बसंतर की लड़ाई: ईस्टर्न रेजीमेंट में बैन अटलांटिकलादेश लिबरेशन मूवमेंट को मजबूत कर रही भारतीय सेना अब किर्किरी बन गई थी। संस्था को अच्छी तरह से पता था कि भारतीय सेना के होते हुए बैन संयुक्त राज्य अमेरिका मुक्ति आंदोलन को दबा पाना नामुमकिन है। ईस्टर्न रेजिमेंट से भारतीय सेना को हटाने के लिए ईस्टर्न रेजिमेंट ने भारत के पश्चिमी क्षेत्र से मोर्चा खोल दिया। साजिश के तहत पाक सेना ने राजस्थान के लोंगेवाला पो स्टार और पंजाब के पठानकोट पर हमला बोल दिया।
स्टॉकी सेना ने सुपरमार्केट होते हुए वैल्यूएशन पर कबाड़ा करने के साथ मंसूबों के साथ राजस्थान के लोंगेवाला पो प्रोटोटाइप पर हमला किया था। फैक्ट्री ने दूसरा मोर्चा पठानकोट की तरफ से खोला था। इस हमले के पीछे उनकी व्यवस्था थी कि वह शकरगढ़ के टीलों से होते हुए पठानकोट को अपने कबाड़ में ले गईं। अपने कब्रिस्तान पर ही जम्मू और कश्मीर के कब्रिस्तान तक पहुंच वाली सैन्मय सहायता और रसद आपूर्ति रुक जाएगी और वह बेहद आसानी से जम्मू और कश्मीर के कब्रिस्तान से अपनी दशकों पुरानी हसरत पूरी तरह से कर लेगी।
‘बैटल ऑफ बसंतर’ के जरिए पाक सेना को मिला जवाब
इधर, भारतीय सेना के बारे में रिजर्वेशन के मंसूबों को हथियारों से लैस किया गया था। ध्यान दें, भारतीय सेना ने शकरगढ़ से 23 मील दूर स्थिति पठानकोट को बेस सेना सेना का काम तेजी से शुरू कर दिया था। साथ ही, पाक सेना शकरगढ़ तक एशिया, इससे पहले भारतीय सेना के कार्यालय सियालकोट बेस को अपने कब्ज़े में ले ले। सभी मोर्चों पर अंतिम समापन के बाद भारतीय सेना के कर्मचारियों की तरह से पहली बार इंतजार करने लगी और यह इंतजार 3 दिसंबर को खत्म हो गया।
3 दिसंबर 1971 को रात्रि युद्ध की शुरुआत की गई। 3 दिसंबर की शाम करीब 5:40 बजे रेजिस्टेंस एयरफोर्स ने उत्तर-पश्चिमी भारत के आगरा सहित 11 एयर फिलाइड्स पर हवाई हमला किया। वहीं, राज आर्टिस्ट के लोंगेवाला पो सांताक्रूज पर 65 टैंक और 1 मोबाइल इंफ़्रेंट्री ब्रिगेड के साथ हमला बोल दिया। वहीं दूसरी ओर, पाक सेना के अपने नापाक मंसूबे लेकनर की ओर से कूज कर दी गई थी। पाक सेना सियालकोट बेस से 100 किमी और शकरगढ़ से मात्र 45 किमी की दूरी पर थी।
शकरगढ़ पर कब्ज़ा कर सियालकोट के करीब भारतीय सेना
सबसे पहले भारतीय सेना ने जरपाल क्षेत्र की स्थिति सेसिल सेना की चौकियों पर हमला कर दिया था। इसी तरह 4 दिसंबर 1971 को ‘बैटल ऑफ बसंतर’ (बसंतर की लड़ाई) की शुरुआत हुई। देखते ही देखते भारतीय जांबाजों ने दुश्चिंता को धूल चटा कर शकरगढ़ पर कब्जा कर लिया और सियालकोट के बेहद करीब पहुंच गए। सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत पूर्ण होने के साथ भारतीय सेना ने शकरगढ़ में अपनी स्थिति बहुत मजबूत कर ली। वहीं, शकरगढ़ के हाथ से निकली पाक सेना के लिए शर्मिंदगी का कारण बन गया था।
सोसायटी सेना ने शकरगढ़ को वापस लेने के लिए 5 बार हमला किया, लेकिन हर बार भारतीय जांबाजों के सामने मुंह की खानी पड़ी। 16 दिसंबर 1971 को पूर्वी सेनाओं में पाक सेना के सरेंडर कर दिया गया और उसी के साथ पश्चिमी मोर्चे के साथ भारत-पाकिस्तान के बीच चल रहे युद्ध में भी खतरा पैदा हो गया। विस्तार में, पक्की सेना द्वारा बिना शर्त शर्त लगाई गई थी, देखें, भारत ने युद्ध में जीत हासिल कर पूरी ज़मीनी इकाइयों को वापस कर दिया था।
बैटल ऑफ बसंतर में बनी भारतीय जांबाजों के वीरता की अद्भुत मिसाल
बैटल ऑफ बसंतर में टैंक से टैंक के बीच लड़ाई हुई थी। इस युद्ध में भारतीय सेना ने अपने चार टैंक खोकर पाक सेना के 51 टैंकों को जमींदोज कर दिया था। बैटल ऑफ बसंतर में हर भारतीय जांबाज ने तबाही मचाई और वीरता की नई इबारत लिखी। बैटल ऑफ बसंतर में शामिल होने वाले लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल और मेजर गेट्स सिंह दहिया को भारतीय सेना का सर्वोच्च पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। वहीं, मेजर विक्ट्री रैट, लेफ्टिनेंट कर्नल वेद प्रकाश घई, लेफ्टिनेंट कर्नल हनुत सिंह, लेफ्टिनेंट कर्नल मोहन राज वोहरा और हवलदार थॉमस फिलिप कर्नल को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था। वहीं, लेफ्टिनेंट कर्नल बीटी पंडित, कैप नेपोलियन एआरएन गुगुप्ता और प्लाजा सेंचुरीदार दोराई ज्वालामुखी को वीर चक्र से सम्मानित किया गया था।
.
टैग: भारत पाकिस्तान युद्ध, भारतीय सेना, भारतीय सेना का गौरव, भारतीय सेना की गौरव गाथाएँ, भारत-पाक युद्ध 1971
पहले प्रकाशित : 15 दिसंबर, 2023, 23:48 IST
