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मिर्गी के दौरों को ठीक कर सकते हैं योग, जानना होगा असाचर्य, एम मानक सिद्धांतों में दावा


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मिर्गी के दौरों की बीमारी से भारत में एक करोड़ से ज्यादा लोग बीमार पड़ रहे हैं।
भारत में मिर्गी के रोगी को सामाजिक रूप से बहिष्कार का सामना करना पड़ता है।

मिर्गी का डोरा इलाज हिंदी में: मिरगी की बीमारी आम तौर पर जनमाजात होती है या फिर किसी बड़ी दुर्घटना के बाद इस बीमारी की शुरुआत होती है। यह ऐसी बीमारी है जिसमें मरीज़ को अचानक नज़र आती है। यह एक क्रॉनिकल न्यूमेरिकल डिसऑर्डर है जिसमें मस्तिष्‍क सामान्‍य तरीके से काम नहीं किया जाता है। ये दौरे कुछ देर के लिए बंद हो जाते हैं लेकिन इनमें दिमाग का शरीर पर से नियंत्रण हट जाता है और मरीज की हालत अजीब हो जाती है या वह बेहोश हो जाता है। इसमें पढ़ाई, नौकरी और समाज में भी अलग-अलग नजरियां देखी जाती हैं। भारत में करीब एक करोड़ लोग मिरगी से स्केच कर रहे हैं।

हाल ही में दोस्ती के ऑल इंडिया हेल्थकेयर ऑफ मेडिकल साइंसेज़ ने दुनिया की पहली मार्टडी की है जिसमें मिर्गी के रहस्यों की इन कब्रगाहों और उनके समाधान पर शोध किया गया है। अमेरिका के जर्नल न्यू यॉर्करोलॉजी में प्रकाशित यह रिसर्च इसलिए भी खास है कि इसमें मिर्गी के दौरों पर योग के बेहतरीन असर की बात कही गई है। शोध में बताया गया है कि योग की तीन मंजिलें सुख-माँ अस्तायाम, प्राणायाम और मूल मंत्र की वजह से मिरगी के मरीज़ समान जीवन में सफल हो सकते हैं।

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एम नामकरण के न्यू यॉर्करोलॉजी विभाग की रायडी प्रोफेसर मंजरी ट्रिप और पढ़ें डॉ. किरणदीप कौर की ओर से 160 मिलिटरी पर रिसर्च की गई है। इस बारे में डॉ. मंजरी का कहना है कि मिरगी के सपनों को जीवनभर दवा खानी पसंद नहीं है, हालांकि दवा में भी कुछ ऐसे कलाकार शामिल हैं जो इन सपनों को पूरा करते हैं। ख़ास बात यह है कि इन साझीदारों पर अभी तक कोई शोध नहीं हुआ है। एम इंडल ने पहली बार किया ऐसा.

डॉ. मंजरी का कहना है कि मिरगी के स्तिथियों के प्रमुख साझीदार एसटीआई कम्युनिस्टा की हैं। देखा कि मिर्गी का एक व्यक्ति अपने कर्मचारियों से अलग-अलग भावनाएँ रखता है या समाज उसे अलग-अलग बताता है। यही स्टीकमा है. यह बीमारी, अनैच्छिक, दिल की बीमारी आदि किसी भी बीमारी के साथ ऐसा नहीं होता है। दुनिया में अभी तक ऐसी कोई जांच नहीं हुई थी जिससे यह पता लगाया जा सके कि एसटीआई ऑक्सीडेंटमा कम कैसे हो सकता है, उसका कोई उपाय है और वह भी कम हो सकता है?

160 लॉटरी पर की गई रिसर्च

डॉ. किरणदीप बताते हैं कि एम दिवालिया की पढ़ाई में 160 मरीज शामिल थे, जो दवा ले रहे थे। इनमें से 80 को योग की क्रियाएं कराई गईं, जिनमें योग, सूक्ष्म अष्टयाम और प्राणायाम शामिल हैं। जबकि दूसरे कंट्रोल ग्रुप के 80 प्रतिभागियों को सिर्फ ड्रग्स और शाम योग यानी दिखावटी योग रखा गया। इसके बाद 3 महीने तक इन सभी पर नजर रखी गई और इसका असर देखा गया।

3 महीने बाद बेहतरीन परिणाम

जिस ग्रुप को योग का इंटरवेंशन दिया गया उन सभी लोगों को 12 सप्ताह से 45 मिनट तक लेकर 1 घंटे तक सूक्ष्म योग अस्तायाम, प्राणायाम और चिकित्सा विज्ञान के सात सत्र दिए गए। इसके अलावा सभी को सप्ताह में कम से कम 5 बार 30 मिनट के लिए घर पर भी इन दिनों योगाभ्यास का अभ्यास करने के लिए कहा गया है। डॉ. किरणदीप का कहना है कि इसमें कोई भी योगासन नहीं है। 3 महीने बाद जो परिणाम देखा, वह काफी सुखद था।

एसटीआई सिक्किममा के साथ तू भी हुआ कम

किरणदीप का कहना है कि 3 महीने तक जांच के बाद पता चला कि योग न करने वालों या सिर्फ नाम के लिए योग करने वालों की तुलना में नियमित रूप से दैनिक योग के सत्रों का अभ्यास करने वाले की बीमारी में सुधार हुआ। देखा गया कि योग करने वाले के साथ सिर्फ एसटी टोकमा और एन कॉनसिटाइटी या खुद को सामान योग्य लोगों से अलग महसूस करने की आदत में ही नहीं बल्कि मिरगी के दौरों की फ्रीक्वेंसी में भी 7 गुना तक सुधार देखा गया। साथ ही मेंटल हेल्थ भी बेहतर हुआ।

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टैग: एम्स, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान दिल्ली, स्वास्थ्य, जीवन शैली, ट्रेंडिंग न्यूज़



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