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आजादी से पहले बनी जा रही खाजा मिठाई, इसके बिना नहीं बनाया जा सकता छठ का जोड़ा


मोहन प्रकाश/सुपौल। छठ का त्योहार हो और खाजा की ना हो, ये कोई दिवाली वाली बात नहीं है. खाजा की बात हो तो सुपौल जिले के पिपरा बाजार का नाम सहज ही लोगों की जयंती पर आता है। ऐसा क्या है पिपरा बाजार के खाजा में, क्यों यहां का खाजा कोसी-सीमाचंल के अलावा नेपाल सहित अन्य देशों तक मशहूर है। आख़िर क्या है पाइपरा बाज़ार के खाजा की खासियतें कि लोग इसके दीवाने हैं। ऐसे ही कई महत्वपूर्ण विद्वानों के लिए आइए खुद पाइपरा मार्केट के खाजा कलाकारों से जानते हैं, क्या है पूरा मामला।
छठ पूजा में खाजा का बहुत महत्व है. सुपौल शहर से पिपरा बाजार की दूरी करीब 22 किलोमीटर है। इस बाज़ार में 50 से ज़्यादा खाजा की दुकानें हैं। स्थानीय पुरातत्वविद् यहाँ स्थित हैं जहाँ आजादी से पहले ही खाजा बनाने की शुरुआत हुई थी। स्व. गौनी साहा ने यहीं से की थी खाजा बिजनेस की शुरुआत. इसलिए स्व. गौनी साहा को पाइपरा के खाजा का नाम दिया जाता है. सम्मिलित चंदन कुमार बताते हैं कि यहां का खाजा लंबा, दलित और कई परतों में बनाया जाता है। विशेष रूप से शुद्ध घी से इसे बनाया जाता है, जो खाने में बहुत लजीज होता है। सामान्य दिनों में अकेले पिपरा बाजार के शेष रेस्तरां को मिला कर प्रतिदिन करीब 12 जापानी खाजा की दुकानें होती हैं। जबकि छठ पूजा के दौरान कई गुना वृद्धि होती है।

सीएम नीतीश चख का कहना है स्वाद
उन्होंने बताया कि शुद्ध घी में 320 रुपये प्रति किलोग्राम की खपत होती है। इसका सबसे अधिक डिज़ाइन बना हुआ है। वहीं, चंदन कर्मचारी अकेले ही अपनी दुकान में रोजाना 10 अनार्य काम करते हैं। खाजा का स्वाद ले रहे स्थानीय ऐतिहासिक विश्वासियों ने बताया कि यहां का खाजा देश से लेकर डाकुओं तक भेजा जाता है। लोग अपने स्वजनों को विशेष रूप से सूखा खाजा पैक करवाकर पसंद करते हैं। जो लोग चीनी चाशनी में डुबाकर विदेश में होने के बाद भी पाइपरा बाजार में होने का जिक्र करते हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी पाइपरा बाजार के खाजा का स्वाद चख चुके हैं।

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पहले प्रकाशित : 15 नवंबर, 2023, 16:12 IST



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