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लंदन में भारत से फिर पूछा गया धर्मनिरपेक्षता का सवाल, विदेश मंत्री जयशंकर ने दिया ये बेहतरीन जवाब


एस जयशंकर, भारत के विदेश मंत्री।  - इंडिया टीवी हिंदी

छवि स्रोत: पीटीआई
एस जयशंकर, भारत के विदेश मंत्री।

दुनिया में भारत की लगातार हल्दी ताकतों से दुश्मन हैरान और परेशान हैं। इसलिए भारत में धार्मिक विवाद का जन्म होने की कथावस्तु में चल रही है। विदेशी अनुयायियों के माध्यम से शत्रु भारत के धर्मनिर्पेक्षता पर हमला करने की साजिश रच रहे हैं। मगर हर बार उन्हें नाकामयाबी ही हाथ लगी है। एक बार फिर विदेश मंत्री एस जयशंकर की ब्रिटेन यात्रा के दौरान भारत की धर्मनिर्पेक्षता पर सवाल उठाए गए। मगर विदेश मंत्री ने दिया ऐसा ठोस जवाब कि फैक्ट्री बोलती बंद हो गई।

एस जयशंकर का मानना ​​है कि भारत के लिए धार्मिकता का मतलब गैर-धार्मिक होना नहीं है, बल्कि सभी धर्मों को समान सम्मान देना है, लेकिन अतीत में ‘तुष्टिकरण’ को अपनाए गए सरकारी समुदायों ने देश के सबसे बड़े धर्म के लोगों को ऐसा महसूस कराया जैसे कि हेलेबेल के नाम पर उन्हें स्वयं की ही निंदा करनी पड़ी हो। लंदन के रॉयल ओवर-सीज लीग में ‘दुनिया के बारे में एक अरब लोगों का नजरिया’ विषय पर रविवार शाम आयोजित एक चर्चा के दौरान जयशंकर ने यह बात कही।

जयशंकर से पूछा ये सवाल

जयशंकर ने पूछा कि क्या नेहरू युग के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली सरकार के शासनकाल में भारत उदारवादी और ‘बहुसंख्यकवादी हिंदू’ राष्ट्र अधिक बन गया। जयशंकर ने इस प्रश्न के उत्तर में कहा कि भारत निश्चित रूप से बदल गया है और इस परिवर्तन का मतलब यह नहीं है कि भारत कम उदार हो गया है, बल्कि देश के लोग अब अपनी प्रतिभा से अधिक ईमानदारी से व्यवहार करते हैं। जयशंकर ने पत्रकार एवं लेखक लियोनेल बार्बर के एक सवाल के जवाब में कहा, ”क्या भारत नेहरूवादी युग से बदल गया है? बिल्कुल, क्योंकि उस युग की एक धारणा जो विदेश में देशों के समुदायों और उनके सहयोगियों को बहुत हद तक निर्देशित करती थी, वह वह तरीका था, जिससे हम भारत में स्वतंत्रता को परिभाषित करते हैं।

विश्व को धर्मनिर्पेक्षता का मतलब

विदेश मंत्री ने कहा, ”हमारे लिए, धार्मिकता का मतलब गैर-धार्मिक होना नहीं है, हमारे लिए नैतिकता का अर्थ सभी धर्मों के बराबर होना है।” अब, वास्तव में राजनीति में जो हुआ वह सभी धर्मों के लिए समानता सम्मान के साथ शुरू हुआ लेकिन हम एक प्रकार से अल्पसंख्यकों को बढ़ावा देने की राजनीति में शामिल हो गए हैं। मुझे लगता है कि समय के साथ इसका विरोध हो रहा है। जयशंकर ने भारतीय राजनीति को लेकर होने वाली बहस में ‘तुष्टिकरण’ का एक बहुत ही शक्तिशाली शब्द के रूप में उल्लेख किया है, जिसने देश की राजनीति को एक अलग ही दिशा प्रदान की है। उन्होंने कहा, ”देश में अधिक से अधिक लोगों को यह महसूस हो रहा है कि एक तरह से, सभी धर्मों की भलाई के नाम पर, वास्तव में, बहुसंख्यक समुदाय के लोगों को आत्म-निन्दा करनी होगी और खुद को कामतर अदाना होगा। उस समुदाय के एक बड़े हिस्से को लगा कि यह नहीं है।

भारतीयता की भावना पेज से और अधिक

जयशंकर ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में भारत में गैर-बराबरी के रूप में राजनीतिक और सामाजिक आर्थिक परिवर्तन को देखा गया है, इस भावना का महत्व और राजनीतिक स्तर पर एक उत्तर दिया गया है। भारत में कम होने को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में जयशंकर ने कहा, ”मुझे ऐसा नहीं लगता, मैं इसके विपरीत विचार रखता हूं।” मुझे लगता है कि आज लोग अपनी परंपराएं, अपनी साख और अपनी संस्कृति को लेकर कम पाखंडी हैं। आज के दौर में देश के लोगों में भारतीयता और प्रामाणिकता की भावना अधिक है।”

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