ओपीपी/सोपानकोरबा. सनातन में दीपावली पर्व के दिन मां महालक्ष्मि की पूजा की जाती है। लेकिन आपको क्या पता दीपावली की मध्य रात्रि को मां काली की पूजा का विशेष विधान है। लेकिन पश्चिम बंगाल, असम और असम में इस अवसर पर माँ काली की पूजा होती है। यह पूजा अर्धरात्रि में की जाती है। वहीं, कोरबा में भी कुछ जगहों पर मां काली की मूर्ति की स्थापना की गई है, जिसकी रात को विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। विशेष आलेख में शामिल हैं पंडित संतोष कुमार मित्रा से बातचीत की।
पंडित संतोष कुमार जी ने बताया कि कार्तिक मास के निशीथ काल में मां काली की पूजा का विशेष महत्व है। इस समय माँ काली की सारि विशेष फलदाई होती है। उन्होंने बताया कि चंड मुंड नामक असुरों का वध करने के लिए आदिशक्ति मां जगदंबा की एक शक्ति प्रकट हुई थी जिसके रूप में अत्यंत विकराल रूप में उनकी मां को ही काली कहा गया था। माँ काली आसुरी शक्तियों का नाश करने वाली हैं और उनके भक्तों के सभी मनोभाव पूर्ण करने वाली हैं।
आखिर क्यों होती है मां काली की पूजा
अद्र्धरात्रि को माँ काली की पूजा इसलिए की जाती है कि इस काली रात से अब माँ काली हमें उजाले की ओर ले मूसल और सदमार्गी। भक्तों को माँ काली के रौद्र रूप को देखकर डरना नहीं चाहिए। माँ अपने बच्चों के लिए बहुत शांत है और इस दिन व्यक्ति को माँ काली की पूजा कर क्षमा माँगते हुए अपने सभी दुराचरणों का त्याग करना चाहिए।
2 तरीके से होती है मां की पूजा
कोरबा में दो तरह से होती है मां काली की पूजा, एक सामान्य और दूसरी तंत्र पूजा। सामान्य पूजा भी कर सकते हैं. माता काली की सामान्य पूजा में विशेष रूप से 108 गुड़हल के फूल, 108 बेलपत्र एवं मंगल, 108 मिट्टी के दीपक और 108 दूर्वा चढ़ाने की परंपरा है। साथ ही चरित्र फल, मा, अंतिम, खेड, तली हुई माता की सब्जी और अन्य शालाओं का भी भोग लगाया जाता है। पूजा की इस विधि में सुबह से लेकर रात्रि तक व्रत का पालन करें, होम-हवन एवं पुष्पांजलि आदि का समावेश होता है।
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पहले प्रकाशित : 9 नवंबर, 2023, 14:02 IST
