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बैटल ऑफ ऑर्किड बाबा नानक: धना पाक का ‘अभेद्य’ किला, दुष्यमन के 34 सैनिकों को मिली कब्र, 26 ने टेके अपने दांत


भारत-पाकिस्तान युद्ध 1971: भारत-पाकिस्तान युद्ध 1971 के दौरान बैटल ऑफ ऑफिस बाबा नानक में हुई सबसे कठिन लड़ाइयों में से एक थी। असल, भारत-पाक सीमा पर रावी तट बसा स्थान बाबा नानक शहर की सामरिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण था। बाबा नानक एक ऐसा शहर था, जहां से अमृतसर, बटाला, बिटियास और गुरदासपुर जैसे महान सिद्धांत शहर की दूरी 50 किमी के भीतर थी। इस शहर की महत्ता को स्थापित बस्ती कांस्टेबिल बाबा नानक शहर पर कब्ज़ा करने की कोशिश की गई थी।

यहां आपको बता दें कि भारत-पाकिस्तान के बीच गरीबी से पहले अमृतसर से नारोवाल के बीच एक रेलवे लाइन बिछाई गई थी। यह रेलवे लाइन अमृतसर से जयपुर, उदयपुर, चूरियन, रामदास, बाबा नानक, करतारपुर साहिब (पाकिस्तान) होते हुए नरोवाल शहर तक जाती है। बाबा नानक में रावी नदी को पार करने के लिए एक रेलवे पुल मौजूद था। स्थिर सेना लगातार रावी नदी पर बने रेलवे ब्रिज के रास्ते भारत में ऑटोमोबाइल की कोशिश में लगी थी।

बहाली सेना को यह भी डर था कि भारतीय सेना में भी इसी रास्ते से भर्ती हो सकती है, उसने अपनी तरफ से मौजूदा रेलवे की संरचना को अभेद्य किले में तबदील कर दिया था। स्थिर सेना ने अपने इस अभेद्य किले को अत्याधुनिक मशीनगनों, टैंक रेज़र्वेशन, पिलबो सैनिको से नष्ट कर दिया था। इसके अलावा, बैंकों को जोड़ने वाली सुरंगों के माध्यम से पूरे इलाके में बारूदी सुरंगें बिछाई गईं। वहां मौजूद रेलवे के सिविक चैनल टावरों के अवलोकन टावर और भारतीय सेना पर हमले के लिए रेजिस्टिनी सेना कर रही थी।

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डोगरा रेजिमेंट ने पाक सैनिकों को सिखाया प्रशिक्षण
86 इन्फैंट्री ब्रिगेड को पहले ही बाबा नानक में रखा गया था। हमले की शुरुआत के बाद भारतीय सेना ने अपनी जवाबी कार्रवाई शुरू की। डोगरा रेजीमेंट की 10वीं बटालियन की बटालियन को नरांदाज करते हुए दुशमन के किले की तरफ से बढ़ा दिया गया। 5 दिसंबर 1971 की शाम करीब 5.30 बजे डोगरा रेजिमेंट की 10वीं बटालियन ने दुश्चिंता पर पहला हमला किया।

वहीं, दुशमन की सेनाओं ने 21 टैंकों में सवार 420 सैनिकों को मैदान-ए-जंग से अलग कर दिया। लेकिन, रावी नदी के किनारे की बोमडी जमीन और उल्टी पाड गाडियों ने भारतीय सेना के टैंकों पर रास प्रतिबंध लगा दिया। परिस्थिति विपरीत होने के बावजूद भारतीय जांबाजों का ग्रेड नहीं चाहिए। भारतीय जांबाज टैंको को कहीं भी छोड़ें अपने हथियार पैदल यात्रा ही दुशमन की ओर बढ़ें। डुसाईमन की शूटिंग और ऑटोमोबाइल्स के बावजूद भारतीय जांबाज 5 किमी का सफर तय करते हुए डुसाईमन के दरवाजे तक सफल हो गया।

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अभेद्य किले को ध्वस्त कर भारतीय जांबाजों ने पाक बैंकों पर कब्ज़ा किया
भारी फिल्मांकन का सामना करते हुए डोगरा रेजिमेंट के जांबाज एक-एक कर सैनिक सेना के बैंकों को नेस्तनाबूद कर रहे थे। इस युद्ध में डोगरा रेजिमेंट की अगुआई कर रहे लेफ्टिनेंट कर्नल नरिंदर सिंह संधू पैर में गोली की वजह से घायल हो गए। फिर भी, अपनी जिंदगी की पहरेदारी करते हुए वह दुश्मनीमन से मोर्चा लेते रहे। दुशमन अपने जिस किले को अभी तक अभेद्य मान रहा था, भारतीय जांबाजों ने उस किले को ताश के पत्तों की तरह दहा दिया।

कुछ समय बाद डोगरा रेजिमेंट के जांबाजों ने इस गढ़ के दुश्मन को पूरी तरह से अपने कब्जे में ले लिया। बैटल ऑफ बैतूल बाबा नानक में भारतीय जांबाजों ने दुस्साहसमैन के 34 सैनिकों को मारा था और 26 युद्ध को बंदी बना लिया था। इसके अलावा, भारतीय सेना ने सैनिकी सेना के कमांडो से भारी मात्रा में एसीएल गन, 57वीं आरसीएल गन, 57 यूनिट आरसीएल गन, एमओजी, सोसायटी, बटालियन राइफल और एलएमजी भी जाब्ता की जगह बनाई।

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