रामकुमार नायक/रायपुरः सनातन धर्म में तुलसी विवाह का विशेष महत्व है। इस तुलसी बार विवाह 23 मार्च गुरुवार को होगा। इस दिन को प्रबोधिनी एकादशी या देवउठनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। ज्योतिषाचार्य पंडित मनोज शुक्ला ने बताया कि आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष के बाद क्षीरसागर में भगवान विष्णु चार मास के शयन से प्रकट होते हैं।
भगवान विष्णु के देवोउत्थान देवउठनी का पूजन करके मां तुलसी के साथ भगवान विष्णु का विधि विधान के साथ विवाह किया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु का विवाह वैभव का मंडप होता है। इसके भी अलग-अलग सिद्धांत हैं. इससे जुड़ी कहानियां यह भी हैं कि भगवान विष्णु और तुलसी माता का विवाह किस कारण से हुआ। टैब से लेकर आज तक हर व्यक्ति अपने घर में तुलसी का चंवर बनाकर रखता है जिसमें तुलसी माता जी को सुंदर सजाकर बंगले की शोभा बढ़ाते हुए भगवान शालिग्राम और तुलसी माता का विवाह होता है।
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ज्योतिषाचार्य ने बताया कि हमारे छत्तीसगढ़ की विशेष परंपरा बनी हुई है, कि बड़े बुजुर्ग हर तीज उत्सव को उत्सव और उमंग के साथ मनाते हैं। इसके अलावा अपनी संस्कृति और प्रकृति के साथ-साथ अपनी पूजा भी करते रहते हैं। तुलसी विवाह के दिन भी भगवान में शामिल है वह पूरी तरह से प्रकृति से जुड़ी हुई है। जिसमें बरातियों का पैगाम बांधते हैं। भगवान के विवाह में चना भाजी की सब्जी, शकरकंद, छोटा बेर झरबेरी, सिंघाड़ा, मूली, बड़ा भाटा, फूल वाला भाटा यह भगवान के विवाह में भगवान के साथ प्रकृति की पूजा करने की परंपरा चली आ रही है। इसका कारण यह है कि वैभव के अभयारण्य में भगवान विष्णु और माता तुलसी का विवाह संपन्न होता है।
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पहले प्रकाशित : 22 नवंबर, 2023, 17:27 IST
