रिपोर्ट : नवनीत कुमार
व्युत्पत्ति. मेरा खाना अमीर है. स्वाद में भी और गुण में भी. सेहत के लिए ये राक्षस है और जो भी चीज बनाता है उसका स्वाद चखता है। इन दिनों मिथिलाचल के मखाने के भाव चढ़े हुए हैं. वो बेहद डिसाइड में है. जीआई टैग मुलाकात के बाद इसकी मांग ग्लोबल हो गई है। मांग के सामान की आपूर्ति नहीं हो रही है। इसलिए मेरे यहां खाना बनाने वाले व्यवसायियों और किसानों के लिए आगे बढ़ने का बेहतरीन अवसर है।
मखाना को टैग मीटिंग के बाद वैश्विक स्तर पर इसकी पहचान बनी हुई है। इसलिए मिथिलांचल का मखाना स्काई छू रहा है। देश के साथ-साथ कार्टूनिस्ट भी अपनी ताकत दिखाते हैं। इजराइल, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप जैसे देशों में ये बिका जा रहा है। पिछले तीन चार साल से मखाना की खेती का रकबा बढ़ा है। इसके पीछे वजह यह है कि किसानों को अपनी खेती के प्रति जागरूकता पैदा करने और सरकार से लगातार मदद मिल रही है।
उछाल पर हैं भाव
राष्ट्रीय खाना अनुसंधान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मनोज कुमार ने इस बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि मिथिलांचल का खाना एक ऐसी समस्या है, जिसका प्रयोग पूजा पाठ से लेकर सुपरमार्केट तक में किया जाता है। ना सिर्फ भारत बल्कि पोस्टर में मखाने की काफी तेजी से मांग बढ़ रही है। डिजाईन के कारखाने मखाने के पैदावर कम हैं. इसलिए पर्याप्त आपूर्ति नहीं कर पा रहे हैं. किसानों के पास इसके अलावा अन्य का सुनहरा अवसर है। मखाना का उत्पादन भंडार तो निश्चित रूप से किसानों की समीक्षाओं पर भी एक ही से आधारित होता है।
किसानों के लिए सुनहरा अवसर
वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मनोज कुमार बने मिथिलाचल का मखाना अब पूरी दुनिया में मांग रही है। देश का 90 प्रतिशत मखाना उत्पाद मिथिलांचल क्षेत्र में होता है। यहां के उद्यमियों और उद्यमियों के पास सुनहरा मौका है कि वो अपनी फसल को दुनिया भर में पहुंचा सकते हैं। उन्होंने बताया कि लोकल मार्केट में मखाना 600 से 700 रुपए की कीमत है। यही मखाना के पोस्टर में इसकी कीमत 3 हजार रुपए तक हो जाती है। किसान यहां अपनी प्रोफिट दवा बढ़ा सकते हैं। सरकार भी किसानों की लगातार मदद कर रही है। इसका परिणाम भी सामने आया है। वह एक दिन दूर नहीं कि मिथिलांचल का खाना पूरे विश्व में राज करे।
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पहले प्रकाशित : 8 फरवरी, 2024, 14:20 IST
