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बच्चा जो बना है उसे हम बड़े लोग धैर्य या धैर्य किसी भी तरह से नहीं बोलते- सुदीप्ति


बच्चों को सुनने के लिए धैर्य की आवश्यकता होती है, हमारे पास बहुत कमी है। बच्चा जब किसी के साथ बातचीत करता है तो वह अपनी राय बनाने लगता है। बच्चों की भाषा जगत बहुत तारक और सृजनात्मक होता है। हमें भाषा के साथ जुड़ने के लिए, बच्चों का अध्ययन करने के लिए नए प्रयोग करने चाहिए। यह बातें राजकमल प्रकाशन समूह की मासिक विचार-बैठकी ‘सभा’ की तीसरी कड़ी में ‘भाषा में बच्चों की जगह’ विषय पर चर्चा के दौरान समानता ने कही। इंडिया हैबिट सेंटर के गुलमोहर हॉल में आयोजित इस चर्चा में शिक्षाविद् मुकुल प्रियदर्शिनी, संपादक मनीषा चौधरी, रूम टू रीड के निर्देशक शक्तिब्रत सेन और स्कोर के संपादकीय सलाहकार जोजफ मथाई से लेखक-अध्यापक सुदीप्ति ने बातचीत की।

चर्चा के विषय पर राजकमल प्रकाशन समूह के निदेशक सत्यानंद निरुपम ने कहा कि आम तौर पर जो चर्चाएं होती हैं वे अक्सर राजनीति से शुरू होती हैं और राजनीति पर ही खत्म हो जाती हैं। ‘सभा’ की तीसरी कड़ी में हमने इस प्रस्तुति से हटकर लुके हुए परिचय का विषय ‘भाषा में बच्चों की जगह’ पर केन्द्रित रखा है।

कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए सुदीप्ति ने कहा कि भाषा ने ही इंसान को बाकी सभी प्राणियों से अलग बनाया है। विषय प्रवेश करते हुए उन्होंने कहा कि बच्चों के लिए श्रवण के लिए धैर्य की आवश्यकता है। इनमें से हमारे पास बहुत कमी है। इसमें मुझे स्पष्ट रूप से बताया गया है कि जो बच्चा उसे वयस्क बना रहा है, वह किसी भी तरह से वयस्क या वयस्क नहीं है। शिक्षक भी केवल अंक देने के लिए पढ़ते हैं। अंक देते समय वह भाषा की कार्यशालाओं के कलाकारों में खो जाते हैं। बच्चे ने मूल बात क्या लिखी है, उस तक पहुंचें नहीं।

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मनीषा चौधरी ने कहा कि भाषा बच्चों की प्रतिभा से जुड़ी हुई है। बच्चे से भाषा को समझने और खुद को अभिव्यक्त करने का प्रयास करते हैं। सीखने की भाषा के लिए एक उपयुक्त मोन्टेंट होना जरूरी है। उन्होंने कहा कि बच्चों के लिए भाषा कौशल का अभ्यास जरूरी है और अहम योगदान बाल साहित्य का है। मगर यह प्रमाणित है कि हमारे देश में या तो बाल साहित्य उपलब्ध नहीं है और यदि उपलब्ध है तो अंग्रेजी और अन्य सागरों में है। महंगा होने के कारण वह तबके की पहुंच से भी दूर है।

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जोजफ मथाई ने बच्चों के लिए उपलब्ध साहित्य और बच्चों द्वारा लिखित साहित्य पर बात करते हुए कहा कि बच्चे पाठक के लेखक भी बन सकते हैं। हम बच्चों को भाषा से सीखना नहीं सिखाया जाता। हमें भाषा के साथ जुड़ने के लिए, बच्चों का अध्ययन करने के लिए नए प्रयोग करने चाहिए।

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शक्तिब्रत सेन ने कहा कि सत्यजीत राय और उनके परिवार ने बाल-साहित्य का समृद्ध संग्रह तैयार किया है, जिस पर अभी काम करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि बच्चों के साहित्य में किस भाषा का प्रयोग हो रहा है वह भाषा कौन सी है? इस बात पर बहस करना बहुत ज़रूरी है. जब तक आपके बच्चों की भाषा के निर्माण को कोई मतलब नहीं है तब तक आप बच्चों की भाषा को भी नहीं समझ सकते हैं।

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मुकुल प्रियदर्शिनी ने बच्चों की भाषा जगत को बहुत रोचक और रचनात्मक बताया है। बच्चे में भाषा जो गलत होती है उनके पीछे भी कोई ना कोई व्याकरणिक आधार होता है। वे किसी को देखकर नहीं बल्कि भाषा के आधार पर भाषा सिखाते हैं।

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बच्चों के लिए स्कूल शिक्षा में सुधारों की चर्चा पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि हमारे स्कूलों में बच्चों के लिए उनका अनुकूल माहौल नहीं है। स्कूल में जाने के बाद बार-बार बच्चे में प्रश्न और दर्शन की इच्छा कम होती है। वह एक निर्मित डिजिटल में पढ़ने को मजबूर हो गए हैं, जिससे उन्हें पढ़ाई को लेकर अरुचि का जन्म हुआ है। व्याकरण का बोझ बच्चों को भाषा की कक्षा से दूर ले जाता है। जब हम बच्चों से सवाल करने से अलग होते हैं तो वास्तव में हम उन्हें नोटिस करते हैं और अपने आप को अभिव्यक्त करने से रोक रहे होते हैं। बच्चों को जो पाठ्य सामग्री पसंद आती है वह अक्सर हमारे पाठ्यक्रम में नहीं होती है। हमें बच्चों को भाषा के विविध मौलिक से लेकर संगीत और कला के लिए भी उनकी भाषा से जुड़ने की जरूरत है। लेकिन केवल स्कूल से उम्मीद नहीं की जा सकती, बदलाव की शुरुआत हमें अपने परिवार के स्तर पर करनी होगी।

टैग: हिंदी साहित्य, साहित्य



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