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राजस्थान: झुंझुन में है विश्व की एकमात्र मूक कंपनी, 200 साल पहले हुई थी शुरुआत, जानिए यहां के निवासी


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विश्व की एकमात्र मूक कंपनी
सभी पात्र कंटेनर प्रदर्शन करते हैं
200 साल पहले झुंझुनू के बिसाऊ में हुई थी शुरुआत

झुंझुनू। झुंझुनू जिले के बिसाऊ में हर साल आयोजित होने वाली मूक कंपनी विश्व की एकमात्र ऐसी कंपनी है जिसमें सभी पात्र बोलकर नहीं बल्कि राक्षसी भूमिका निभाते हैं। यहां पर फर्म का मंचन स्टेज की जगह खुले मैदान में बीच सड़क पर रेतीले निरालाकर लीला का दंगल तैयार किया जाता है। इसी दंगल में सभी किरदार मूक कलाकार हैं। साथ ही राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और सीता के पात्रों को भी सभी पात्रों पर प्रभावी ढंग से प्रदर्शित किया जाता है। यह लगभग 15 दिन तक चलती है। इसके अलावा फोरम के दौरान द में ढोल-नगाड़े का भी माहौल होता है, जिसमें रामाडल और मॉन्स्टरडाल के बीच युद्ध होता है।

फर्म का मंचन लगभग 200 साल पहले जमना नाम की एक नागाटरी ने रामान जोहड़ से शुरू किया था। ओटीटी जमना ने गांव के कुछ बच्चों को एकजुट कर टीम का मंचन शुरू किया और हाथों से ही पात्रों के कहे अनुसार मुखौटे भी तैयार कर लिए। सिद्धांत के बाद जब बच्चों से बातचीत में परेशानी होने लगी तो उनका मुखड़ा ही उनके किरदार की भूमिका को बताया गया। तब से ही बाज़ार के बर्तनों में बातचीत नहीं की जानी चाहिए।

1949 से बाजार की मुख्य सड़क पर मंचन हो रहा था
रामाण जोहड़ में लीला की शुरुआत के बाद इसका मंचन कुछ बार तक गुगोजी के टाइल पर किया जाना लगा था। इसके बाद काफी समय तक स्टेशन रोड पर इसका मंचन किया गया लेकिन वर्ष 1949 में गढ़ के नजदीकी बाजार में मुख्य सड़क पर लीला का मंचन किया जाने लगा। इस लीला की ख़ास बात यह है कि यह उत्सव पूर्णिमा से प्रारंभ होकर चलती है। वहीं इस लीला में रावण दशहरे वाले दिन नहीं बल्कि चतुर्दशी के दिन जलते हैं। इसके दूसरे दिन भरत मिलाप और राम के राज्याभिषेक के साथ मनाया जाता है। इसके अलावा फोरम में पंचवटी व लंका के मजबूत मैदान के उत्तरी भाग में लकड़ी की बनी हुई अयोध्या व दक्षिण भाग में वुड कलर की लंका और मध्य भाग में पंचवटी की राखियां बनी हुई हैं।

सभी पोशाकों के लिए बनाई गई पोशाकें पोशाकें हैं
फ़ोरम में प्रदर्शन करने वाली कलाकार देवकी नंदा ने बताया कि लीला की शुरुआत पहले चारों ओर के महलों से रथ पर सवार होकर किनारे की जगहों पर होती है। इसके अलावा बिसाऊ की स्टायलीज की पोशाक के अलावा अन्य फर्मों की तरह और शाही चमक दमक वाली पोशाक न साधारण साधारण पोशाक होती है। इसके अलावा राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न की विशाल धोती, वनवास में पीला अंगरखा, सिर पर लंबे बाल प्रकट होते हैं। मुख पर सलामे-सितारे चिपकाकर बेल-बूटे बनाए जाते हैं।

देखने में काफी संख्या में सैलानी आते हैं
हनुमान्, बाली-सुग्रीव, नल-नील, जटायु और जामवन्त आदि की पोशाक का भी अलग ही रंग होता है। वहीं अन्यत्र के पिछले चार दिनों में कुंभकर्ण, मेघनाद, नरांतक एवं रावण के पुतलों का दहन किया जाता है। इस अनोखी मूक कलाकृति को देखने के लिए प्रवासी भारतीयों के साथ-साथ काफी संख्या में सैलानी भी आबाद हैं।

टैग: ऐतिहासिक रामलीला, Jhunjhunu News, राजस्थान समाचार, धर्म



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