रामकुमार नायक/रायपुरः हिंदू धर्म में पूर्णिमा व्रत का विशेष महत्व है, और हर एकादशी व्रत के पीछे एक रोचक कहानी है। इनमें से एक विशेष एकादशी है, जिसे कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को बैकुंठ चतुर्दशी के रूप में मनाया जाता है। सिद्धांत यह है कि इस दिन भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा करने वाले व्यक्ति को स्वर्ग की प्राप्ति होती है। इस दिन व्रती को भगवान विष्णु के धाम, बैकुंठ में स्थान मिलता है। इस व्रत का आयोजन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को किया जाता है और इस वर्ष बकुंठ चतुर्दशी 25 नवंबर, शनिवार को है।
ज्योतिषाचार्य पंडित मनोज शुक्ला ने बताया कि भगवान भोलेनाथ को बेलपत्र और भगवान विष्णु को तुलसी पत्र चढ़ाया जाता है। हालाँकि, भगवान शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है। लेकिन, पूजन विधि अलग-अलग होती है। आने वाले कार्तिक चतुर्दशी के दिन को बैकुंठ चतुर्दशी के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु प्रबोधनार्थ एकादशी के दिन चौमासा से जागृत रहते हैं।
भगवान विष्णु के दर्शन सबसे पहले काशी आख्यान और भगवान भोलेनाथ के दर्शन करते हैं। इस वर्ष केवल बैकुंठ चतुर्दशी व्रत एक ऐसा दिन है जिस दिन भगवान भोलेनाथ विष्णु जी के आगमन से लेकर बेलपत्र मित्र का स्वागत किया जाता है। वहीं, विष्णु जी भगवान शंकर को वास्तुशिल्प स्वरूप तुलसी पत्र अर्पण करते हैं। इसलिए इस दिन भगवान भोलेनाथ में तुलसी पत्र चढ़ाया जाता है और भगवान विष्णु में बेलपत्र चढ़ाया जाता है।
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पहले प्रकाशित : 24 नवंबर, 2023, 18:54 IST
