, कार डेंटिस्ट का सितारा आदि ऐसे सीन हैं जो रियल में नहीं जा सकते या बहुत मंहगे भव्य हैं। इन्ही की मदद से दिखाया गया है .
वीएफए प्रॉप्राइजेज और एसएफए प्रॉस्पेक्टर्स के कई लोग समान हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। वीडियो प्रोजेक्ट यानी विजुअल इफ क्लिप्स (कम हैशटैग न्यूटर जनिट ड्रशमोय इम्पैक्ट) वास्तव में शूट के बाद एडिटिंग में जोड़े गए हैं। जबकि एसएफए प्रॉस्पेक्टिक के इम्पैक्ट शूट से पहले जा चुके हैं, इसमें प्रोस्टेटिक मेकअप का बहुत बड़ा रोल होता है। वैशाली वीएफए प्रॉयोजिएट्स का उदाहरण है ‘पा’ में अमिताभ का लुक एसएफए प्रॉस्पेक्टस से बनाया गया था। इसी तरह जीरो में शाहरुख खान का बौना रूप। बता दें हरे (कभी-कभी ब्लू परदे) का बैक ग्राउंड में उपयोग होने वाली टेक्निक को क्रोमा कहा जाता है।
चलते-चलते अवतार 2 पर बॉलीवुड का रिश्ता जान लेते हैं। राम गोपाल वर्मा पॉज़िटिका सेंस में कहते हैं ‘इसे एक जनवरी कहा जाएगा, यह अनुभव की तरह है। ‘ब्रेन कुजने वाला एक्शन और बी एसेट विज़ुअल मूवमेंट।’ ‘आइसकैम 1992’ के डोर रिलेवर जय मेहता बने हुए हैं, ‘इससे पहले परदे पर मैंने कभी ऐसा विज़ुअल क्रिएचर क्लैक नहीं देखा था। ‘अवतार’ ने मेरे साथ आज वही किया जो बचपन में ‘जुरासिक पार्क’ ने किया था।’ अक्षय कुमार ने कहा, ‘अवतार-द वे ऑफ वॉटर’ इस अनमोल के लिए ‘शानदार’ से नीचे कोई भी शॅल-द वे ऑफ वॉटर’ नहीं जा सकता। जेम कंस्ट्रक्शन कैमरून, आपका जीनियस प्लांट सलामत।’
