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छत्तीसगढ़ की अनोखी जेल, जहां कैदी कर रहे हैं गौ सेवा; ‘दो आइज़ ट्वेंटी हैंड फ़िल्म’ की निर्देशित कहानी


अनूप/कोरबाः बॉलीवुड की मशहूर फिल्म ‘टू आईज़ टाइड हैंड’ की कहानी आज भी लोगों को याद होगी, जिसमें एक जेलर की जिंदगी में बदलाव और सच्चाई की राह पर चलना सिखाया गया है। कोरबा जिले के जेल में कुछ ऐसी ही सामने आई है तस्वीर। जहां हत्या, लूट, डकैती की वारदात को अंजाम देने वाले खुंखार कैदी गाय की सेवा कर अपने जीवन में बदलाव ला रहे हैं।

वैसे तो जेल में जुआरियों द्वारा जुल्म के अनुसार सजा का प्रावधान रखा गया है। लेकिन कोरबा के जिला जेल में सुधारगृह बनाया गया है। अपराधी को जेल से रिहा करने के बाद पुनः अपराधी को जेल से रिहा किया जा सकता है और सजा पूरी होने के बाद उसे सम्मान से अपना शेष जीवन छोड़ कर छोड़ा जा सकता है। इस जेल में बंद कैदी गौ-सेवा में रहते हैं। गाय की सेवा कर बंदियों का ना सिर्फ व्यवहार बदल रहा है बल्कि कई कैदी रिहा भी हो गए हैं।

मन में ही सेवा के भाव का संचार
इस जेल के अंदर साल 2006 में गौशाला का ऑपरेशन हो रहा था. यहां ऐसे अवशेष लाये जाते हैं, जो टूटे-फूटे या बीमार होते हैं, यहां 50 से भी ज्यादा मुर्गे होते हैं। खास बात यह है कि जेलर विजयानंद सिंह की प्रेरणा से उनके मन में ही सेवा के भाव का संचार हुआ है।

जेल के जेलर प्रतिदिन प्रातः दैनिक कार्य की शुरुआत करने से पहले जेल के जेलर के साथ वक्त बिताते हैं। जेलर के इस प्रथम कैदी से काफी प्रभावित है। जेलर ने बताया कि गौ सेवा करने से मन में यह बदलाव आया है, कि अच्छे व्यवहार के कारण कई बंदियों की समय से पहले रिहाई हो गई है।

अपराध से नहीं, अपराध से घृणा
फिल्म ‘दो आईज़ टीज़ हैंड’ एक आशावाद की कहानी है, जो बुरी में अच्छी खोजती है। यह प्रस्तावित है कि मनुष्य बुरा नहीं होता, उसका कर्म बुरा होता है। हमें अपराध से नहीं, अपराध से घृणा करनी चाहिए। जिले के जेलर विजयानंद सिंह इसी व्यवस्था से काम कर रहे हैं। जिसका परिणाम देखने को मिल रहा है। खुंखार अपराधी गौसेवा कर अपने घर का रास्ता बदल लेता है।

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