पाकिस्तानी सैनिकों ने किया आत्मसमर्पण. गरीबी के बाद 1947 में भले ही संस्थाओं के नाम से अलग देश बनाया गया, लेकिन सही मायनों में भारत के तीन टुकड़े हो गए। पहली- भारत, दूसरी- पश्चिमी दुकानें और तीसरी- पूर्वी दुकानें। सामाजिक, सांस्कृतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बिल्कुल की अलग पहचान बनी हुई है, पूर्वी और पश्चिमी वेश्यालयों के बीच कोई मेल नहीं था। सिर्फ बैन साइंटलाबाशी की वजह से पूर्वी गुलामों के वाशिंदों के साथ न केवल सौतेला असावहार हुआ, बल्कि उनके साथ गुलामों की तरह की पहचान की गई।
बेबस ईस्टर्न रेजिडेंस के वंशियों के दिल में पठ रही टीस, धीरे-धीरे-धीरज आग उगलती उनके दिल में धधकने लगी। देखते ही देखते पूर्वी संस्था के वंशियों का सब्र जवाब दे और उनके दिल में पल रही टीस मुक्ति दल के रूप में आग उगलते हुए बाहर आ गया। कुछ ही समय में लिबरेटरी दल एक आंदोलन बन गया और पूरे पूर्वी प्रतिष्ठान में इस आंदोलन की आग धधकने लगी। यूनाइटेड किंगडम के नाम से अलग देश की मांग करने वाली लिबरेटरी टुकड़ियों के आंदोलन को उस समय राहत मिली, जब भारतीय सेना ने अपना हाथ थामकर उनकी पीड़ा को शांत करने के लिए मरहम लगाने की शुरुआत की।
अपनी पुरानी ख्वाहिश पूरी करने की ताक में थी दुकान
भारतीय सेना की ओर से अपनी पूर्वी सेना की ओर से पश्चिमी सेनाओं के सैन्य शासकों को ऐसा महसूस हुआ कि भारत ने पूरी सैन्य सेना लिबरेटरी टुकड़ियों की मदद में मदद दी है। बस इसी सिद्धांत के साथ सिद्धांत ने अपनी पुरानी ख्वाहिशों को करने के लिए रचना रखना शुरू कर दिया। इस पुरानी ख्वाहिश का नाम जम्मू और कश्मीर था। संधि के संत शासकों का मानना था कि अगर वह पश्चिमी देशों से युद्ध की शुरुआत कर देते तो भारत की शांति सेना पूरी तरह से अलग हो जाती और वह आसानी से जम्मू और कश्मीर के शासकों पर अपना परचम लहरा देते।
इसी सिद्धांत के साथ एयरफोर्स ने 3 दिसंबर 1971 की रात उत्तर-पश्चिमी भारत की 11 एयर फिलीड्स पर हवाई हमला किया। इसके अलावा, ज़मीन पर स्थिर सेना के 2 हज़ार बंदूकों ने 65 टैंक और 1 मोबाइल इंफ़्रेंट्री ब्रिगेड के साथ पश्चिमी मोर्चे पर राज़स्थान लोंगेवाला पो स्टार्टा पर हमला बोल दिया। इसी के साथ, पठानकोट पर कब्ज़ा करने की कोशिश में आगे बढ़ी रही दुकान सेना के साथ शकरगढ़ में बसंतर की लड़ाई शुरू हो गई। देखते ही देखते पश्चिम से लेकर पूर्व तक भारत और किसानों की सेना के बीच खूनी जंग शुरू हो गई।
यह भी पढ़ें: जम्मू-कश्मीर में जजों की थी चाहत, ‘बैटल ऑफ बसंतर’ से शुरू हुई ‘बैटल ऑफ बसंतर’ की शुरुआत, अब तक हुई नापाक मंसूबे
13 दिन में बातचीत पर ले आया जादूगर का गुरुर
तत्सकाली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और सेना प्रमुख मानेक शॉ ने इस गुस्ताखी का मुंह बंद करके जवाबी कार्रवाई का मन बना लिया था। भारतीय सेना के सामने दुकान को हर स्मारक पर मुंह की खानी पड़ रही थी। 13 दिनों के अंदर भारतीय सेना के जांबाजों ने दुकानें के गुरुर को लामबंद में ला दिया। यहां तक पहुंच गई कि पूर्वी गुलामी में युद्धरत गुलामी सेना के 93 हजार जवानों ने भारतीय सेना के सामने हथियार हथियार एटमसमदर्पण कर दिया। यह एटमसमर्पण ढाका के रमाना रेसकोर्स पर हुआ।
इसी तरह, 16 दिसंबर 1971 को बस्ती सेना के लेफ्टिनेंट जनरल आके नियाजी ने अपनी 93 हजार सेनाओं के साथ भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया, बस्ती का गुरुर पूरी तरह से खाक में मिल गया। लेफ्टिनेंट जनरल आके नियाज़ी ने सेना के जनरल ऑफ़िसर कमांडिंग-इन-चीफ (ईस्टर्न कमांड) के लेफ्टिनेंट-जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने भारतीय एटमसर्पण कर दस बमों पर हस्तरेखाचित्र रखे थे। इसी तरह, 1947 में भारत के खिलाफ़ रची गई साजिश का अंत हुआ और संयुक्त राज्य अमेरिका के नाम से नए देश का उदय हुआ।
यह भी पढ़ें: भारतीय जांबाजों ने ‘बैटल ऑफ बोगरा’ जीता, दुशमन सेना ने फ़ुटा जनता का गुसासा, पाक ब्रिगेडियर को दौड़-दौड़ कर पीटा
दूसरा अनमोल युद्ध के बाद दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु युद्ध
16 दिसंबर 1971 कोका के रमाना रेसकोर्स पर सेकी सेना का द्वितीय युद्ध युद्ध के बाद दुनिया का सबसे बड़ा एटमसमर्पण था। रमा रेसकोर्स पर भारतीय सेना के जनरल कमांडर कमांडिंग-इन-चीफ लेफ्टिनेंट-जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने 93 हजार सैनिकों के साथ मजबूत सेना के पूर्वी कमांड के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल एके नियाजी ने शाम करीब 4 बजे 31 मिनट पर एटमासम ड्राप किया था। अपना हथियार भारतीय सेना के सामने पेश करने के बाद लेफ्टिनेंट जनरल आके नियाजी ने बिना शर्त एटमसड्रोप के दसियों दस्तावेजों पर दस्तखत किए थे।
.
टैग: भारत पाकिस्तान युद्ध, भारतीय सेना, भारतीय सेना का गौरव, भारतीय सेना की गौरव गाथाएँ, भारत-पाक युद्ध 1971
पहले प्रकाशित : 16 दिसंबर, 2023, 01:22 IST
