HomeदेशBeginnings Of Learning : अगर आप अभिभावक या अध्यापक हैं, तो जरूर...

Beginnings Of Learning : अगर आप अभिभावक या अध्यापक हैं, तो जरूर पढ़ें जे. कृष्णमूर्ति की पुस्तक ‘सीखने की चाह’


जे. कृष्णमूर्ति ने भारत, अमेरिका और इंग्लैंड में स्कूलों की स्थापना की. उन्होंने अपनी संस्कृति और सामाजिक व पारिवारिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए शैक्षिक मांगों को पूरा करने के साथ-साथ बच्चों की परवरिश के दर्शन पर गहरी शोध की और समाज को जागरुक करने का काम किया. उनके ज्ञान का रास्ता दर्शन और व्यवहार की दुनिया से होकर जाता है. उन्होंने हमेशा एक व्यावहारिक दार्शनिक की तरह सोचा. उनकी सभी चर्चाएं प्रासंगिक समस्याओं से संबंधित हैं और बच्चों की परवरिश और उनको समझने के इर्द-गिर्द घूमती हैं.

‘सीखने की चाह’ किताब जे. कृष्णमूर्ति की शिक्षाविषयक अंतर्दृष्टियों का समुच्चय है. इसके पहले भाग में ब्रॉकवुड पार्क स्कूल (इंग्लैंड) के विद्यार्थियों के साथ कृष्णमूर्ति के वार्तालाप संकलित हैं तथा स्कूल स्टाफ़ के साथ हुई उनकी बातचीत और दूसरे भाग में प्रकृति के वर्णनों के मध्य अभिभावकों, अध्यापकों तथा युवा आगंतुकों के साथ परिचर्चाएं हैं. किताब के दोनों भागों में सभी तरह के प्रश्नों और जिज्ञासाओं को शामिल किया गया है. ‘स्नेह और भावाकुलता के बीच का फ़र्क’ तथा ‘रसोई में हाथ बंटाने और सैर पर निकलने के बीच चुनाव की दुविधा’ से लेकर ‘आदर्शवाद व क्रांति’ एवं ‘ड्रग्स की समस्या’ तक.

जे. कृष्णमूर्ति कहते हैं, “जब आप इस जगह से विदा लें, तब तक आपने ऐसा कुछ तो आत्मसात् कर लिया हो, जो न तो हिन्दू है… न ही ईसाई… और सही मायने में आपका जीवन तभी पुनीत और पावन होगा.” साथ वह यह भी कहते हैं, कि “कहने का मतलब यह नहीं है कि खोज बंद कर दी जाए, बल्कि इतना ही कि सीखने की शुरुआत हो. ढूंढ पाने के मुकाबले सीखना कहीं अधिक महत्त्व रखता है.” जब तक शिक्षा का सरोकार केवल बाहरी तौर पर संवारने, सुधारने से रहेगा. तब तक अंतर्मन का अपनी अगाध गहराई में गति करना निश्चित रूप से चंद लोगों तक ही सीमित रहेगा दुख की मात्रा भी उतनी ही ज्यादा रहेगी.

जब तक आप अकूत ऊर्जा के साथ केवल सतह पर ही दौड़ते रहेंगे तब तक दुख को न तो समझा जा सकता है और न ही सुलझाया जा सकता है. खुद को जानने-समझने में ऊर्जा लगाकर जब तक आप दुख की गुत्थी को खोल नहीं लेते हैं, तब तक विद्रोह और सुधार के ऐसे सिलसिले चलते ही रहेंगे जिनमें कि बारंबार सुधार की आवश्यकता पड़ेगी और साथ ही आदमी के आपसी वैर-विरोध का अंतहीन सिलसिला भी चलता रहेगा. सभी बातों का एक जवाब है- शिक्षा, यानी कि मनुष्य को मुकम्मल तौर पर समझना, न कि उसके जीवन के किसी एक पहलू पर या एक आयाम पर ही सारा ज़ोर लगा देना. बाहरी बदलाव में पूरा जोश-ख़रोश लगा देने वाले उत्साही लोग उन मुद्दों को दरकिनार कर देते हैं जो कि अधिक बुनियादी और ज़रूरी होते हैं.

जे. कृष्णमूर्ति के लिए कोई भी प्रश्न अस्पृश्य नहीं है. उनके अनुसार ‘जीवन’ तथा ‘शिक्षा’ एक ही प्रवाह के दो नाम हैं. मनुष्य औपचारिक स्कूल के परिवेश में हो या उससे बाहर, वह आजीवन ‘विद्यार्थी’ और ‘शिक्षक’ दोनों ही है, क्योंकि जीवन से बड़ा कौन-सा स्कूल है! ‘राजपाल प्रकाशन’ से प्रकाशित यह किताब कृष्णमूर्ती की ‘Beginnings Of Learning’ का हिंदी अनुवाद है, जिसे अचलेश चंद्र शर्मा और निधि पंत ने अनुवादित किया है. प्रस्तुत हैं ‘सीखने की चाह’ पुस्तक से वह ज़रूरी अंश जिसमें जे. कृष्णमूर्ति की अभिभावकों और अध्यापकों के साथ बातचीत शामिल की गई है…

पुस्तक अंश (पृष्ठ 250 – 255) : सीखने की चाह
ध्यान शरीर को नियंत्रण में करना बिल्कुल नहीं है. तन व मन के बीच कोई वास्तविक विभाजन रेखा नहीं खींची जा सकती. यह दिमाग, यह ‘नर्वस सिस्टम’ और वह जिसे कि हम मन कहा करते हैं, ये सब एक ही हैं, अविभाज्य हैं. ध्यान का यह स्वाभाविक कार्य है कि वह इस समग्र संरचना की समन्वित गतिशीलता को जन्म देता हैतन को मन से अलग मान लेना और फिर तन को बौद्धिक निर्णयों द्वारा नियंत्रित करना – यह तो परस्पर विरोधाभास पैदा करता है जिससे तरह-तरह के संघर्ष, द्वंद्व और प्रतिरोध पैदा होने लगते हैं .

नियंत्रण करने का हर निर्णय प्रतिरोध ही पैदा करता है – यहां तक कि सजग, सचेत रहने का निश्चय भी यही करता है. निर्णय द्वारा पैदा किए जाने वाले इस विभाजन को समझना ही ध्यान है. स्वतंत्रता किसी निर्णय से नहीं आती बल्कि प्रत्यक्ष बोध से आती है, स्पष्ट समझ से आती है. स्पष्टतः देखना- समझना ही कर्म है, एक्शन है. ऐसा नहीं है कि पहले आप देखने-समझने का संकल्प लें और फिर कर्म करें. अपने तमाम तरह के विरोधाभासों को अपने आप में समाये हुए कोई भी संकल्प, आखिरकार होता तो एक इच्छा ही है. जब कोई इच्छा किसी दूसरी इच्छा पर प्रबलता से हावी हो जाती है तो वह संकल्प का रूप ले लेती है. इसमें विभाजन का होना अवश्यंभावी रहता है. लेकिन ध्यान तो इच्छा को ही समझना है, न कि किसी एक इच्छा के द्वारा दूसरी इच्छा पर नियंत्रण करना . इच्छा इंद्रियजनित कुलबुलाहट होती है जो कि सुखद भी होती है और डर पैदा करने वाली भी. किसी भी इच्छा पर विचार का लगातार मंडराते रहना उस इच्छा को जारी रखता है, उसे बल प्रदान करता है. ध्यान वास्तव में मन को पूरी तरह रिक्त कर देना है. तब केवल शरीर का कार्यकलाप रह जाता है, केवल अवयवों की गतिविधियां रह जाती हैं और कुछ’ भी नहीं; तब विचार ‘यह मैं’ और ‘यह मैं नहीं’ से पहचान जोड़े बिना कार्य करता है. विचार यांत्रिक होता है—जैसी कि शारीरिक संरचना है. जो चीज़ द्वंद्व पैदा करती है वह है विचार का अपने खंडों में किसी एक के साथ तादात्म्य कर लेना जो कि ‘मैं’ बन जाता है, अहं बन जाता है और उस अहं के विभिन्न विभाजित रूप भी . इस अहं की कभी भी और कोई आवश्यकता है ही नहीं . केवल शरीर ही है, और कुछ नहीं, और मन की मुक्ति तभी घटित हो पाती है जब विचार इस अहं का पोषण नहीं कर रहा होता. समझने के लिए अगर कुछ है तो वह अहं नहीं है बल्कि केवल विचार है जो कि इस अहं का रचयिता है. जब अहं से मुक्त केवल यह शारीरिक संरचना हो, तो प्रत्यक्ष बोध, चाक्षुष और अचाक्षुष दोनों तरह से, विकृत नहीं हो सकता. असल बात है ‘जो है’ को केवल देखना, और यह प्रत्यक्ष बोध ही ‘जो है’ से पार चले जाना है. मन को रिक्त करना कोई विचार की गतिविधि नहीं है, न ही यह किसी बौद्धिक प्रक्रिया से होता है . ‘जो है’ को निरंतर देखना, बिना किसी भी तरह की विकृति के बस देखना ही मन को सभी विचारों से रहित कर देता है, लेकिन फिर भी यह मन आवश्यकता होने पर विचार का प्रयोग करता रह सकता है. विचार, यांत्रिक होता है लेकिन ध्यान यांत्रिक नहीं होता.

भोर होने को थी और पौ फटते प्रकाश में इमली के पेड़ पर बैठे दो उल्लू दिखाई दे रहे थे. वे छोटे आकार के थे और हमेशा जोड़े में ही नज़र आते थे. वे सारी रात रुक-रुक कर गोहराते रहते थे . उनमें से एक तो खिड़की की सिल पर आ बैठा और अपनी ही खास खरखराती आवाज़ में दूसरे को बुलाने लगा. डाल पर बैठे हुए उल्लुओं का घोंसला उसी पेड़ पर था . दिन में आराम फ़रमाने से पहले वे अक्सर यहीं आकर बैठ जाया करते थे, एकदम गुमसुम और ख़ामोश . अब उनमें से एक वहां से चुपचाप हटकर घोंसले में चला और फिर दूसरा वाला भी उसके पीछे-पीछे, लेकिन इस समय वे कोई शोर नहीं कर रहे थे . वे केवल रात में ही बतियाते और चिल्लाते हैं. इमली के इस पेड़ ने केवल उल्लुओं को ही बसेरा नहीं दिया है बल्कि इसने बहुत सारे तोतों को भी आशियाना दिया हुआ है. नदी के ऊपर झांकता हुआ सा यह एक विशाल वृक्ष है. इस पर गिद्ध, कौवे और हरी – सुनहरी मक्खीभक्षी चिड़ियां भी रहती हैं . मक्खीभक्षी चिड़ियां अक्सर बरामदे में खिड़की की सिल पर आकर बैठ जाया करती है, लेकिन उसके लिए आपको बिल्कुल निश्चल बैठना पड़ता है, आंखों को भी इधर-उधर चलाए बिना. वह एक अनोखी घुमावदार उड़ान भरती है और अपने आप में मस्त रहती हैं, कौवों की तरह नहीं जो कि गिद्धों को तंग करते रहते हैं . उस सुबह कुछ बंदर भी आ गए थे. पहले तो वे काफी दूर थे पर अब वे सब उस मकान के नज़दीक आ पहुंचे थे. वे कुछ दिन वहीं रहे लेकिन फिर वहां से चले गए थे. एक अकेला नर बंदर हर सुबह इमली के सबसे ऊंचे वाले पेड़ पर दिखाई देता था. वह उसकी सबसे ऊंची डाल पर जा बैठता था और वहां से नदी को, आते-जाते गांव वालों को और मवेशियों को देखता रहता था. सूरज के गरमाने के साथ-साथ वह धीरे-धीरे नीचे उतरता जाता था और फिर जाने कहां चला जाता था, लेकिन अगले दिन सुबह को वह नदी पर सुनहरी रास्ता सा बना रही धूप के निकलने पर फिर वहीं दिख जाता था. दो हफ्तों तक वह रोज़ आता रहा था, अकेला, तटस्थ, देखता – निहारता हुआ, और एक सुबह वह गया तो फिर लौट कर नहीं आया.

वे छात्र फिर आ गए थे लड़कों में से एक ने पूछा, “क्या मुझे अपने माता-पिता की आज्ञा नहीं माननी चाहिए ? आखिर वे ही तो मेरा लालन-पालन कर रहे हैं, मुझे पढ़ा रहे हैंपैसे के बिना तो मैं इस स्कूल में आ ही नहीं सकता था, इसलिए वे मेरे प्रति ज़िम्मेदार हैं तो मैं भी उनके प्रति ज़िम्मेदार हूं. ज़िम्मेदारी की यही भावना है जो कि मुझे महसूस कराती है कि मुझे उनकी आज्ञा का पालन करना चाहिए . कुछ भी हो, वे यह बात कहीं बेहतर जानते हैं कि मेरे लिए क्या अच्छा है . वे मुझे इंजीनियर बनाना चाहते हैं.”

क्या आप इंजीनियर बनना चाहते हैं? या आप इसलिए इंजीनियरिंग पढ़ रहे हैं क्योंकि आपके माता-पिता ऐसा चाहते हैं?

“मैं नहीं जानता कि मैं क्या करना चाहता हूं. यहां इस कमरे में बैठे हुए अधिकांश जने नहीं जानते कि हम क्या करना चाहते हैंहमें सरकारी वज़ीफ़ा मिलता है. हम जो चाहें वह विषय ले सकते हैं लेकिन हमारे माता-पिता और समाज का तो यही कहना है कि इंजीनियरिंग एक बढ़िया पेशा हैसमाज को इंजीनियरों की आवश्यकता है. लेकिन जब आप हमसे पूछते हैं कि तुम क्या करना चाहते हो तब हम खुद को अनिश्चित पाते हैं, हम उलझन और परेशानी में पड़ जाते हैं.”

आपने कहा है कि आपके माता-पिता आपके प्रति ज़िम्मेदार हैं और यह भी कि आपको उनकी आज्ञा का पालन करना चाहिए. ज़रा देखिए कि पश्चिम में हो क्या रहा है जहां कि माता-पिता की अब कोई ‘अथॉरिटी’ नहीं रह गई है. वहां की युवा पीढ़ी किसी ‘अथॉरिटी’ को नहीं चाहती, हालांकि उनमें भी अपनी ही तरह की एक अलग ‘अथॉरिटी’ रहती ही हैक्या ज़िम्मेदारी के लिए ‘अथॉरिटी’ की, आज्ञापालन की, माता-पिता की या समाज की इच्छाओं को पूरा करने की आवश्यकता पड़ती है? क्या ज़िम्मेदारी का मतलब औचित्यपूर्ण बर्ताव करने की क्षमता का होना नहीं है? आपके माता-पिता सोचते हैं कि आपमें वह क्षमता नहीं है, इसलिए वे आपके बर्ताव पर नज़र रखने की ज़रूरत समझते हैं, कि आप क्या करते हैं, क्या पढ़ते हैं और आप क्या बन सकते हैं. नैतिक व्यवहार का उनका पैमाना उनकी संस्कारबद्धता पर, उनकी शिक्षा-दीक्षा पर, उनके विश्वास, डर और विषय-सुखों पर टिका होता है. पिछली पीढ़ी ने एक सामाजिक ढांचा निर्मित कर लिया है और वे चाहते हैं कि आप उसी ढांचे के अनुरूप ढल जाएं. वे मानते हैं कि यही नैतिकता है और उन्हें लगता है कि वे आपकी अपेक्षा बहुत – बहुत अधिक जानते हैं. अगर आप उस ढांचे के अनुरूप ढल गए हैं, तो अपनी बारी आने पर आप भी चाहेंगे कि आपके बच्चे भी उसके अनुरूप ढल जाएं. इस तरह से अनुरूप ढल जाने की ‘अथॉरिटी’ ही धीरे-धीरे नैतिक उत्कृष्टता का पैमाना बनती जाती है. तो जब आप पूछते हैं कि आप अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन करें या न करें तब क्या आप यही बात पूछ रहे होते हैं ?

आप यह देख पा रहे हैं कि इस आज्ञापालन का मतलब होता क्या है ? जब आप बहुत छोटे होते हैं तब आपके माता -1 ता-पिता जो कहते हैं उसे आप मान लेते हैं. जो कुछ वे कहते रहते हैं उसे सुनते-सुनते आज्ञापालन का चलन स्थापित हो जाता है. इस तरह आज्ञापालन यांत्रिक, मशीनी हो जाता है. आप उस सैनिक की तरह हो जाते हैं जो किसी आदेश को बार-बार सुनता है और बार-बार उसे पूरा करता रहता है, वह हुक्म का पाबंद हो जाता है. कुछ इसी तरह हम सब जी रहे हैं . यही प्रचार होता आया है— धार्मिक स्तर पर भी और सांसारिक स्तर पर भी . इस तरह आप देख सकते हैं कि बचपन से ही यह आदत में शुमार हो जाता है कि जो आपने पढ़ा है, जो आपके माता-पिता कह रहे हैं, उसे सुनें और फिर वही सुनना आज्ञापालन का साधन बन जाता है. और अब आपके सामने यह समस्या आ खड़ी हुई है कि आप आज्ञापालन करें या न करें, दूसरे लोग जो कह रहे हैं आप वह मानें या अपनी लालसाओं-प्रवृत्तियों की बात मानें. आप वह सुनना चाहते हैं जो आपकी इच्छाएं कह रही होती हैं, लेकिन वह सुनना आपको अपनी इच्छाओं का आज्ञाकारी बना देता है. इससे विरोध-प्रतिरोध पैदा हो जाता है. इसलिए जब आप पूछते हैं कि आपको अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन करना चाहिए या नहीं, तब आपके अंदर एक भय भी रहता है कि यदि आप उनकी आज्ञा का पालन नहीं करते हैं तो हो सकता है आप गलती पर हों और यह भी कि हो सकता है कि फिर वे आपकी पढ़ाई-लिखाई के लिए पैसे न दें. आज्ञापालन में हमेशा एक भय बैठा रहता है और भय का होना मन को अंधेरे में ले जाता है.

इसलिए यह प्रश्न पूछने के बजाय आप यह देखें कि क्या आप अपने माता- पिता से विवेकसंगत ढंग से बातचीत कर सकते हैं और यह भी जानने की कोशिश करें कि सुनने का मतलब क्या होता है. क्या जो कुछ वे कह रहे हैं उसे आप बिना भय के सुन सकते हैं? और साथ ही, क्या आप अपनी प्रवृत्तियों और इच्छाओं की बात भी सुन सकते हैं—बिना इस डर के कि कुछ गलत न कर बैठें ? यदि आप मौनपूर्वक बिना भय के सुन सकते हैं तो आप स्वयं ही जान जायेंगे कि आपको आज्ञापालन करना चाहिए या नहीं, न केवल अपने माता-पिता का बल्कि ‘अथॉरिटी’ के किसी भी रूप का. देखिए, हम बड़े ही बेतुके तरीके से शिक्षित किए जाते हैं. हमें सीखने का कार्य कभी सिखाया ही नहीं गया. दुनिया भर की जानकारी हमारे सिरों में उंड़ेल दी जाती है और हम अपने दिमाग के उस छोटे से भाग को ही विकसित कर पाते हैं जो रोज़ी-रोटी कमाने में हमारी मदद करता है. दिमाग का शेष भाग उपेक्षित ही रह जाता है. यह ऐसा ही है जैसे किसी एक विशाल खेत के एक कोने में तो बाक़ायदा खेती की जाए मगर बाकी खेत को खरपतवार और झाड़-झंखाड़ के पनपने के लिए यूं ही छोड़ दिया जाए.

तो अब, इस समय, जो मैं कह रहा हूं उसे आप कैसे सुन रहे हैं? यह सुनना क्या आपको आज्ञाकारी बनाने वाला है, या प्रज्ञावान् और सजग बनाने वाला है—केवल किसी छोटे-से कोने के प्रति ही नहीं बल्कि पूरे विस्तीर्ण क्षेत्र के प्रति ? इस क्षेत्र की व्यापकता के और इसमें क्या-क्या है इससे, न तो आपके माता-पिता का ही सरोकार है और न ही आपके अध्यापकों का. लेकिन, उस कोने से उनका प्रबल रूप से और पागलपन की हद तक सरोकार है जो कि रोज़ी-रोटी कमाने में मदद करता है. यह कोना उन्हें सुरक्षा प्रदान करने वाला लगता है और इसी की उन्हें फिक्र है. भले ही आप इसके विरुद्ध विद्रोह कर दें – और लोग कर भी रहे हैं – लेकिन घूम-फिर कर बात वहीं आ जाती है क्योंकि जो विद्रोह कर रहे हैं वे भी बस अपने छोटे से कोने से ही सरोकार रखते हैं . और इस तरह यह दुश्चक्र चलता रहता है. तो, क्या आप आज्ञापालन का, अनुकरण का भाव रखे बिना सुन सकते हैं? यदि आप इस तरह सुन सकते हैं तो फिर आपमें पूरे क्षेत्र के प्रति संवेदनशीलता होगी, रुचि होगी, सरोकार होगा और यह रुचि, यह सरोकार आपको प्रज्ञा की ओर ले जाएगा. फिर वह प्रज्ञा ही होगी जो कि काम करेगी, न कि आज्ञा पालन करने की मशीनी आदत .

एक लड़की बोल उठी, “लेकिन हमारे माता-पिता तो हमें प्रेम करते हैं और इसलिए वे हमें कोई नुकसान पहुंचाना नहीं चाहते हैं. यह तो उनका प्रेम ही है जिसके तहत वे चाहते हैं कि हम उनकी आज्ञा का पालन करें; वे बताते हैं कि पढ़ाई में हमें क्या पढ़ना है, अपने जीवन को हमें क्या रूप देना है.” हर माता-पिता का कहना यही होता है कि वे अपने बच्चों से प्रेम करते हैं.

वह कोई सिरफिरा, ‘एब्नॉर्मल’ व्यक्ति ही होगा जो अपने बच्चों से नफ़रत करता हो और वह कोई सिरफिरा बच्चा ही होगा जो अपने माता-पिता से वाकई नफ़रत करता हो. सारे संसार के सारे माता-पिता कहते तो यही हैं कि वे अपने बच्चों से प्रेम करते हैं, लेकिन क्या वे वाकई प्रेम करते हैं? प्रेम के मायने हैं अच्छी देखभाल, परवाह, बेहद सरोकार- न केवल तब जब कि वे बिल्कुल छोटे हों बल्कि उनके बड़े होने पर भी यह देखना कि उन्हें सही तरह की शिक्षा मिले, कि वे युद्धों में मारे न जाएं, और अर्थहीन नैतिकता वाले इस सामाजिक ढांचे में बदलाव लाएं . माता- पिता को यदि अपने बच्चों से प्रेम है तो उन्हें देखना होगा कि उनके बच्चे भेड़चाल में तो शामिल होकर नहीं चल रहे हैं, उन्हें देखना होगा कि वे अनुकरण न करें बल्कि सचमुच सीख रहे हों. यदि वे सचमुच प्रेम करते हैं तो उन्हें व्यापक बदलाव लाने होंगे ताकि आप समझदारी से, सुख से और सुरक्षा से जी सकें. केवल आप लोग यहां इस कमरे में नहीं, बल्कि हर कोई हर जगह सारे संसार में. प्रेम लीक पर चलने की मांग नहीं करता . प्रेम तो स्वतंत्रता का उपहार देता है – यह नहीं कि जो भी आप करना चाह रहे हों, जो कि आम तौर से उथला, क्षुद्र और ओछा होता है. जिसमें आप आज्ञाकारिता के विष के बिना मुक्त मन से सुनने और समझने के लिए स्वतंत्र हैं. क्या आप सोचते हैं कि यदि माता-पिता वास्तव में प्रेम करने वाले होते तो क्या कभी युद्ध होते ? बचपन से ही आपको अपने पड़ोसी से द्वेष रखना सिखाया जाता रहा है, यह बताया जाता रहा है कि आप किसी और से अलग हैं. आपको पूर्वाग्रह की घुट्टी पिला-पिला कर पाला जाता है, नतीजतन जब आप बड़े होते हैं तो उग्र होते हैं, हिंसक, अहं-केंद्रित, और यही दुश्चक्र बार-बार दोहराया जाता रहता है. तो यह जानें और सीखें कि सुनने का मतलब क्या होता है, यह सीखें कि बिना स्वीकारे या बिना नकारे, बिना अनुकरण अथवा प्रतिरोध के स्वतंत्र रूप से सुनना क्या होता है. तब आप जान जायेंगे कि आपको क्या करना है. तब आप जान पायेंगे कि अच्छाई क्या होती है और वह कैसे खिलती है . और, वह कभी किसी एक कोने में प्रस्फुटित होने वाली नहीं है, वह तो जीवन के विस्तीर्ण क्षेत्र में फलती-फूलती है, उस समग्र क्षेत्र के कर्म में, ‘एक्शन’ में.

पुस्तक : सीखने की चाह
लेखक : जे. कृष्णमूर्ति
अनुवाद : ‘अचलेश चंद्र शर्मा’ और ‘निधि पंत’
प्रकाशक : राजपाल एंड संज़
मूल्य : 435 रुपए

Tags: Book, Hindi Literature, Hindi Writer, Literature, Parenting, Parenting tips, Teachers



Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Must Read

spot_img