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क्रेडके की खाड़ी में फ़्लोरिडा रिलैक्स हो जाते हैं लोग, हर समय फ़्राईकी रिलेक्स में रहती है थकान और नींद?


सर्दियों में आलस्य: देश के पर्यटन हिसांस में ठंड, सर्द हवा और कोहरे के कॉकटेल के जरिए अपना प्रचंड रूप दिखाना शुरू कर दिया है। ऐसे में समुद्र तट पर लोग काफी चंचल हो जाते हैं। प्रेमी-प्रेमिका से प्यार समय रजाई में पड़े रहना चाहते हैं। बहुत जरूरी है पर ही लोग अनमने रजाई से बाहर हैं। मोटापा वज्रपात रजाई में रहने के बाद भी पूरे दिन थकान महसूस होती है। हाँ, आप जानते हैं कि इसके लिए आप जिम्मेटर नहीं होते हैं। इसमें सूरज और आपका दोस्त मन से लेकर जिम मास्टर्स तक होता है।

समुद्र के मौसम में आलू और थकान का सबसे बड़ा कारण धूप की कमी है। असल में, सूर्य की रोशनी कम होने के कारण हमारी बायोलॉजिकल क्लॉक पर असर पड़ता है। लोगों के हार्मोन असंतुलित हो जाते हैं। रोशनी कम होने के कारण मेलाटोनिन हार्मोन का उत्पादन बढ़ जाता है। यही हार्मोन नींद के लिए जिम्माडर होता है। इसलिए लोगों को हृदय संबंधी नींद का अनुभव होता है। साथ ही धूप की कमी से शरीर में विटामिन डी की कमी होने से हर समय थकान महसूस होती है। विटामिन डी की कमी के कारण ऊर्जा स्तर कम हो जाता है। साथ ही हमारी रोग-प्रतिरोधक क्षमता भी दिखती है। यहां तक ​​कि कुछ लोग समुद्र में अवसाद और तनाव की ताकतों का सामना भी करते हैं।

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ठंड में दरारें बनती हैं तनाव और अवसाद की स्थिति
समुद्र तट के समुद्र तट पर लोग समुद्र तट पर ताला-भूना खाना शुरू कर देते हैं। इससे शल्य चिकित्सा शल्यक्रिया पर प्रभाव पड़ता है। मोटे तौर पर होने वाला अवसाद और तनाव फिजियोलॉजिकल डिसऑर्डर है। इसे सीज़नल एफओडक्टिव डिसऑर्डर कहते हैं। इसमें नींद की कमी हो जाती है तो अवसाद का खतरा बढ़ जाता है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, स्टॉकहोम यूनिवर्सिटी के स्लीपर रिसर्चर अर्नो लॉडेन का कहना है कि मैन्युफैक्चरिंग डायनेमिक है। आसान भाषा में कहा गया है कि इंसान दिन के समय सक्रिय रहता है और रात के समय नींद लेने वाला रहता है। उनका कहना है कि ‘हमारे शरीर को बाहरी दुनिया की रोशनी से ठीक किया जाता है।’ सूरज की रोशनी ही हमारे दिमाग को मेलाटोनिन हार्मोन के उत्पादन को रोकने का संदेश देती है।

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क्रेडके की दुनिया में रोशनी कम होने के कारण मेलाटोनिन हार्मोन का उत्पादन बढ़ रहा है।

सूरज की रोशनी शरीर पर कैसे असर करती है
लॉडेन का कहना है कि मेलाटोनिन शाम 8 बजे एक्टिवेट होता है। आधी रात को एक बजे के करीब सोने के दौरान ये चरम सीमा पर पहुंच जाता है। सुबह होने पर सूरज की रोशनी दिमाग को मेलाटोनिन हार्मोन बनाने का संदेश मिलता है। द लाइटिंग रिसर्च सेंटर की मारियाना फिगुरो के अनुसार, काफी लोग समुद्र की लंबी रातें और छोटे दिन के साथ समसामयिक नहीं हैं। इससे कई लोग अवसाद का शिकार हो जाते हैं। कुछ लोगों में कार्बोहाइड्रेट की लत की इच्छा होती है। इससे उनका वजन बढ़ने लगता है। मारियाना के अनुसार, इसे विंटर ब्लूज़ कहा जाता है।

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जहां सबसे ज्यादा पाए जाते हैं मूड डिसऑर्डर के मामले
दिल्ली के डॉ. समीर सलाह कहते हैं कि हमारे दिमाग में एक हिस्सा हाइपोथैलेमस होता है। यह हमारे शरीर के अंदर की घड़ी है, जो बाहर के समय के साथ-साथ जमा होने में मदद करती है। अगर बाहर लगातार अंधेरा है या बेहद कम रोशनी है तो सेंस रिवाज़ वाले लोगों में मूड डिसऑर्डर का खतरा बढ़ जाता है। भारत में मूड डिसिज़ के मामले बेहद कम आते हैं। इसके सबसे प्रमुख मामले लॉर्डी अमेरिका और उत्तरी यूरोप में मिलते हैं। मूड डिसऑर्डर का शिकार लोगों का मन किसी काम में नहीं लगता। ऐसे लोग जिंदगी में खुशियाँ भूल जाते हैं। भूख भूख भी कम लगती है. अब सवाल यह है कि इससे बचने के लिए हमें एक दिन में कितनी रोशनी मिलनी चाहिए।

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मूड डिसीज से बचने के लिए हर एजेंट को अलग-अलग मात्रा में धूप की दरकार होती है।

शरीर को हर दिन कम से कम धूप में रहना चाहिए
प्रोफेसर लॉडेन का कहना है कि मूड डिसऑर्डर से बचने के लिए हर पदार्थ को अलग-अलग मात्रा में धूप की दरकार होती है। फिर भी आमतौर पर माना जाता है कि अगर हर दिन हमारे शरीर को कम से कम 20 मिनट सूरज की रोशनी मिल जाए तो काम बन सकता है। वहीं, मरियाना का कहना है कि मूड डिसऑर्डर से बचने के लिए हर सेक्टर को कम से कम एक घंटे के लिए घर से बाहर रहना चाहिए। अगर ऐसा संभव ना हो तो अपनी खुली टेबल लैंपशेड कुछ देर से पढ़ना चाहिए। अगर ऐसा भी नहीं कर सकते तो आवाज को अपने अनोखेपन का हिसासा बनाना चाहिए। साथ ही उच्च गुणवत्ता वाले एनीमेशन मूड को सही बनाए रखने में मदद मिलती है। बादाम, नारियल, नारियल, खजूर, मिल्कशेक, केसर, संतरा, चीकू, अमरूद, अंडा खाने से मिल सकते हैं फायदा।

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