सोशल मीडिया का कम उपयोग मानसिक स्वास्थ्य में सुधार: वर्तमान विश्व कंप्यूटर क्रांति से आगे चलकर डिजिटल और वर्चुअल युग में प्रवेश कर चुका है। इस डिजिटाइज दुनिया में सोशल मीडिया ज्यादातर लोगों के जीवन का आंतरिक हिस्सा है। ट्विटर के बाद अब ज्यादातर लोग फेसबुक पर ज्यादातर समय रील देखने में व्यस्त रहते हैं। इस बावस्ता से मानसिक स्थिति पर क्या असर पड़ता है, इसे लेकर बहुत सारे अध्ययन हो रहे हैं। कुछ अध्ययनों में कहा जा रहा है कि इससे मूड बूस्ट होता है लेकिन ज्यादातर अध्ययनों में इस बात की पुष्टि की गई है कि सोशल मीडिया पर समय रूह को नकारात्मकता से भर देता है। अब एक स्टडी में यह बात सामने आई है कि सोशल मीडिया पर समय-समय पर एंजाइटी और डिप्रेशन के लक्षण भी कम हो सकते हैं।
डेवलपर के मेंटल हेल्थ पर विश्लेषण किया गया
जर्मनी की रूहर यूनिवर्सिटी की एसोसिएट प्रोफेसर जूलिया ब्रेलोवसिया ने अपनी टीम के साथ इस विषय पर चर्चा की अध्ययन की है. इस शोध में सोशल मीडिया का इस्तेमाल और व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य और वेल बीइंग पर नजर डाली गई है। अध्ययन में अलग-अलग सेक्टर में काम करने वाले 166 लोगों को शामिल किया गया। ये लोग एक दिन में कम से कम 35 मिनट तक सोशल मीडिया का इस्तेमाल अपने काम के अलावा करते रहे। इन लोगों को दो लैपटॉप में बांट दिया गया. पहले ग्रुप को उसी तरह सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने की छूट दी गई थी जैसी वे पहले करते थे, जबकि दूसरे ग्रुप को अपने कुल सोशल मीडिया पर दिए गए समय में से सिर्फ एक घंटे कम करने को कहा गया था। ऐसा करीब एक हफ्ते तक करने के लिए कहा गया. इसके बाद इन लोगों से कुछ सवाल पूछे गए. इनमें वर्कशॉप, नौकरी में संतुष्टि, कमिटमेंट, मेंटल हेल्थ, स्ट्रेस लेवल और उनके व्यवहार से संबंधित प्रश्न पूछे गए।
यह बात रिजल्ट में सामने आई
सिर्फ एक हफ्ते के बाद लोगों में कई अलग-अलग बदलाव देखे गए। अध्ययन में पाया गया कि केवल एक सप्ताह से लेकर एक घंटे तक सोशल मीडिया के इस्तेमाल से सीमित मात्रा में सकारात्मक प्रभाव देखा गया। इससे नौकरी में संतुष्टि मिली और मानसिक स्वास्थ्य पहले से बहुत बेहतर हो गया। रिसर्च टीम की प्रमुख जूलिया ब्रेलोव्स्केया ने बताया कि जिन लोगों ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल आधे घंटे से भी कम समय में किया, उन्होंने सबसे पहले काम का बोझ कम महसूस किया और पहले से बेहतर क्वालिटी भी हासिल की। इन सबके अलावा इन लोगों में खुद के अलग-अलग भाव (छूट जाने का डर) भी कम हो गए। इससे पहले ये लोग अंग्रेजी में बहुत महसूस करते थे। अवसाद का लक्षण भी कम हो गया।
जूलिया ब्रेलोव्सिया ने बताया कि जब हम कोई काम करते हैं तो उस काम के अलावा दूसरे काम दिमाग को भटका देते हैं। हमारे दिमाग में एक साथ डील करने की क्षमता नहीं थी। इसके साथ ही सोशल मीडिया का सबसे ज्यादा इस्तेमाल भय और संदेह की भावना को बढ़ाता है। यही कारण है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल कम करने से मुख्य काम में होता है।
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पहले प्रकाशित : 10 जनवरी, 2024, 06:29 IST
