रामकुमार नायक/रायपुरः सनातन धर्म में भाई दूज पर्व का विशेष महत्व है। हर साल दो दिन बाद यह पर्व मनाया जाता है। यह पर्व रक्षाबंधन की तरह बेहद ही ख़राब होता है। इस दिन बहनें भाई की लंबी उम्र के लिए पूजा करती हैं। साथ ही, उनकी सलामती की कामना करते हुए भाई दूज के सभी त्यौहार मनाए जाते हैं। यह पर्व भाई-बहन के प्यार और रक्षा का प्रतीक है। इस दिन बहनें अपने भाई का रोली और अक्षत से कमेंट करती हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन यदि विधि-विधान से पूजा की जाए तो भाई-बहनों पर अकाल मृत्यु का संकट मंडराता रहता है।
भाईदूज के दौरान भाई का तिलक करते समय शुभ त्यौहार का विशेष ध्यान रखना चाहिए। शुभ उत्सव 14 नवंबर 2023 को दोपहर 02 तूफान 36 मिनट से प्रारंभ होकर 15 नवंबर 2023 को दोपहर 01 तूफान 47 मिनट पर समाप्त होगा। ज्योतिषाचार्य पंडित मनोज शुक्ला ने बताया कि भाईदूज को भाद्र द्वितीया या यम द्वितीया के नाम से जाना जाता है। इस पर्व का सबसे बड़ा महत्व यह है कि इस दिन को भाई-बहन के पवित्र उत्सव के रूप में मनाया जाता है। प्राचीन दंतकथाओं के अनुसार भगवान यमराज की बहन अपने भाई से दीर्घकाल तक दूर रहती है और इस दिन के बाद निवास करती है।
भाई यमराज बहन यमुना को ढूंढते हुए उनके घर की मूर्तियां बनाते हैं, तब बहन यमुना भाई यमराज को सुंदर आसन में बैठकर उनके तिलक करती हैं और आरती करती हैं और अपने हाथों से बनाए हुए उन्हें भोजन खिलाती हैं, जिससे यमराज प्रसन्न हो जाते हैं। यमुना अपने भाई यमराज से शोभा मांगती हैं कि भैया, आज के दिन किसी बहन ने अपने भाई को तिलक करके अपने हाथ से बनाया खाना बनाया है, तो आप उसे साहस नहीं देंगे। इस पर यमराज अपनी बहन को यह आभूषण देते हैं। इसलिए इस दिन को राक्षसों द्वारा मनाया जाता है, और बहनें अपने भाई को तिलक लगाकर आरती उतारती हैं और यथाशक्ति भोजन कराती हैं।
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पहले प्रकाशित : 14 नवंबर, 2023, 13:05 IST
