अंजू गौतम/सागर: सागर यूनिवर्सिटी के वनस्पैटिक गार्डन में कुछ ऐसे दुर्लभ उपाय मौजूद हैं, जिन्हें पीने के लिए रामबाण इलाज संभव हो सकता है। यहां पर स्टीविया यीज़ की तुलसी के प्रयोग हैं, जिनमें 15 साल पहले उत्तराखंड से लाया गया था। बताया जाता है कि इस तरह के उपाय उत्तराखंड के हरियाली पर्यटकों और वहां के मौसम की वजह से कहीं और पाए जाते हैं। इसकी खेती के लिए आर्थिक अर्थशास्त्र भी उपलब्ध है। लेकिन चैलेंजर का सीज़न भी उनके लिए उपयुक्त बताया गया है।
वनस्पतिशास्त्री प्रो. दिव्य वैज्ञानिक कहते हैं कि स्टेविया नामक पौधा आधुनिक समय में ऐसी खोज करता है, जो मधुमेह और मोटापे जैसी बीमारी से ग्रसित लोगों में उम्मीद की एक जगाई है। यह एक ऐसा पौधा है, जो आम-चीनी में पंजीकृत है और यह प्राकृतिक होता है। इसमें किसी भी तरह का कोई केमिकल नहीं है. भारत में स्टेविया को तुलसी के पत्ते के नाम से भी जानते हैं. यदि कोई शुगरी फार्मास्युटिकल इसका उपयोग करना चाहता है तो वह केवल दो पत्ती वाली चाय में चीनी का उपयोग बिल्कुल नहीं करेगा। आईएसआई एसिड ड्रॉप का उपयोग भी किया जा सकता है। इसके अलावा अन्य सुखाकर पाउडर बना लें. फिर उसका भी प्रयोग किया जा सकता है.
इस औषधि में कई औषधीय गुण हैं
स्टीविया मिष्ठान्न तुलसी के नाम से प्रसिद्ध है। उद्यमों में चीनी नारियल तो होता है, लेकिन चीनी नारियल नहीं होता। इसमें फ्लेवोनोलोड्स, एंटीऑक्सीडेंट, प्रोटीन, आयरन, आयरन, विटामिन ए, के और सी होते हैं। इसके अलावा तुलसी में टैनिन, ट्राईटरपेंस, कैफीनोल, कैफिक एसिड और क्वेरसेटिन जैसे कई एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं।
पौधे की सलाह पर पौधे
वहीं, इस औषधि में फूल आने के बाद विटामिन बी भी बन जाते हैं, जिन्हें माध्यम से भी शामिल किया जा सकता है। साथ ही इसके अलावा अन्यत्र भी लगाया जा सकता है। बेसिक की सलाह लेकर इन प्रमाणित को आसानी से कहीं भी रखा जा सकता है।
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पहले प्रकाशित : 19 सितंबर, 2023, 21:35 IST
