प्रतिरोध का स्त्री स्वर: समसामयिक हिंदी कविता (प्रतिरोध का स्त्री-स्वर : समकालीन हिंदी कविता) पुस्तक: अन्य लेखों के लिए ‘विलास की वस्तु’ या ‘टूटे हुए दिल का क्रंदन और रुदन’ भर नहीं है। उनकी कविता लेखन के लिए उनकी संपूर्ण संभावना की एक गूंजभरी अभिव्यक्ति है। महिलाओं के लिए केवल एक लेखकीय विधा लिखने के लिए नहीं बल्कि स्त्री जाति की ओर से की गई अभिव्यक्ति के लिए जरूरी नहीं है कि महिलाओं की स्थिति और स्थिति को एकरूपता से बयां किया जाए लेकिन हर कविता महिलाओं के किसी न किसी दिल के अंदर की झलक दिखाती है (फुसफुसाहत) तो है ही. किसी एक प्रकार की अभिव्यक्ति किसी खास तबके, किसी खास वर्ग, किसी खास धर्म, काल पर लागू होती है तो कोई दूसरी अभिव्यक्ति किसी अन्य देश-काल-जाट-धर्म-हालात पर। (सुनें हिंदी और उर्दू के यादगार शायर निदा फ़ाज़ली की चार नज़्म)
जब एक लेखन महिला होती है तब वह कितनी ही दुखियों की भावनाओं को, मुसीबतों को, मुसीबतों को, सच्चाइयों को अभिव्यक्त करती है। ये वे अभिव्यक्त स्वर हैं जिनमें पितृसत्तात्मक समाज का पुरुष न तो देख पाता है, न समझ पाता है, न कह पाता है और कई मामलों में तो देख-सम)झकर भी लेखबिद्ध नहीं करना चाहता है। पितृसत्ता के पूर्वजों के भीतर के साधु ने कहा, स्वयं इस लिंग के लिए हितकर नहीं है, और ऐसी पितृसत्ता के सीधे हितकर तो नहीं है! वैसे इस एंगल पर बहस लंबी हो सकती है लेकिन हम आज बात करेंगे हाल ही में प्रकाशित हुई किताब ‘प्रतिरोध का स्त्री-स्वर: समकालीन हिंदी कविता’ की जो काव्यत्री और प्रखर स्त्रीवादी समीक्षकों में से एक है सविता सिंह (सविता सिंह) की संप्रभुता। राधाकृष्णन प्रकाशन (राधाकृष्ण प्रकाशन) में छपी इस पुस्तक में विंद टेटे, शुभा, शोभा सिंह, लालकृष्ण गर्ग, अजंता देव, अनिता भारती, निर्मल पुतुल, ब्लश रघुवंशी, सुशीला टाकभौरे, कविता कृष्णपल्लवी सहित 20 कविताएँ शामिल हैं।
जातिगत संघर्ष, जेंडर के दृश्य, दैहिक शोषण से लेकर मानसिक और समानता वाले आधे लोगों को बयां करती है इन-डिमांडों को पढ़ाई अपने आप में ऐसी गली से पता चलता है जहां से आप स्त्री जीवन और स्थिति के बारे में लगभग हर तरह के सिद्धांतों को समझ सकते हैं। बच ही नहीं सकते इन दस्तावेजों के अग्नि से जो इन मॉडलों के माध्यम से किताबों के कागजों से मिलते-जुलते पाठकों के जहां में उतरती है। (पॉडकास्ट प्रार्थना- स्त्री मन को छूतिं, व्याख्या करतीं गगन गिल की कविताएँ)
सविता सिंह ने शुभा की पहली काव्यत्री रचनाएँ बनाईं और पहली कविता में नारी की उत्पत्ति से लेकर संघर्ष की शुरुआत की, जो एक बहुत बड़ी सच्ची पेशी है। यह कविता यह नहीं बताती कि जिस महिला के जन्म से लेकर मृत्यु तक जिस बड़े से लेकर मोबाइल तक को ले जाना है, वह हमेशा उसका बड़ा होता है? कविता का शीर्षक है सहजात.
दुःख मेरे पहले था
माँ के गर्भ में
हम साथ-साथ पैदा हुए
वह मुझसे बड़ा था।
विभिन्न मंचों पर जनाब समाज के मसलों को रखलें, कवि, लेखिका, एक्टिविस्ट, प्रकाशक विनोद टेटे की कुछ कविताओ ने भी प्रतिरोध की स्वर पुस्तक में लिखा है। पेश है उनकी कविता ‘जब मैं हाथ में ले लूँगा’ (पॉडकास्ट प्रार्थना- राहत इंदौरी की राहतें ग़ज़ल, नज़्म और शायरी)
जब मैं हाथ में ले लूँगा
ताँगी,
हँसिया,
दब, डाँटी
ये सभी हमारी प्राकृतिक वास्तुएं हैं जिनके हाथों में पकड़ते ही मैं हूं दुनिया की सबसे खूबसूरत महिला हो जाती है
तब हॉस्टल दूर दूर पर लड़खड़ाती हुई तांगों वाली शादी साड़ी विश्वसुंदरी पुतलियां ऊंची एड़ी पर गिर जाती हैं।
टीवी डिस्कनेक्ट हो जाता है मोबाइल के टावर थप्प हो जाते हैं
जब मैं हाथ में ले लूँगा तांगी, हँसिया, दबा, दाँती या इन जैसे कुछ भी…।
युवा महिलाओं के अधिकारों, हितों और उग्रवादियों के लिए सक्रिय पुतुल की पत्रिका को भी सविता सिंह ने पुस्तक में लिया है। संथाली और हिंदी की सुप्रसिद्ध कवयित्री हैं, जो निरमा पुतुल को वर्ष 2001 में साहित्य अकादमी से साहित्य सम्मान मिल चुका है। पेश है उनकी कविता ‘जो राजकुमार से छूट जाता है’
वह जो मठाधीश से छूट जाता है
एक महिला पहाड़ पर रो रही है
और दूसरी स्त्री
महल की तिमंजिली इमारत की खिड़की से बाहर
झाँक कर मुस्कुराती रही है
ओ, कविगोष्ठी में बेकार पर कविता पढ़ रहे कवियो !
देखो कुछ हो रहा है
इन दो साथियों के बीच छूटी हुई जगह
इस जगह कुछ हो रहा है दर्ज़ करो कि उसे प्रवेश ग्रहण से छूट मिल जाती है
एक महिला गा रही है
दूसरी रो रही है। और इन दोनों के बीच में तीसरी औरत इन दोनों को बार-बार कुछ सोच रही है ओ, स्त्री-विमर्श में शामिल लेखिका
आप क्या बता सकते हैं
यह तीसरी महिला सोच क्या रही है?
एक महिला पृष्णि पर बच्चा बचे धान रोप रही है
दूसरी सरकार गिराने और बनाने में लगी है
ओ, जनाब अस्मिता पर करने वाली झंडाबरदार ओरतो बात, इन अनुयायियों के बीच गम हो गया उन और टोंस का पता चला कि अलग-अलग नाम की जगहें शामिल नहीं हैं!
सविता सिंह ने चौथी काव्यत्री ली हैं कात्यायनी और इस अध्याय में पुस्तक लिखी है पहली कविता है ‘सात चिकित्सकों के बीच’। कुछ समय की पत्रकारिता करालं कात्यायनी ने बाद में स्वतंत्र रूप से लेखन को फुल टाइम अपना लिया। उनकी यह कविता उनके संग्रह से प्रकाशित हुई है
चंपा
सात प्रशिक्षकों के बीच
चंपा सयानी हुई
बांस की तनी-सी लचक वाली
बाप की छाती पर सांप-सी लोटी सपने में काली छाया-सी डोलती
सात प्रशिक्षकों के बीच
चंपा सयानी हुई ओखल में धान के साथ
कोड दिया गया
भूसी के साथ भंडारे पर
फेंक दिया गया।
वहां अमरबेल उगी झरबेरी के साथ कांटिली झाड़ों के बीच उगती है
चंपा अमरबेल बन सयानीहुई
फिर से घर में आ खतरनाक
सात प्रशिक्षकों के बीच सयानी चांपा एक दिन घर की छत से
लटकती पाई गई
तालाब में जलकुम्भी के जालों के बीच
दबाएँ दिया गया
वहाँ एक नीलकमल उग आया
जलकुम्भी के जालों से ऊपर का चमत्कार
चंपा फिर घर आ गई
देवता का चित्रण किया गया
मुरझाने पर मसल कर फेंक दिया गया,
पूरे गांव में रात को बारिश हुई झमड़कर, अगले ही दिन हर दरवाजे के बाहर नागफनी के बीहड़ किनारों के बीच जलाई गई राख की राखियां
निर्भय – निस्सांग चम्पाति पिया गया।
.
टैग: पुस्तक समीक्षा, पुस्तकें, हिंदी साहित्य, साहित्य
पहले प्रकाशित : 11 अक्टूबर, 2023, 12:13 IST
