अगले साल होने वाले 95वें ऑस्कर अवॉर्ड के लिए भारत की ओर से आधिकारिक तौर पर प्राइम के रूप में लॉन्च की गई फिल्म का नाम क्या है? शेयर करो, तब तक आगे बढ़ रहे हैं। क्या आप जानते हैं कि राजामौली द्वारा निर्देशित फिल्म ‘आर आरआर’ आधिकारिक तौर पर भारत की ओर से ऑस्कर के लिए नहीं भेजी गई है? ना सरकारी फिल्मों में विवेक अग्निहोत्री द्वारा निर्देशित ‘डी केम्स फाइल्स’ और अयान मुखर्जी द्वारा निर्देशित ‘ब्रह्मास्त्र’ भी हैं। इन तीन फिल्मों के नाम पर आपकी उत्सुकता बढ़ रही है, तो इसका मतलब यह है कि जिसे मैं देखने जा रहा हूं वह शायद सही ट्रैक पर है।
असल में, सुपरहिट का तमगा ना चिपका हो तो ऑस्कर अवार्ड्स के लिए निकली अधिकांश भारतीय फिल्में सिनेमाघर में कब आईं और कब गईं, आसानी से पता नहीं चलता। उदाहरण के तौर पर तीन साल पहले 92वें वेंचर ऑस्कर के लिए रणवीर सिंह और आलिया भट्ट की फिल्म ‘गली ब्यॉय’ को नामांकित किया गया था, जो कि नामांकित चर्चा में थी, क्योंकि नेमचीन स्टार्स की इस फिल्म को व्यावसायिक रूप से नामांकन (238 करोड़ रुपये) मिली थी। इसी तरह 74 वें वें ऑस्कर के लिए आमिर खान की फिल्म ‘लगान’ (2001) के लिए रिलीज हुई, जो बॉक्स ऑफिस पर हिट रहने के साथ-साथ नामांकित पाने में भी सफल रही।
30वें ऑस्कर के लिए रॉबर्ट खान निर्देशित ‘मदर इंडिया’ (1957) और 61वें के लिए मीरा नायर की ‘सलाम बाँबे’ (1988) के बाद ‘लगान’ तीसरी सफल फिल्म थी, जिसे मुख्य प्रतियोगिता के लिए नामित होने का अवसर मिला था। . तब से लेकर आज 21 साल होने को आए, कोई भी फिल्म यहां तक नहीं पहुंच पाई। कई और उदाहरण भी हैं, ज़िक्र आगे होते रहेंगे।
जलसा बहस बहस का
वैसे, साल 2023 में होने वाले ऑस्कर के लिए आधिकारिक तौर पर रिलीज की गई फिल्म का नाम ‘लास्ट फिल्म शो’ है। यह गुजराती भाषा में बनी फिल्म है, जिसे ‘छेल्लो शो’ या ‘छेलो सिनेमा’ के नाम से भी बुलाया जा रहा है। सितंबर में ऑस्कर के लिए चुने जाने के कुछ हफ्ते बाद यह फिल्म सुपरस्टार में रिलीज हुई, जिसमें एक प्रभावशाली फिल्म भी शामिल हो सकती है। जल्द ही यह प्रोटोटाइप पर भी उपलब्ध होगा। इस बीच आर. आर. आर. आर. आर. के.
जनसंपर्क विवाद इसलिए, क्योंकि हर साल हम एक नया कारण खोजते हैं, ऑस्कर न मिलने का। कभी फिल्म का चुनाव सही नहीं होता, तो कभी लॉबिंग ठीक से नहीं की जाती. कभी किसी फिल्म पर पोटिज्म का आरोप लगता है तो कभी कलाकृति के दोष निकल आते हैं। साल 2007 में आई विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म ‘एकलव्यः डी रॉयल गार्ड’, 80 वें ऑस्कर के लिए पंकज कपूर अभिनीत फिल्म ‘धर्म’ (2007) के निर्देशन में बनी फिल्म भावना स्वॉर्ड्स कोर्ट तक पहुंची थी। तो साल 2012 में आई अनुराग बसु निर्देशित और अभिनेता कपूर-प्रियंका चोपड़ा अभिनीत फिल्म ‘वाई’, जिसे 85वें ऑस्कर के लिए मंगाया गया था, पर प्रेरणा के नाम पर सीधे-सीधे बार सीन के कॉप के आरोप लगे। इस बार चेलो सिनेमा को लेकर भी तरह-तरह की बातें सामने आई हैं। ऑस्कर पाने की राह में अवरोधकों, सहयोगियों और दोषों की लंबी दास्तां रही है।
कलाकार की बात से फ़ुट क्यों
हालाँकि इस पर बहुत कम बहस होती है कि हम कितनी ईमानदारी से फिल्में बना रहे हैं। किस फिल्म का 300 या 500 करोड़ का बजट चर्चा में रहता है। वीएफएक्स पर चर्चा होती है, पूरे देश में शूटिंग की गई और प्रोडक्शन वैल्यू पर आधारित खबरें सामने आईं। लेकिन अपने विषय, ऐतिहासिक साक्ष्य या चित्रण को लेकर सत्यता, साक्ष्य और कहानी की प्रस्तुति पर हमारी फिल्में कहां रखी जाती हैं? अक्सर कई फिल्मकार किसी देसी-विदेशी फिल्म से प्रेरित या प्रेरित होने की बात करते हैं, लेकिन मूल कृति के साथ वह कितना न्याय कर पाता है, इसका आकलन नहीं होता। या फिर शोध के बाद ऐसे सहयोगियों और विद्वानों का क्या फायदा है, जो बाद में सत्य पाए गए या फिर अधूरे से बने ही न जा दोस्त।
दो उदाहरण प्रस्तुत हैं. पहली है, निर्देशित जेम्स कैमरून की फिल्म ‘टाइटैनिक’ (1997) का, जो 70वें ऑस्कर में 14 स्थानों पर नामांकित सफल रहीं और 11 ऑस्कर में उनका नाम रहा। वर्ष 2012 में विश्व सहयोग के रूप में अपार सफलता के बाद नील डिग्रसे टायसन, एक अमेरिकी खगोलशास्त्री, ने कैमरून का ध्यान फिल्म के एक सीन की ओर खींचा। बताया गया कि रोज (केट विंसलेट) क्लेमैक्स, जिस सीन में स्टार्स की तरफ से स्टार्स की तरफ देखा जा रहा है, 1912 में स्टारफील्ड सन् 1912 में वह विभाजन और देश के हिस्से की मौलिक विशेषता नहीं थी। टायसन का दावा खगोलीय पिंडों की रचना और उनके भौतिक अन्वेषणों के अध्ययन के आधार पर था, जिस पर कैमरून ने भूल सुधार की बात कही और टायसन से सही संरचनात्मक सुविधाओं को कहा, ताकि उस दृश्य को स्थापित किया जा सके।
हालाँकि, हम अभी भी उस दौर में कॉमिक्स के क्षेत्र में फिल्में नहीं बनाते हैं, जहां किसी भी ऐतिहासिक महत्व या विज्ञान कथा फिल्म में इतनी गहराई और गहनता से काम किया गया हो। किसी भी साइंस फिक्शन फिल्म के निर्देशन के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण की कोई आवश्यकता नहीं है, लेकिन वैज्ञानिक सोच और दृष्टिकोण को जोड़ा ही जा सकता है।
खैर, दूसरा उदाहरण है ‘आर रिक्रूट’ जिसने 1200 करोड़ रुपए की शानदार व्यावसायिक सफलता के साथ-साथ दुनिया में ख्याति और प्रशंसा हासिल की है। अमेरिकी अभिनेता डैनी डिविटो से लेकर जेम्स गन, डि रुसो ब्रदर्स, स्कॉट डेरिक्सन, लैरी काराजवेस्की, जैक्सन लेनजिंग, डैनियल क्वान, इगार रेस्ट सेरीखे फिल्मकारों ने फिल्मों की लोकप्रियता हासिल की है। स्पष्ट रूप से, ऑस्कर को लेकर इसके टिकट के किले में काफी उछाल है और उम्मीद की जा रही है कि वीएफएक्स श्रेणी में नामांकित फिल्म को यह सफलता मिल सकती है। आर. आर. आर. आर.
प्रामाणिकता और कठिनाइयां
असल कहानियों और प्रेरणा से ‘आर आर आर’ की कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है, पार्श्व में ब्रिटिश राज सन् 1920 की दिल्ली और उसके आस-पास के इलाके हैं। कहानी में यदि दावे में कुछ कहा नहीं गया है, तो दावे में कुछ दिखाया भी नहीं गया है। यानी राजामौली की इस ऐतिहासिक फिल्म में मिर्ज़ा चौक, पुरानी दिल्ली, यमुना का तट और पुराने लोहे के पुल का चित्रण है, जैसा करण ने अपनी फिल्म ‘कभी खुशी कभी गम’ (2001) में मिर्ज़ा चौक का चित्रण किया था।
यद्यपि प्रामाणिकता का दावा करण जौहर ने भी नहीं किया था, तो क्या राजामौली को भी जौहरी जैसी छूट मिलनी चाहिए? ऑस्कर की रेस में नामांकित पाने में सफल रही ‘लगान’ भी एक काल्पनिक कहानी थी, जो बीआर चोपड़ा द्वारा निर्देशित और दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला अभिनीत फिल्म ‘नया दौर’ (1957) से प्रेरित थी। इसका बैकग्राउंड सन् 1893, ब्रिटिश बिशप दिखाई दिया। इसमें स्पष्ट रूप से किसी भी तारीख का दावा नहीं किया गया है, लेकिन काल्पनिक होने की बात सामने नहीं आई है कि किसी भी चीज के प्रति प्रमाणिकता की आवश्यकता है, जबकि ‘आरआर’ की पृष्ठभूमि 30 साल आगे की है। आज के फिल्मकारों और उनकी रिसर्च टीम से इतनी उम्मीद तो की ही जा सकती है कि दशकों का इतिहास और महत्वपूर्ण जानकारी पर जानकारी वह जी नहीं चुराते होंगे।
असल, अब रियल हम फिल्म मेकिंग के एक ऐसे दौर में हैं, जहां फंतासी और सिनेमाई आजादी के नाम पर कुछ भी हजम करने की अन्य चीजें कम हो रही हैं। ऑस्कर या उसके समकक्ष मंचों पर डिस्कलेमर का महत्व नहीं है, जो बताता है कि इस काल्पनिक कहानी में किसी जीवित या मृत व्यक्ति को कोई लेना-देना या यह एक संयोग नहीं हो सकता है। क्योंकि जब फिल्मकार कहते हैं कि यह इंस्टालेशन ड्रामा है, तो इसका मतलब यह है कि उन्होंने और अलग से कुछ खास काम किया है। सामने वाला भी उसे इसी आधार पर जांचता है, जिसके लिए बिंदु सत्यता और जानकारी के बारे में जानकारी दी जाती है। दुनिया की अलग-अलग तरह की कहानी देखने के बाद अब हमारा दर्शक भी पहले जैसा नहीं रहा। इसलिए ‘आरआरसी’ ने स्वतंत्र रूप से ऑस्कर के लिए दस्तक दी थी, लेकिन पूर्व में आधिकारिक तौर पर जारी किए गए नामांकन से यह अलग नहीं दिख रहा था।
बस्ती की रिवायत
वैसे, ‘राक्षस’ और ‘दि कीम फाइल्स’ के अलावा ‘ब्रह्मास्त्र’, ‘बधाई दो’, ‘रॉकेटरी दी नाम्बी इफेक्ट’, ‘अनेक’, ‘झुंड’, ‘अपराजितो’, ‘स्थलम’, ‘इराविन निझल’ शामिल हैं। 13 फिल्मों को हिटकर ‘छेल्लो शो’ को मिली सफलता। हालाँकि छेलो सिनेमा को लेकर 1988 में आई इटेलियन फिल्म, सिनेमा पैराडिसो, से हेलो की बातें भी सामने आई हैं। यह भी कि यह फिल्म एक विदेशी बैनर द्वारा बनाई गई थी, जिसे बाद में एक भारतीय बैनर ने खरीदा था और इस फिल्म ने पिछले साल भी ऑस्कर के लिए आवेदन किया था।
बताया जाता है कि फिल्म ‘8 माइल’ (2002) से जोया अख्तर द्वारा निर्देशित फिल्म ‘8 माइल’ (2002) का सामना करना पड़ा था। संभवतः इसी कारण से फिल्म का ऑस्कर नामांकन भी रद्द कर दिया गया। वैसे, कई फिल्मकारों का मानना है कि नामांकित नामांकन का कोई निश्चित पैमाना नहीं है। कुछ ऐसा ही भाव ऑस्कर के लिए फिल्म क्रिएटर टाइम हमारे यहां भी दिखता है। चेलो सिनेमा को चुनने की वजह, इसकी कहानी देखने के तरीके और दुनिया का ध्यान खींचने की ताकत, बताई जाती है।
असल में, यह एक ऐसी वजह है जिसने लगभग हर सफल फिल्म पर काम किया है। लेकिन हमें देखने को मिला कि निजीकरण के साल पैट्रिक कौशल की फिल्म को न पिक्चर्स के पीछे क्या कारण थे। क्योंकि कई बार फिल्में बनी फिल्मों की दास्तां पर ज्यादा ध्यान खींचा जाता है। शूजीत सरकार द्वारा निर्देशित ‘सरदार उधम’ (2021) को डोमिनिका जाने वाली सूची से नामांकित किया गया था, इसलिए इसे हटा दिया गया था, क्योंकि यह फिल्म भारतीयों के प्रति अपवित्रता का चित्रण करती है। और वैश्विक जगत के इस दौर में नफरत पाले रखना ठीक नहीं है।
यह खोज के बाद कुछ लोग उत्सुकतावश देखते हैं कि अतिउत्साही अतिक्रमण से ख़त्म क्या होता है। और जिन लोगों ने इस फिल्म का आकलन किया है, वह शायद बार-बार यह पंक्तियां पढ़ते हैं कि अत्याधिक घृणा का चित्र, क्या विध्वंसक ब्रिटिशों के प्रति अधिक है। एक दोस्त को बताएं कि अगर इस साल ‘राशिआर’ को ही शामिल किया जाए, तो फिर से अतिउत्साही नफरत की बात नहीं उठेगी। क्योंकि फिल्में तो दोनों ही ब्रिटिश शासन के क्रांतिकारियों का चित्रण करती हैं। या काल्पनिक कहानी के नाम पर किसी प्रकार की विशेष छूट का भी प्रस्ताव है। या फिर यह माना जाए कि लगान को इसलिए चुना गया, यहां भी और वहां भी, कि क्या इसमें शामिल है कि सोमनाथ के प्रति अपमान का स्तर बिल्कुल न्यूनतम स्तर पर था?
इस प्रकार से देखें तो हर साल किसी न किसी फिल्म के साथ कोई नई कहानी जुड़ी हुई दिखाई देती है। यह तर्की गायब रहती है कि फलां फिल्म के पीछे असल वजह क्या थी। उसकी सत्यता, मरम्मत और स्थापना जैसे कारण भी शामिल थे। गौर करने वाली बात यह है कि वर्ष 2003 में एक उपयुक्त फिल्म की कमी के कारण ऑस्कर के लिए कोई भी फिल्म प्रदर्शित नहीं हुई, जबकि एक अरसे से लेकर पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्में हमारे यहां बनी रहीं।
हमें कैसे पता चले कि टैब यह निर्णय ठीक था, जबकि उस वर्ष डॉ. चंद्र प्रकाश प्रकाश निर्देशित ‘पिंजर’, ‘मुन्नाभाई रियासत’, ‘कल हो ना हो’, ‘कोई मिल गया’, ‘बागबान’, ‘एलोमस कारगिल’ सहित कुछ फिल्में शामिल थीं जो प्रदर्शित हो सकती थीं। और मन भी ले लिया कि तब उनका फैसला ठीक था, फिर साल 2007 में ‘एकलव्यः दी रॉयल गार्ड’ में किस आधार पर चयन किया गया जो न तो व्यावसायिक रूप से सफल थी और न ही किसी समीक्षक ने उन्हें स्थान दिया था।
यह अंतिम सत्य तो नहीं
गोविंद निहलानी निर्देशित और ओम पुरी अभिनीत फिल्म ‘अर्द्ध सत्य’ (1983) के एक सीन का अंत में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। एक सीन में फिल्म के हीरो के इंस्पेक्टर अनंत वेलेंकर (ओम पुरी), अभिनेत्री ज्योत्सना (स्मिता पाटिल) के सामने अर्ध सत्य नामक कविता बड़ी ही उत्सुकता से शुरू होती है। जैसे-जैसे वह आगे बढ़ता है, उसके मन के भाव, चेहरे पर नई भावनाओं का चित्रण किया जाता है। कविता के अंत तक वह एक निधाल आत्मा की तरह ज्योत्सना के रूप में सामने आती है, जिसमें निजी और डर दोनों शामिल हैं।
अनंत में एक और सीन, ज्योत्सना को अपनी नौकरी के बारे में बताना चाहता है कि वह वहां जैसा लगता है। वह अपने जीवन का सच सामने रखना चाहता है, जिसमें घुटन है, पचता है, टूटना है। ऐसा समय नैनों से उसकी कुंठा की पार्टी के रूप में मनाया जाता है, जहां वह लाल रंग में रहती है। कुर्सी पर सामने आलीशान बंगले से नजरें नहीं मिलीं। टेबल पर अपना हाथ सरकाते हुए ज्योत्सना उसे सुनना चाहता है, पर हाथ पीछे सरका लगाना चाहता है। फिल्म बाकी है कि अस्सी के उस दौर में पुलिसिंग को लेकर किस तरह का माहौल बना रहेगा।
एक दस्तावेज़ के रूप में ‘अर्ध सत्य’ के कई ज़िक्र में बातें कही जा सकती हैं, जो शायद इस शास्त्र से भी बनाई गई हो कि विषय के प्रति अपनी सहमति और सत्यता के आधार पर फिल्म को भविष्य में बरकरार रखा जाएगा। निर्देशित के जेहन में एक पुलिसवाला और उसकी छवि के आसा-पासा समुद्र तट अर्ध सत्य, ही संभावित केंद्र में रहना होगा। इसलिए इस फिल्म की आज भी एक नहीं बल्कि कई विशेषताएं हैं। क्या अजीब घटना है कि 1980 में आई सत्येन बोस की फिल्म ‘पायल की झंकार’, 53 वें ऑस्कर के लिए लगातार तीन साल तक रिलीज नहीं हुई। इस अंतर्विरोध के बाद सन 1984 में आई महेश भट्ट द्वारा निर्मित ‘सारांश’ को 57वें ऑस्कर के लिए भेजा गया। अर्ध सत्य की तरह संभवतः और भी कई फिल्में प्रासंगिक हैं, कौन सा ऑस्कर नामांकन किस स्थान पर हो सकता है?
