अनूप/कोरबाः ‘बेबी किस्मत वाले होते हैं, जिन लोगों को 2 जून की रोटी मिलती है’ यह कहावत अक्सर अपने घर में कही जाती है, परिवार में बड़े बुजुर्ग से जरूर मिलेंगे। आपको बता दें कि इस कहावत का जून महीने से कोई मतलब नहीं है. सही अर्थ में इस कहावत का मतलब यह है कि दिन में 2 बजे रोटी बड़ी किस्मत या बड़ी मुश्किल से मिलती है। देखा जाए तो जीवन की सबसे बड़ी जद्दोजहद पेट पालने की ही है। पेट की भूख को शांत रखने के लिए ही इंसान रात-दिन मेहनत करता है। फिर भी यूनेस्को में ऐसे कई लोग होते हैं, जिनमें 2 वक्त की रोटी नियति नहीं होती। लेकिन छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में एक सामाजिक संस्था ने इस दिशा में सबसे पहले असम के लोगों को 2 घंटे भरपेट भोजन का बीड़ा उठाया है।
शहर के मुख्य सामने के तट और रेस्तरां और होटल के कभी भिक्षुक और मानसिक रूप से गरीब लोग खाना मांगते या फिर लार्डदान में खाने का सामान देखने को मिलते थे। लेकिन शहर में अब ऐसी नजर नहीं आती क्योंकि शहर में रोटी बैंक सेवा चल रही है, इसलिए दिन के दोनों समय के भोजन की सुविधा शहर में उपलब्ध है। असल में, 5 साल से शहर में मानव सेवा से जुड़ी संस्था छत्तीसगढ़ हेल्पली सोसायटी रोटी बैंक सेवा चल रही है। संस्था के दो कार्यकर्ता शिवा प्रतीक व मिहिर जहां दोनों समय सेवा में रहते हैं।
महिलाएं भी करती हैं सहयोग
कोसा बाबा से लेकर आर्किटेक्चर तक के 80 परिवार भी शामिल हैं। ऐसे परिवार की महिलाएं हर दिन दोनों समय प्रकृति से रोटी, चावल और सब्जी उपभोक्ता संस्था को सलाहों तक के लिए नामांकन के लिए वेबसाइटें हैं। दोनों समय के भोजन समूह में कार्यकर्ता शिवा और मिहिर संस्था के सेवा आश्रम, बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन, वीकली मार्केट के शेड सहित अन्य स्थानों पर मौजूद स्मारकों तक के अवशेष हैं।
200 लोगों को दो वक्त का खाना
शिव प्रतीक ने बताया कि छत्तीसगढ़ हेल्पली सोसायटी के प्रमुख राणा मुखर्जी, शहर में सड़क किनारे बाशहरा, भिक्षुक और मानसिक रूप से गरीब लोगों को भोजन की तलाश में देखते हुए रोटी बैंक सेवा की शुरुआत 5 साल पहले 21 जून 2018 को हुई थी। तब से अब तक नियमित रूप से दोनों समय दान दाताओं के घर से भोज संग्रहकर्ता कर पुरालेखों तक जारी रखा जा रहा है। वर्तमान में प्रतिदिन 2 सौ लोग घूम रहे हैं।
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पहले प्रकाशित : 10 जनवरी 2024, 17:35 IST
